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उलेमा काउंसिल: चुनाव को नए मायने देने की कोशिश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ चुनाव क्षेत्र में चुनावी दंगल का रंग कुछ अलग है. जाने-पहचाने राजनीतिक दलों ने तो अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, साथ ही उलेमा काउंसिल नाम का एक दल भी मैदान में उतरा है. वैसे तो यहाँ हर चुनाव में भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के झंडे लहराते दिखते हैं पर इस बार इन झंडों में हरा-उजला और लाल पट्टी वाला उलेमा काउंसिल का झंडा भी शामिल है. पर्यवेक्षक मानते हैं कि ये नया झंडा नई सियासी फ़िज़ा का संकेत हो सकता है. दरअसल, उलेमा काउंसिल राजनीति में केवल चुनाव लड़ने के लिए नहीं उतरी बल्कि, उसके प्रतिनिधियों के अनुसार, वह मुसलमानों की विरोध की आवाज़ को सत्तासीन लोगों तक पहुँचाने के लिए भी मैदान में है. वैसे उलेमा काउंसिल उत्तर प्रदेश में सात सीटों से चुनाव लड़ रही है. हालाँकि ये तो चुनाव परिणाम आने पर ही तय होगा कि मुसलमानों की आवाज़ होने का दावा करने वाली उलेमा काउंसिल को किस हद तक इस समुदाय का भरोसा हासिल है. क्या है उलेमा काउंसिल? दिल्ली में जब 19 सितंबर को बाटला हाउस मुठभेड़ हुई तो उत्तर भारत में अनेक जगह मुसलमानों ने इस घटना के मुठभेड़ होने पर सवाल उठाए. कई जगह रोष प्रदर्शन भी हुए. पुलिस का कहना है कि बटला हाउस मुठभेड़ में दोनों तरफ़ से हुई गोलीबारी में दो चरमपंथी और एक पुलिस इंस्पेक्टर मारे गए थे. जो दो युवक इस घटना में मारे गए थे, उनका संबंध आज़मगढ़ से था. इस घटना के बाद राहुल संक्रत्यायन, अल्लामा शिब्ली नोमानी और क़ैफ़ी आज़मी की धरती आज़मगढ़ को मीडिया में 'आतंकवाद का गढ़' कहा जाने लगा था. इसके बाद आज़मगढ़ के कई मुसलमान युवकों को देश के कई हिस्सों में हुए चरमपंथी हमलों के आरोप में पकड़ा गया. बटला हाउस मुठभेड़ के बाद इस धरपकड़ और आज़मगढ़ के कई इलाक़ों में पुलिस के छोपे मारने से मुसलमानों में पैदा हुआ आक्रोष और बढ़ा. इस घटनाक्रम के बीच आज़मगढ़ के लोगों ने सरकार से बाटला हाउस मुठभेड़ की स्वतंत्र जांच की मांग की, लेकिन ये ठुकरा दी गई. तब जन्म हुआ उलेमा काउंसिल का जिसके झंडे तले आज़मगढ़ और आसपास के इलाक़ों के मुसलमान ट्रेन भरकर दिल्ली और फिर लखनऊ पहुँचे और विशाल रैलियों के माध्यम से उन्होंने अपना विरोध दर्ज किया. मुट्ठी भर उलेमा की कोशिश
कुछ एक उलेमा की कोशिश से बनी उलेमा कांउसिल के प्रभाव का अंदाज़ा वहाँ अधिकतर मुसलमान स्पष्ट कहते हैं कि वो जीतें या हारें लेकिन वोट उलेमा काउंसिल के उम्मीदवार को ही देंगे. एक होटल मालिक इमरान का कहना है, "इलाक़े में अगर कोई मुसलमान उलेमा काउंसिल के ख़िलाफ़ बात कह दे तो नौबत मारपीट तक पहुँच जाती है." आज़मगढ़ लोकसभा क्षेत्र से उलेमा काउंसिल के उम्मीदवार डॉक्टर जावेद अख़्तर इस बात को स्वीकार करते हैं, "चुनावी मैदान में उतरना जल्दबाज़ी हो सकती है लेकिन मक़सद ये पैग़ाम पहुँचाना है कि मुसलमान एकजुट हैं." जावेद अख़्तर कहते हैं, "मुसलमानों के लिए कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी सहित सभी राजनीतिक पार्टियाँ भारतीय जनता पार्टी की तरह हैं. मुसलमान सब को आज़मा चुका है और अब मुसलमान अकेल ही मैदान में उतरेगा." मुसलमानों के वोटों के विभाजन और उसका फ़ायदा भाजपा को होने के सवाल पर जावेद अख़्तर का कहना था, "अगर भाजपा सत्ता में आ जाती है तो वो मुसलमानों के ख़िलाफ़ ऐसा क्या कर लेगी जो अब तक नहीं हुआ?" 'सोडा वाटर की तरह ख़त्म होगी' दिलचस्प बात ये है कि आज़मगढ़ में जब अन्य दलों और कुछ ग़ैर-मुसलमानों से उलेमा काउंसिल की मुसलमानों के बीच लोकप्रियता के बारे में पूछा गया तो सभी ने इस दल को नकार दिया. भाजपा के उम्मीदवार रमाकांत यादव का कहना था, "हमारे लिए देश बड़ा है और अगर इसमें मुसलमानों का वोट नहीं मिलता तो हमें कोई परेशानी नहीं है." कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार सतीश सिंह के अनुसार 'उलेमा काउंसिल भावना पर बनी है और सोडा वाटर की तरह ख़त्म हो जाएगी.' एक निजी शैक्षणिक संस्था चलाने वाले विशाल भारती का कहना था, "मैं इस बात से इनकार नहीं कर सकता है कि कुछ लोगों के साथ ग़लत हुआ है. यह सही है कि वो असुरक्षित महसूस करने लगे हैं. सब को अपनी बात कहने का हक़ है और उलेमा काउंसिल ने जो फ़ैसला किया, सही है." दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार दुर्गा प्रसाद ने काफ़ी सतर्कता बरतते हुए कहा, "उलेमा काउंसिल का प्रभाव एक दो जि़लों में है, जबकि मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानों के लिए हमेशा काम किया है." |
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