उर्दू प्रेस रिव्यू: पैग़म्बर मोहम्मद पर हुई 'ग़लती' से भड़की हिंसा

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- Author, इकबाल अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों में इस हफ़्ते राजधानी इस्लामाबाद में धार्मिक गुटों का धरना प्रदर्शन, हाफ़िज़ सईद की रिहाई से जुड़ी ख़बरें सबसे ज़्यादा चर्चा में रहीं.
सबसे पहले बात करते हैं राजधानी इस्लामाबाद में पाकिस्तान के धार्मिक गुटों के धरना प्रदर्शन के ख़िलाफ़ पुलिस कार्रवाई की.
अख़बार जंग ने सुर्ख़ी लगाई है, ''इस्लामाबाद में हालात तनावपूर्ण, सेना तलब.''
अख़बार 'दुनिया' लिखता है कि सेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री से फ़ोन पर बातचीत की.
अख़बार के अनुसार सेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री से फ़ोन पर बातचीत के दौरान कहा कि दोनों तरफ़ से हिंसक वारदातें राष्ट्र हित में नहीं हैं और शांतिपूर्ण तरीक़े से समस्या का समाधान किया जाए.

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'रोज़नामा एक्सप्रेस' ने लिखा है, ''धरने के ख़िलाफ़ ऑपरेशन में सात लोगों की मौत, सैकड़ों ज़ख़्मी, मंत्रियों के घर पर हमले, सेना तलब.''
'रोज़नामा ख़बरें' ने लिखा है, ''धरने वालों पर पुलिस का धावा, शहर-शहर हंगामे.''
पिछले 20 दिनों से जारी धरना प्रदर्शन को शांतिपूर्ण तरीक़े से ख़त्म कराने के तमाम प्रयासों के विफल होने के बाद आख़िरकार सरकार ने शनिवार को बल प्रयोग करने का आदेश दे दिया.
पाकिस्तान के कई धार्मिक संगठनों के लगभग 3,000 लोग इस्लामाबाद में पिछले 20 दिनों से धरने पर बैठे हुए थे. तहरीक-ए-लब्बैक या तहरीक-ए-रसूलुल्लाह नाम का संगठन इसका नेतृत्व कर रहा था.
उनकी मांग है कि चुनाव सुधार के लिए संसद में जो बिल पेश किया गया था उसमें कुछ ऐसी बातें कही गई थीं जो उनके अनुसार इस्लाम की बुनियादी मान्यताओं के विरुद्ध हैं.

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पाकिस्तानी क़ानून के अनुसार चुनाव में भाग लेने वाले किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार को ये हलफ़नामा देना होता है कि पैग़म्बर मोहम्मद इस्लाम के आख़िरी पैग़म्बर हैं और अब उनके बाद कोई दूसरा पैग़म्बर नहीं आएगा.
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि 'संशोधन के लिए पेश किए गए बिल में इस हलफ़नामे की शर्तों के साथ छेड़छाड़ की गई थी जिसे वो किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करेंगे.'
सरकार ने इसे 'क्लैरिकल ग़लती' मानते हुए हलफ़नामे में सुधार कर दिया था, लेकिन प्रदर्शनकारी इसके लिए क़ानून मंत्री ज़ाहिद हामिद को ज़िम्मेदार मान रहे हैं और उनके इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं.
हाफ़िज़ सईद की रिहाई
हाफ़िज सईद की रिहाई भी इस हफ़्ते अख़बारों की सुर्ख़ियों में रही.
चरमपंथी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख और मुंबई में 2008 में हुए चरमपंथी हमलों के कथित मास्टरमाइंड हाफ़िज़ सईद की नज़रबंदी ख़त्म हो गई है और वो एक बार फिर आज़ाद हैं.
वो पिछले 10 महीनों से लाहौर स्थित अपने घर में नज़रबंद थे.

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लेकिन बुधवार को लाहौर हाईकोर्ट के तीन सदस्यीय रिव्यू बोर्ड ने सरकारी वकील की दलील सुनने के बाद फ़ैसला सुनाया था कि सरकार उनकी नज़रबंदी को और आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त सबूत देने में असफल रही है.
रिव्यू बोर्ड के इस फ़ैसले के बाद हाफ़िज़ सईद की नज़रबंदी ख़त्म हो गई और उन्होंने गुरुवार को मीडिया से बातचीत भी की.
लेकिन अमरीका ने उनकी दोबारा गिरफ़्तारी की मांग की है.
अख़बार 'जंग' ने अमरीकी विदेश मंत्रालय के हवाले से लिखा है कि लश्कर-ए-तैयबा एक चरमपंथी संगठन है, उसके प्रमुख की रिहाई चिंता का विषय है.
अख़बार के अनुसार अमरीका ने मांग की है कि हाफ़िज़ सईद को पकड़कर उन्हें इंसाफ़ के कटघरे में लाया जाए.
लश्कर-ए-तैयबा ने इसे पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप क़रार दिया है.

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अख़बार 'दुनिया' के अनुसार लश्कर-ए-तैयबा के फ्रंट संगठन जमात-उद-दावा के प्रवक्ता यहया मुजाहिद ने कहा कि पाकिस्तान की अदालतें स्वतंत्र हैं और उनके फ़ैसलों पर चिंता जताना पाकिस्तान के अंदरुनी मामलों में दख़ल देना है.
प्रवक्ता ने आगे कहा, ''हाफ़िज़ सईद शांति के पैरोकार और मानवसेवा के सबसे बड़े समर्थक हैं. उनका दहश्तगर्दी से कोई संबंध नहीं. उन्होंने तो मुंबई हमलों की निंदा भी की थी. अमरीका ने हाफ़िज़ सईद के ख़िलाफ़ सबूत जमा करने के लिए एक करोड़ ड़ॉलर की रक़म इनाम में देने की घोषणा की थी, लेकिन पांच साल से अमरीका को हाफ़िज़ सईद के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिल सका.''
सियासी सरगर्मी
इसके अलावा सरकार और विरोधी पार्टियों के एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप भी सुर्ख़ियों में बने रहे.
विपक्षी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के प्रमुख इमरान ख़ान ने मुस्लिम लीग (नून) के प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ पर जमकर हमला बोला. उन्होंने एक और विपक्षी पार्टी पीपीपी के को-चेयरमैन आसिफ़ अली ज़रदारी को भी नहीं बख़्शा.

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रोज़नामा एक्सप्रेस के अनुसार अपनी पार्टी की एक सभा को संबोधित करते हुए इमरान ख़ान ने कहा कि नवाज़ शरीफ़ और ज़रदारी जैसे लोगों का सत्ता में आना पाकिस्तान की बदक़िस्मती है. उन्होंने कहा कि सत्ता में आने के बाद उनकी पार्टी भ्रष्ट लोगों से एक-एक पाई वसूल करेगी.
अख़बार 'नवा-ए-वक़्त' ने भी इमरान ख़ान की इस सभा को पहले पन्ने पर जगह दी है.
अख़बार के अनुसार इमरान ख़ान ने नवाज़ शरीफ़ पर कड़ा हमला करते हुए कहा, ''नवाज़ शरीफ़ से मेरी तुलना करना वैसा ही है जैसे कि सुल्ताना डाकू से मेरी तुलना की जाए.''












