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बिहार: पहले चरण में नफ़ा-नुक़सान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार में पहले दौर के मतदान वाले तेरह लोकसभा क्षेत्रों में से अधिकांश के आरंभिक रुझान पुराने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के अनुकूल नहीं दिख रहे हैं. इन क्षेत्रों में सबसे ज़्यादा चुनौती का सामना राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को है, क्योंकि इन क्षेत्रों के पिछले लोकसभा चुनावों में इसी दल को सबसे अधिक यानी सात सीटें हासिल हुई थीं. इन जीती हुई सात सीटों में से दो सीटें राजद ने अपने गठबंधन की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के उम्मीदवारों के लिए छोड़ दी हैं. पहले दौर के चुनाव वाले इन इलाक़ों में पिछली बार कांग्रेस को दो, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को एक और जनता दल युनाइटेड (जदयू) को दो सीटें मीली थीं. परिसीमन के बाद जमुई एक नया लोकसभा क्षेत्र बन गया है, इसलिए पिछले चुनाव के सिलसिले में इसकी गिनती नहीं होती. लालू की मुश्किलें
जैसा कि मैंने शुरू में संकेत किया, कुछ खोने का ख़तरा राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को इसलिए है, क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में यहां से उन्होंने बहुत कुछ पा लिया था. गया से राजद की पुरानी जीत पर इस बार जदयू के महादलित फ़ॉमूले की तलवार लटक गई है. जहानाबाद के निवर्तमान राजद सांसद जदयू में चले गए हैं. गोपालगंज के राजद सांसद (साधू यादव) बेतिया से कांग्रेसी उम्मीदवार बन कर अपने जीजा लालू को चिढ़ा रहे हैं. आरा में पिछली बार राजद की सांसद बनी कांति सिंह इस बार क्षेत्र छोड़कर काराकाट (विक्रमगंज) से राजद प्रत्याशी बनी हैं. उनके ख़िलाफ़ जदयू ने राजद से भड़के महाबली सिंह को मैदान में उतार दिया है. लालू ने आरा और नवादा की जो अपनी जीती हुईं सीटें रामविलास पासवान को नई दोस्ती के भेंट स्वरुप दी हैं. वहां जदयू ने उन पर जातीय समीकरण वाले मज़बूत प्रत्याशियों के तीर चला दिए हैं. लालू की उम्मीदें उम्मीदों के मामले में लालू को अपने राजद-लोजपा गठबंधन पर सबसे ज़्यादा भरोसा है. उनका यह भरोसा लोजपा के दलित और यादव-मुस्लिम वाले पूराने सूत्र पर टिका हुआ है. जदयू के कथित ब्रह्मण तिरस्कार से उपजे विरोध और कोसी क्षेत्र में नीतीश सरकार के ख़िलाफ़ ज़ाहिर हुआ रोष पर भी लालू की नज़र है. उन्होंने इस नज़रिए को मिथिलांचल के मतदातोओं के बीच असरदार बनाने के प्रयास भी किए हैं.
बिहार में जदयू-भाजपा गठबंधन सरकार के साढ़े तीन साल के शासनकाल में जहां-जहां कमज़ोरी या विफलता दिखी, लालू को वहां-वहां से अपने लिए समर्थन की उम्मीद है. और जो सबसे बड़ा भरोसा राजद-लोजपा गठबंध को आडवाणी विरोधी मुस्लिम जन मानस पर है. उस मुद्दे को और हवा देने में लालू-रामविलास की जोड़ी जुट गई है. रेलमंत्री के रुप में लालू की तरफ़ से बिहार के लिए घोषित रेल परियोजनाओं का भी असर उनके हक़ में हर जगह कुछ न कुछ ज़रूर है. पर इतना नहीं कि बात बन जाए. राजद फ़ैक्टर राजद को जहां-जहां अपनी जीत पक्की लगती है, उनमें सीवान और सारण (पहले छपरा) का नाम पहले आता है. बावजूद इसके कि सारण में भाजपा उम्मीदवार राजीव प्रताप रुढ़ी को समर्थन भी साफ़-साफ़ दिखता है. राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद की वहां अपनी चुनावी बुनियाद क़ायम लगती है. सारण में बहुजन समाज पार्टी ने कथित धनबल संपन्न उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतार कर लालू को थोड़ा चिंतित कर दिया है. लेकिन जो वहां का पुराना मुस्लिम-यादव समीकरण लालू के पक्ष में रहा है, उसे तोड़ पाना बहुत आसान है भी नहीं. सीवान में कभी चुनाव नहीं हारने वाले मोहम्मद शहाबु्द्दीन इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. वो सीवान जेल में ही उम्र क़ैद की सज़ा भुगत रहे हैं. इसलिए राजद ने इस निवर्तमान सांसद की पत्नी हिना शहाब को वहां से पार्टी प्रत्याशी बनाया है. इस बार भी सीवान में शहाबुद्दीन का दबदबा चुनावी मैदान में ऊपर से ख़ूब दिखता है, लेकिन अंदर से कुछ पुराने और कुछ नए समीकरण की खींचतान में कोई चौंकाने वीले परिणाम निकल आए तो आशचर्य नहीं. वहां वाम दलों के संयुक्त प्रयास से भाकपा-माले के उम्मीदवार को नई ताक़त मिली है. दूसरी तरफ़ जदयू ने भी वहां पूरा ज़ोर लगा दिया है, लेकिन उसे अपने ही दल के एक विद्रोही उम्मीदवार से परेशानी हो रही है. कांग्रेस का हाल
कांग्रेस इस पहले चरण के मतदान वाले चुनावी क्षेत्रों में अपनी पुरानी जीती हुई दो सीटें बचा पाएगी कि नहीं, अभी कहा नहीं जा सकता. औरंगाबाद में निखिल कुमार और सासाराम में मीरा कुमार- कांग्रेस प्रत्याशी हैं. एनडीए और राजद दोनों गठबंधनों ने कांग्रेस को वहां घोर मुश्किल में डाल दिया है. भाजपा को इस चरण में अपनी सिर्फ़ एक ही जीती हुई पुरानी सीट बक्सर को बचाने की चिंता है. वहां भी बहुकोणीय संघर्ष है लेकिन राजद और कांग्रेस में बंट रहे मतों की वजह से भाजपा थोड़ा आश्वस्त दिखती है. जदयू ने पिछले लोकसभा चुनाव में जीती हुई अपनी विक्रमगंज (काराकाट) और महाराजगंज सीटों को इस बार भी अपने क़ब्ज़े में रखने की जुगत लगा रखी है. लेकिन जदयू के प्रभुनाथ सिंह को वहां कांग्रेस के तारकेश्वर सिंह और राजद के उमाशंकर सिंह बेचैन किए हुए हैं. बिहार में पिछले चरण के तेरह चुनावी क्षेत्रों में जदयू की आठ और भाजपा की पांच सीटों पर दावेदारी के मुक़ाबले राजद की 11 और लोजपा की दो सीटों पर दावेदारी वाला संघर्ष अब चरम पर है. यहां बहुजन समाद पार्टी के उम्मीदवार सभी सीटों पर हैं लेकिन अधिकांश सीटों पर उनकी ‘वोट कटवा’ वाली भूमिका मानी जा रही है. कुल मिलाकर यहां राजद-लोजपा गठबंधन पर जदयू –भाजपा गठबंधन के हावी होने जैसे हालात दिख रहे हैं, पर लालू याद दिला रहे हैं कि फिर इस बार उनके हक़ में बोतल से जिन्न निकलेगा. |
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