युद्ध की आग में क्यों जल रहा है सीरिया ?

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सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ 6 साल पहले शुरू हुई शांतिपूर्ण बगावत पूरी तरह से गृहयुद्ध में तब्दील हो चुकी है. इसमें अब तक 3 लाख लोग मारे जा चुके हैं.

इस गृहयुद्ध में पूरा देश तबाह हो गया है और दुनिया के ताक़तवर देश भी आपस में उलझ गए हैं.

युद्ध कैसे शुरू हुआ?

संघर्ष शुरू होने से पहले ज़्यादातर सीरियाई नागरिकों के बीच भारी बेरोज़गारी, व्यापक भ्रष्टाचार, राजनीतिक स्वतंत्रता का अभाव और राष्ट्रपति बशर अल-असद के दमन के ख़िलाफ़ निराशा थी.

बशर अल-असद ने 2000 में अपने पिता हाफेज़ अल असद की जगह ली थी. अरब के कई देशों में सत्ता के ख़िलाफ़ शुरू हुई बगावत से प्रेरित होकर मार्च 2011 में सीरिया के दक्षिणी शहर दाराआ में भी लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन शुरू हुआ था.

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सीरिया की असद सरकार को यह असहमति रास नहीं आई और उसने आंदोलन को कुचलने के लिए क्रूरता दिखाई.

सरकार के बल प्रयोग के ख़िलाफ़ सीरिया में राष्ट्रीय स्तर पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया और लोगों ने बशर अल-असद से इस्तीफे की मांग शुरू कर दी.

वक़्त के साथ आंदोलन लगातार तेज होता गया. विरोधियों ने हथियार उठा लिए. विरोधियों ने इन हथियारों से पहले अपनी रक्षा की और बाद में अपने इलाक़ों से सरकारी सुरक्षाबलों को निकालना शुरू किया.

असद ने इस विद्रोह को 'विदेश समर्थित आतंकवाद' करार दिया और इसे कुचलने का संकल्प लिया. उन्होंने फिर से देश में अपना नियंत्रण कायम करने की कवायद शुरू की. दूसरी तरफ विद्रोहियों का ग़ुस्सा थमा नहीं था.

वे भी आरपार की लड़ाई लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार रहे. इस वजह से दोनों पक्षों के बीच हिंसा लगातार बढ़ती गई.

गृह युद्ध जैसी स्थिति

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2012 आते आते सीरिया बुरी तरह से गृहयुद्ध में प्रवेश कर चुका था. सैकड़ों विद्रोही गुटों ने एक समानांतर व्यवस्था स्थापित कर ली ताकि सीरिया पर उनका नियंत्रण कायम हो सके.

इसका नतीजा यह हुआ कि यह लड़ाई असद और उनके विरोधियों से आगे निकल गई.

सीरिया की लड़ाई में क्षेत्रीय और दुनिया की ताक़तों की एंट्री हुई. इसमें ईरान, रूस, सऊदी अरब और अमरीकी का सीधा हस्तक्षेप सामने आया.

इन देशों ने असद और उनके विरोधियों को सैन्य, वित्तीय और राजनीतिक समर्थन देना शुरू किया.

सीरिया में कई देशों की एंट्री से युद्ध की स्थिति और गंभीर हो गई. सीरिया दुनिया का एक छद्म युद्ध मैदान बन गया.

शिया बनाम सुन्नी

बाहरी देशों पर सीरिया में सांप्रदायिक दरार पैदा करने का भी आरोप लगा. सुन्नी बहुल सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद शिया हैं. इसी संघर्ष में शिया बनाम सुन्नी की भी स्थिति पैदा हुई.

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शिया बनाम सुन्नी की दरार के कारण अत्याचार और बढ़ा. इस मतभेद से न केवल लोग मारे जा गए बल्कि सभी समुदायों में राजनीतिक तब्दीली की उम्मीदों पर भी पानी फिर गया.

जिहादी ग्रुपों को शिया-सुन्नी का विभाजन रास आया और उन्हें भी यहां पसरने का मौक़ा मिला.

इस युद्ध में जिहादियों के आने से पूरी तस्वीर ही बदल गई. हयात ताहिर अल-शम ने अल क़ायदा से जुड़े संगठन अल-नुसरा फ्रंट से गंठबंधन किया.

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इसके बाद इसने सीरिया के उत्तरी-पश्चिमी राज्य इदलिब पर नियंत्रण कायम किया.

इस्लामिक स्टेट का प्रसार

दूसरी तरफ़ कथित इस्लामिक स्टेट का उत्तरी और पूर्वी सीरिया के व्यापक हिस्सों पर क़ब्ज़ा हो गया. यहां सरकारी बलों, विद्रोही गुटों, कुर्दिश चरमंथियों, रूसी हवाई हमलों के साथ अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंधन देशों के बीच संघर्ष शुरू हुआ.

ईरान, लेबनान, इराक़, अफ़गानिस्तान और यमन से हज़ारों की संख्या में शिया लड़ाके सीरियाई आर्मी की तरफ़ से लड़ने के लिए पहुंचे ताकि उनके पवित्र जगह की रक्षा की जा सके.

असद के लिए सीरिया में स्थिति मुश्किल होती जा रही थी. असद ने अपना नियंत्रण हासिल करने के लिए विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इलाकों में सितंबर 2015 में हवाई हमले शुरू किए.

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रूस का साथ

रूस ने असद का खुलकर साथ दिया.

रूस का कहना है कि हवाई हमले में केवल आतंकवादियों को निशाना बनाया जा रहा है. हालांकि ऐक्टिविस्टों का कहना था कि हमला पश्चिमी देशों के समर्थन वाले विद्रोही ग्रुपों पर किया गया.

6 महीने बाद पुतिन ने सीरिया से अपने सैन्य बलों की वापसी का ऐलान किया.

उन्होंने कहा कि सीरिया में उनका मिशन पूरा हो गया है. हालांकि रूसी मदद के कारण ही विद्रोहियों के क़ब्जे वाले एलप्पो में असद को फिर से नियंत्रण कायम करने में मदद मिली.

यह इलाका दिसंबर 2016 में विद्रोहियों के कब्जे में चला गया था.

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शिया बहुल देश ईरान के बारे में कहा जाता है कि उसने सीरिया में अरबों डॉलर खर्च कर असद सरकार को बचाने में मदद की.

ईरान ने सैन्य मदद के साथ कई तरह की मदद की. ऐसी भी रिपोर्ट आई कि सीरिया में ईरान ने सैकडों लड़ाके भेजे.

अमरीका कहना है कि सीरिया को तबाह करने के लिए असद जिम्मेदार हैं.

2014 से लेकर अब तक अमरीका ने सीरिया में कई हवाई हमले किए हैं. सुन्नी बहुल सऊदी अरब ईरान के ख़िलाफ सीरिया में विद्रोहियों को मदद कर रहा है. असद के ख़िलाफ़ विद्रोहियों को मदद करने में सऊदी अरब की सबसे बड़ी भूमिका है.

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रिपोर्टों के अनुसार सऊदी अरब इस्लामिक स्टेट को भी असद के ख़िलाफ़ मदद पहुंचा रहा है. सीरिया में तुर्की भी असद के विरोधियों को मदद पहुंचा रहा है.

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि पिछले पांच सालों में कम से कम सीरिया में ढाई लाख लोग मारे जा चुके हैं.

हालांकि अगस्त 2015 के बाद से यूएन ने मरने वालों की संख्या को अपडेट करना बंद कर दिया है. कई संगठनों का कहना है कि तीन लाख 21 हज़ार लोग मारे जा चुके हैं.

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एक थिंक टैंक ने चार लाख 70 हज़ार लोगों के मारे जाने का अनुमान लगाया है.

50 लाख लोग जिसमें ज़्यादातर महिलाएं और बच्चे शामिल हैं उन्हें सीरिया छोड़ भागना पड़ा. सीरिया संकट के कारण कई देश शरणार्थियों की समस्या से जूझ रहे हैं.

सीरिया युद्ध कब ख़त्म होगा यह किसी को पता नहीं है. वहां हर कोई अपना राग अलाप रहा है. इस बीच अमरीका ने फिर सीरिया पर हवाई हमले शुरू कर दिए हैं.

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