ईरान में विरोध प्रदर्शन: मुश्किलें ख़त्म या बगावत की शुरुआत?

ईरान में विरोध प्रदर्शन

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ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड के कमांडर जनरल मोहम्मद अली जाफ़री ने बुधवार को देश में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के खत्म होने की घोषणा की.

उन्होंने कहा कि मुश्किलें ख़त्म हो गई और विद्रोह को नाकाम कर दिया गया. लेकिन जनरल मोहम्मद अली जाफ़री जिस वक्त ये घोषणा कर रहे थे, ठीक उस समय ईरान की सोशल मीडिया पर विरोध प्रदर्शनों की तस्वीरें और वीडियो फुटेज़ के आने का सिलसिला जारी ही था.

ईरान में बीते कुछ दिनों में जो कुछ हुआ, उसका स्वतंत्र माध्यमों से अंदाज़ा लगाना जरा मुश्किल है. ईरान में विदेशी पत्रकारों के काम करने पर कई तरह की पाबंदियां हैं और इंटरनेट के इस ज़माने में कई मैसेजिंग ऐप्स भी यहां प्रतिबंधित हैं.

इन हालात में ईरान में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला क़रीब हफ़्ते भर तक चलता रहा. ईरान जैसे मुल्क में जहां लंबे समय से दमन को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है, ये एक नई, अनोखी और कुछ हद तक खुशगवार बात थी.

साल 2009 के बाद से ईरान में मंहगाई के ख़िलाफ़ असंतोष, मौलवियों की सत्ता और विदेश नीति के ख़िलाफ़ आवाज़ें मुखर और तेज़ हो गई हैं. उस साल हुए चुनावों में राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद फिर से जीत गए थे लेकिन उन पर धांधली करने का आरोप लगा और लाखों लोग सड़कों पर उतर आए थे.

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अयातुल्लाह अली खामनेई का बयान

ईरान के धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली खामनेई ने हालिया विरोध प्रदर्शनों के लिए दुश्मन विदेशी ताक़तों पर इलज़ाम लगाया.

खामनेई ने मंगलवार को कहा, "हाल के दिनों में ईरान के दुश्मनों ने हर हथियार आजमाया है. ईरान में समस्याएं पैदा करने के लिए पैसा, हथियार, सियासत, खुफियागिरी, हर हथियार का इस्तेमाल किया गया है."

ऐसा नहीं है कि विरोध प्रदर्शनों का केंद्र केवल राजधानी तेहरान ही है. तेहरान के अलावा ईरान के क़रीब 50 शहरों में ये विरोध प्रदर्शन हुए.

ईरान की सरकारी मीडिया का कहना है कि नेजेबाबाद में प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर गोली चलाई, एक पुलिसवाले की मौत हुई और तीन लोग घायल हो गए.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ केहदेरीजान शहर में प्रदर्शनकारियों ने एक पुलिस स्टेशन को आग के हवाले कर दिया. वहां कई लोगों के मरने की ख़बर है लेकिन इस सूचना की आधिकारिक सूत्रों से पुष्टि नहीं हो सकी.

सोशल मीडिया पर चल रही ख़बरों के मुताबिक़ बिरगेंडे, करमनशाह और शादेगान में भी बहुत हिंसा हुई है. ताज़ा जानकारी के अनुसार प्रदर्शनकारियों और पुलिस की झड़प में कम से कम 21 लोगों की मौत हुई है.

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प्रदर्शनकारी चाहते क्या हैं

प्रदर्शनकारियों ने पहले क़ीमतों पर नियंत्रण करने की मांग की. ईरान में हफ्ते भर के भीतर अंडे और मुर्गियों की क़ीमत दो गुने तक बढ़ गए थे. फिर राजनीतिक नारों की शुरुआत हुई. राजनीतिक बंदियों को रिहा किए जाने की मांग उठी और फिर पुलिस के मनमाने तरीके से काम करने के मुद्दा तक बात पहुंची.

प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाए, "लोग भीख मांग रहे हैं और हुक्मरान मौलवी लोग खुद को खुदा समझने लगे हैं." मध्य पूर्व में दबदबा कायम करने की ईरान की कोशिशों पर मसाद शहर में तंज के साथ नारे सुनाई दिए, "न गज़ा, न लेबनान, मेरी ज़िंदगी है ईरान."

यहां कि प्रदर्शन के दौरान सड़कों पर रूस और रूहानी विरोधी नारे भी सुनाई दे रहे थे. साल 2009 के चुनावी नतीज़ों को रूस ने आधिकारिक रूप से मान्यता दी थी.

बीबीसी की फारसी सेवा की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते दशक में औसतन ईरानी 15 फ़ीसदी तक ग़रीब हुआ है. इसी दौरान दूध, अंडे और गोश्त की खपत 30 से 35 फ़ीसदी तक कम हो गई है. हाल के समय में कई ईरानी कंपनियों ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया है. इसमें हज़ारों लोगों की बचत डूब गई है.

बड़ी तादाद में लोगों के पास जीविका का साधन नहीं है. देश में बेरोज़गारी की आधिकारिक दर 12 फ़ीसदी है. देश के कुछ इलाकों में बेरोज़गारी की दर 60 फ़ीसदी तक है.

हसन रूहानी

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इमेज कैप्शन, लोगों का गुस्सा रूहानी सरकार की आर्थिक नीतियों की तरफ़ ज्यादा दिखता है

रूहानी सरकार का रुख

पिछले कुछ दिनों में ईरान में 450 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. अकेले तेहरान में सोमवार की रात 200 लोगों को हिरासत में लिया गया.

जब ये गिरफ्तारियां हो रही थीं, उसी बीच राष्ट्रपति हसन रूहानी ने बयान दिया कि वे इन विरोध प्रदर्शनों में कुछ भी ख़तरनाक नहीं देखते हैं. हसन रूहानी ने कहा, "आलोचना और विरोध एक अवसर है, कोई ख़तरा नहीं."

लेकिन रिवॉल्यूशनरी गार्ड ने प्रदर्शनकारियों को चेताया कि अगर विरोध और हिंसा जारी रही तो उनपर कड़ी कार्रवाई की जाएगी.

उधर, ईरान के क़ानून सादिक़ आर्देशिर अमोली लारीजानी ने उपद्रवी तत्वों को सजा दिए जाने का आह्वान किया. उन्होंने कहा, "कुछ लोग हालात का फ़ायदा उठा रहे हैं, ये ग़लत है."

सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ़ ईरान के चीफ़ अली शमखानी ने दंगे भड़काने का इलज़ाम ब्रिटेन, अमरीका और सऊदी अरब पर लगाया.

प्रदर्शनकारियों पर काबू पाने के लिए सरकार ने टेलीग्राम और इस्टाग्राम जैसी सेवाओं पर अस्थाई रूप से रोक लगा दी. कुछ इलाकों में तो इंटरनेट पूरी तरह से बंद कर दिया गया.

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पश्चिम की प्रतिक्रिया

संयुक्त राष्ट्र में अमरीकी प्रतिनिधि निकी हेली ने कहा कि आने वाले समय में वे ईरान के मुद्दे पर अन्य देशों के साथ बैठक करेंगी.

निकी हेली ने कहा, "संयुक्त राष्ट्र को इस बारे में बोलना होगा. आने वाले कुछ दिनों में हम न्यूयॉर्क में आपातकालीन बैठक और जिनेवा में मानवाधिकार परिषद की बैठक बुलाएंगे. हम चुप नहीं रह सकते."

हालांकि निकी हेली ने सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाए जाने पर कुछ नहीं कहा. राष्ट्रपति ट्रंप ने भी ईरान पर बयान दिया.

उन्होंने कहा, "ईरान में बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं. अंततः लोग समझदार हो रहे हैं और समझ रहे हैं कि किस तरह उनके पैसे को लूटा जा रहा है और आतंकवाद पर लुटाया जा रहा है. ऐसा लग रहा है जैसे वो ज़्यादा दिनों तक ये सब बर्दाश्त नहीं करेंगे. अमरीका मानवाधिकारों के उल्लंघन पर बहुत बारीक़ी से नज़र रखे हुए है."

इस पर ईरान के राष्ट्रपति ने अमरीका को अपने देश का दुश्मन क़रार दिया. यूरोपीय संघ के नेताओं ने आम लोगों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा की गारंटी सुनिश्चित करने की ईरान से अपील की.

तुर्की ने कहा कि वो ईरान की शांति और सुरक्षा को ईरान की शांति और सुरक्षा से अलग करके नहीं देखता है.

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किसकी जीत हुई

रिवॉल्यूशनरी गार्ड के चीफ़ ने बुधवार को कहा कि विरोध प्रदर्शन खत्म हो गए हैं. लेकिन विपक्षी कार्यकर्ताओं के मुताबिक़ ये सही नहीं है, विरोध प्रदर्शन अभी भी जारी हैं. सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें शेयर की जा रही हैं.

बीबीसी के मध्यपूर्व मामलों के जानकार जेरेमी बोवेन का कहना है कि 2009 के विरोध प्रदर्शनों और इस बार के आंदोलन में एक बड़ा फर्क ये है कि पिछली बार के उलट इस बार कोई स्पष्ट नेतृत्व नहीं है. सुधारवादी धड़े या कट्टरपंथी दोनों एक दूसरे पर या विदेशी ताक़तों को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं. लेकिन इन विरोध प्रदर्शनों से एक बात सामने आई है कि ईरानी समाज किस कदर असंतुष्ट है. उनकी ग़रीबी एक तरफ बढ़ रही है तो दूसरी तरफ़ सरकार का उन पर दबाव भी.

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