पाकिस्तान में तालिबान ने अपने नए नेता के नाम का ऐलान किया

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प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने अपने नेता मुल्ला फ़ज़लुल्लाह की अमरीकी हवाई हमले में मौत की पुष्टि करते हुए नए नेता के नाम का ऐलान किया है.
तालिबान के मुताबिक़, मुल्ला फ़ज़लुल्लाह 13 जून को अमरीकी ड्रोन से दाग़ी गई मिसाइल के हमले में मारे गए थे.
अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के अधिकारियों ने मुल्ला फ़ज़लुल्लाह की मौत का दावा किया था. शनिवार को जारी एक बयान में अब तालिबान ने भी उनकी मौत की पुष्टि कर दी है.
बयान के मुताबिक़, तालिबान के नेताओं की परिषद ने मुफ़्ती नूर वली महसूद को तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का अमीर और मुफ़्ती मज़ाहम अल मारूफ़ मुफ़्ती हिफ़ुज़ुल्लाह को नायब अमीर नियुक्त किया है.
नूर वली महसूद को बीते साल ख़ालिद सजना की मौत के बाद महसूद क्षेत्र के चरमपंथियों का नेता नियुक्त किया गया था.
मुफ़्ती नूर वली पूर्व नेता बैतुल्लाह महसूद के क़रीबी साथी थे और इससे पहले भी ताबिलान की अहम ज़िम्मेदारियां संभालते रहे हैं.
40 साल के मुफ़्ती नूर वली ने तालिबान के इतिहास पर एक किताब भी लिखी है. इस किताब में कई अहम जानकारियां सामने आईं थीं. उन्होंने बताया था कि तालिबान को फंडिंग कहां कहां से होती थी.

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पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसियों ने बीबीसी को बताया था कि 13 जून को मुल्ला फ़ज़लुल्लाह को कुनार प्रांत में किए गए एक हमले में मार दिया गया है.
हमले के वक़्त मुल्ला फ़ज़लुल्लाह इफ़्तार पार्टी में गए थे. जानकारी के मुताबिक़, रात दस बजकर 45 मिनट पर जब वो अपनी गाड़ी में बैठे तो उन पर ड्रोन हमला हुआ.
हमले के वक़्त मुल्ला फ़ज़लुल्लाह के तीन साथी भी उनके साथ मौजूद थे.
ख़ुफ़िया एजेंसियों के मुताबिक़, इस हमले में कुल पांच लोग मारे गए थे जो बुरी तरह जल गए थे. उन्हें अगली सुबह वहीं दफ़न कर दिया गया था.

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कौन है मुफ़्ती नूर वली महसूद
मुफ़्ती नूर वली का जन्म दक्षिणी वज़ीरिस्तान के तियारज़ा इलाक़े में हुआ था. उन्होंने फ़ैसलाबाद, गुजरांवालां और कराची के अलग-अलग मदरसों से पढ़ाई की.
तालिबान का कहना है कि उत्तरी वज़ीरिस्तान में जब पाकिस्तानी सेना ने ऑपरेशन ज़र्ब-ए-अज़्ब शुरू किया तो मुफ़्ती नूर वली ने पाकिस्तानी सेना के ख़िलाफ़ लड़ाई में हिस्सा लिया.
साल 2014 में अमरीकी ड्रोन हमले में मुफ़्ती नूर वली के एक ठिकाने को भी निशाना बनाया गया था. इस हमले में आठ तालिबान लड़ाके मारे गए थे लेकिन मुफ़्ती नूर वली बच गए थे.

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मुफ़्ती नूर वली की किताब
मुफ़्ती नूर वली ने हाल ही में 690 पन्नों की किताब- 'इंक़लाब महसूब, साउथ वज़ीरिस्तान- फ़िरंगी राज से अमरीकी साम्राज्य तक' नाम की एक विस्तृत किताब लिखी है.
इस किताब में पहली बार पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो पर क़ातिलाना हमले, कराची और रावलपिंडी में भी हमलों की ज़िम्मेदारी क़बूल की गई थी. इससे पहले तक तालिबान इन हमलों में शामिल होने से इनकार करता रहा है.
मुफ़्ती नूर वली महसूद ने किताब में कहा था कि इसका मक़सद ये था कि चरमपंथी पुरानी ग़लतियों से सबक सीख सकें और उन्हें भविष्य में न दोहराएं.
किताब में मुफ्ती नूर वली ने स्वीकार किया था कि तालिबानी समूह और संगठन पैसा हासिल करने के लिए डाका डालने, भत्ताखोरी, पैसों के बदले क़त्ल जैसी वारदातें करते रहे हैं.

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किताब में अपनी आमदनी के स्रोत के बारे में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने बताया था कि साल 2007 में दक्षिणी वज़ीरिस्तान में एक हमले में अग़वा किए गए कर्मचारियों, गाड़ियों और हथियारों के बदले एक समझौते के तहत सरकार ने छह करोड़ रुपए दिए थे.
तालिबान ने अग़वा किए गए इन सैनिकों को कई महीनों तक अपनी हिरासत में रखा था और बातचीत के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया था. उस समय सैनिकों और उनके हथियारों की वापसी के बदले पैसे दिए जाने के बारे में किसी भी पक्ष ने कुछ नहीं बताया था.
इस बारे में बीबीसी ने सेना की प्रतिक्रिया जाननी चाही थी लेकिन कोई जवाब नहीं मिल सका था. उस समय तालिबान के नेता हकीमुल्लाह महसूद ने बीबीसी को अग़वा किए गए सैनिकों से मिलने की इजाज़त दी थी.
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