पाकिस्तान: कराची के ‘बिहारी बाहुबली’ की कहानी

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, हुसैन असकरी
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, कराची
कराची की चुनावी राजनीति पर बीते तीन दशकों से राज करने वाले शख़्स अल्ताफ़ हुसैन वैसे तो 1978 से उर्दू बोलने वालों को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन 15 अप्रैल 1985 को ट्रैफ़िक दुर्घटना में एक छात्रा बुशरा ज़ैदी की मौत से उनका सियासी उदय हुआ.
इस हादसे के बाद जो दंगे हुए उसने कराची को बदलकर रख दिया. शहर के लोग भाषाई आधार पर अपने-अपने मोहल्लों में दुबक कर रह गए. उर्दू बोलने वालों को अल्ताफ़ हुसैन एक मसीहा के तौर पर नज़र आए और वह मशहूर होते चले गए.
उत्तर भारत में अधिकतर लोग जिस प्रकार से दक्षिण भारत के लोगों को आमतौर पर 'मद्रासी' कहकर संबोधित करते हैं. वैसे ही पाकिस्तान में, ख़ासतौर पर कराची शहर में भारत से पाकिस्तान गए सभी उर्दू भाषी लोगों को 'बिहारी' कहकर एक तरह से उन पर तंज़ किया जाता है. अल्ताफ़ हुसैन उत्तर भारत से पाकिस्तान गए ऐसे ही एक परिवार में 1953 को जन्मे थे. यहां तक कि बांग्लादेश बनने के बाद जो लोग वहां से पाकिस्तान गए उन्हें भी 'बिहारी' कह कर संबोधित किया जाता था.
अल्ताफ़ में भरोसा रखने वालों को क्रोटन के पत्तों पर अल्ताफ़ हुसैन की शक्ल नज़र आने लगी. उन्हें पीर का दर्जा दिया जाने लगा. हमने ये भी देखा कि पीर साहब न कहने पर लोगों के गाल थप्पड़ों से लाल कर दिए जाते थे. लाखों की भीड़ एक इशारे पर ख़ामोश हो जाती थी.
अपने जन्मदिन के मौक़े पर शहर के बीचों-बीच वह कई किलो का केक तलवार से काटा करते थे.


इमेज स्रोत, Getty Images
बायकॉट करने पर नहीं पड़ते थे वोट
1985 के बाद से कराची अल्ताफ़ हुसैन की शख़्सियत एक दायरे में क़ैद होकर रह गई. इस 'घेरेबंदी' ने शहर को राष्ट्रीय राजनीति और मुद्दों से दूर कर दिया.
चुनावी राजनीति के हिसाब से देखा जाए तो 1988 के बाद से हर चुनाव में उनका पूरा कंट्रोल रहा. जब उनकी पार्टी चुनाव लड़ती थी तो भारी बहुमत हासिल करती थी और जब अज्ञात कारणों और दबावों की वजह से वह बायकॉट करती थी तो लगता था कि शहर में चुनाव हो ही नहीं रहे हैं.
2013 तक अल्ताफ़ हुसैन बहुत मज़बूत फ़ैक्टर थे. ये पहली बार है कि वह इस बार चुनाव की तस्वीर से ग़ायब हैं और न सिर्फ़ वह बल्कि उनके ख़ास लोग भी ग़ायब हो चुके हैं जो चुनावों में बहुत अहम भूमिका अदा किया करते थे.
2002 के चुनावों की रिपोर्टिंग के दौरान हम जब मलेर के एक पोलिंग स्टेशन में गए तो मुझे मेरे दो पत्रकार साथियों समेत कॉलर से पकड़कर बाहर निकाल दिया गया.
एक कर्मचारी ने हमें बाहर छोड़ते हुए कहा, "भाई यहां पहले ही बहुत टेंशन है, आप और माहौल ख़राब कर रहे हैं."
गेट पर मौजूद रेंजर्स के जवान से जब शिकायत की तो उसने कहा कि उसकी ज़िम्मेदारी गेट तक है. उसने कहा, "अंदर क्या हो रहा है ये हमारी ज़िम्मेदारी नहीं है."

इमेज स्रोत, Getty Images
अब अल्ताफ़ के पास सोशल मीडिया ही हथियार
अल्ताफ़ हुसैन के लिए लड़ने-मरने को तैयार लोगों के अलावा जो उनकी विचारधारा को आम जनता तक पहुंचाते थे, उन्हें भी इजाज़त नहीं थी कि वह जनता से बात कर सकें. अब अल्ताफ़ हुसैन के पास एक ही ज़रिया है और वह है सोशल मीडिया और इस ज़रिए से वह जनता तक अपना संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं.
वो संदेश ये है कि जनता चुनाव वाले दिन घरों से न निकले, लेकिन क्या इसके बावजूद भी वो 25 जुलाई को चुनाव पर कोई असर डाल पाएंगे. यही वो सवाल है जो कराची में लोगों की ज़बान पर है. उनके समर्थक, पूर्व समर्थक और विरोधी सब यही सवाल पूछ रहे हैं.
कराची के मेयर वसीम अख़्तर कहते हैं कि अल्ताफ़ हुसैन बड़ी हद तक अपना असर खो चुके हैं. उन्होंने बीते साल जुलाई में पीएस 114 महमूदाबाद में होने वाले उप-चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा कि अल्ताफ़ हुसैन के बायकॉट की घोषणा के बावजूद एमक्यूएम को 18 हज़ार से अधिक वोट मिले.
"ये परंपरागत तौर पर हमारी सीट नहीं थी और लंदन से बायकॉट की अपील भी थी, लेकिन फिर भी हमें इतने वोट पड़े. ये ज़ाहिर करता है कि अल्ताफ़ हुसैन का असर कम हुआ है. समस्या ये है कि हम आपस की लड़ाई में व्यस्त हो गए हैं जो हमारे लिए ज़्यादा बड़ा ख़तरा है."
एमक्यूएम के वरिष्ठ नेता डॉक्टर फ़ारुक़ सत्तार के मुताबिक़, ''हाल ही में जब अल्ताफ़ हुसैन ने अपने कार्यकर्ताओं से अपील की कि वह पश्तून संरक्षण आंदोलन की कराची में होने वाले सम्मेलन में भाग लें तो चार-पांच लोग ही वहां जा सके. लेकिन फ़ारुक़ सत्तार कहते हैं कि अल्ताफ़ हुसैन मतदान पर अब भी पांच से छह फ़ीसद असर डाल सकते हैं.''

इमेज स्रोत, Getty Images
अब किसका चलता है सिक्का?
कराची को अगर थोड़ी बारीक नज़र से देखें तो शहर के कई इलाक़ों की पतली-पतली गलियों में आज भी अल्ताफ़ हुसैन के लिए न सिर्फ़ हमदर्दी बल्कि उनके कार्यकर्ताओं का कमज़ोर ही सही, लेकिन एक नेटवर्क मौजूद है.
सुरक्षा एजेंसियां आज भी इस नेटवर्क की तलाश में रहती हैं. रोज़ाना छापे, गिरफ़्तारियों और हथियार बरामद किए जाने की ख़बरें भी आती रहती हैं. शहर में यह भी ख़बरें हैं कि जब एमक्यूएम के उम्मीदवार अपनी चुनावी मुहिम के लिए इन गलियों का रुख़ करेंगे तो उनका इस नेटवर्क से सामना हो सकता है.
फ़ेडरल बी एरिया में मुझे एक ऐसे ही कार्यकर्ता से मिलने का मौक़ा मिला. उन्होंने कहा, "अगर हमें आज़ादी से चुनाव लड़ने दिया जाए तो सब को पता चल जाएगा कि ये शहर आज भी किसका है."
उन्होंने कहा कि एमक्यूएम वालों की इस शहर में कोई हैसियत नहीं है और उनमें इतनी हिम्मत नहीं है कि ये हमारे मोहल्लों में आएं.
यह तो वक़्त ही बताएगा कि ऐसे और कितने कार्यकर्ता हैं और वे क्या कर सकते हैं.
कराची की राजनीति पर गहरी नज़र रखने वाले विश्लेषक प्रोफ़ेसर तौसीफ़ अहमद के मुताबिक़, ''अल्ताफ़ हुसैन चाहेंगे कि लोग चुनाव का हिस्सा न बनें, लेकिन जब चुनाव प्रचार शुरू होता है तो विभिन्न राजनीतिक पार्टियां अपने वोटरों के पास जाती हैं और माहौल बदल जाता है.
इस गहमागहमी में हो सकता है कि यह संदेश ज़्यादा प्रभावी न हो.
1993 में भी तो अल्ताफ़ हुसैन ने नेशनल असेंबली के चुनाव का बायकॉट किया था और मतदान प्रतिशत बहुत कम रहा था. लेकिन अगले ही रोज़ जब पार्टी ने राज्य की असेंबली के चुनाव लड़े तो जैसे पूरा शहर ही उमड़ आया. क्या ऐसी तस्वीर दोबारा नहीं उभर सकती?
प्रोफ़ेसर तौसीफ़ कहते हैं कि उस वक़्त हालात अलग थे, एमक्यूएम अपनी पूरी ताक़त के साथ मौजूद थी.
वह कहते हैं, "एमक्यूएम को जनता का समर्थन हासिल था, लेकिन सत्ता में आने के बाद जिस तरह का उन्होंने काम कियाउसके कारण हमदर्दों में मायूसी फैली."
प्रोफ़ेसर तौसीफ़ के मुताबिक़ हुसैन ने विभिन्न उद्देश्यों के लिए अपने ख़ास लोगों को लगातार अपने साथ रखा.
उन्होंने कहा, "कहा जाता है कि पहले वह स्थानीय एजेंसियों के लिए ठेके पर काम करते थे तो बाद में अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के लिए काम करने लगे. इससे शहर को और ख़ुद उनकी पार्टी को बहुत नुक़सान पहुंचा."
कई सारी घटनाओं में शायद उनके लोग शामिल न हों, लेकिन धारणा यही बन गई कि कई घटनाओं में एमक्यूएम के 'लड़ाकों' का हाथ था. इस धारणा के बनने की वजहें भी थीं.
बाद में जब उन 'लड़ाकों' के ख़िलाफ़ सुरक्षाबलों ने अभियान शुरू किया तो वह ग़ायब हो गए, उसके बाद अल्ताफ़ हुसैन के शहर को नियंत्रित करने की क्षमता भी प्रभावित हुई.


इमेज स्रोत, Getty Images
अल्ताफ़ के पास अब भी 'लड़ाके'
प्रोफ़ेसर तौसीफ़ कहते हैं कि 2013 के आम चुनाव वाले दिन शहर में इमरान ख़ान का दिन था.
"उस दिन फ़ौज और पुलिस वोटों की गिनती के वक़्त मतदान केंद्रों से अगर चली गई होती और एमक्यूएम वाले उन केंद्रों पर कब्ज़ा कर लेते तो तहरीक-ए-इंसाफ़ शहर की एक बड़ी फ़ौज के तौर पर उभर सकती थी."
विश्लेषकों के मुताबिक़, राजनीतिक तस्वीर को अपने हक़ में बदलने वाली वो फ़ोर्स अब नहीं रही जिसकी वजह से अल्ताफ़ हुसैन शहर को कंट्रोल करते थे. ये नेटवर्क अब टूट-फूट चुका है. इसके अलावा आम लोगों के समर्थन में भी कमी आई है.
एमक्यूएम के विकास को क़रीब से देखने और परखने वाले जानते हैं कि अल्ताफ़ हुसैन की शख़्सियत ने पार्टी के शिखर पर जाने और ज़मीन पर आने में अहम किरदार निभाया है. एक वक़्त था जब एमक्यूएम में लोग इस बात पर काम कर रहे थे कि इसे एक लोकतांत्रिक पार्टी बनाया जाए. इसे एक धर्मनिरपेक्ष और उदार पार्टी के तौर पर उभारा जाए.

प्रोफ़ेसर तौसीफ़ कहते हैं कि वह एक बहुत अच्छी योजना थी जिसमें अल्ताफ़ हुसैन भी किसी हद तक आगे रहते और शहर की बहुत सारी समस्या भी हल हो जाती. लेकिन ये सोच अल्ताफ़ हुसैन की सोच से मेल नहीं खाती थी इसलिए पार्टी के अंदर ये बात आगे नहीं बढ़ सकी.
अब यह कोशिश दोबारा की जा सकती है. लेकिन एमक्यूएम (पाकिस्तान) दो धड़ों में बंटी हुई है. अल्ताफ़ हुसैन से अलग होने के बाद यह एक बड़ी लोकतांत्रिक और उदार पार्टी के तौर पर उभर सकती है.
यह पार्टी अपनी पूरी ताक़त और मज़बूती से चुनाव लड़े तो संभावना है कि लोग अल्ताफ़ हुसैन को पुरानी बात समझकर आगे बढ़ जाएं.
एक ऐसी शख़्सियत जिसने बीते 30 सालों तक बिना किसी भागीदारी के राज किया हो, उसके हट जाने के बाद ख़ुशी या ग़म को संभालने में कराची शहर को कुछ वक़्त लगेगा.
'हमें मंज़िल नहीं नेता चाहिए'- यह कभी एमक्यूएम का नारा हुआ करता था. कराची को मंज़िल तो नहीं मिल सकी और अब यह शहर एक नेता की भी तलाश में है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












