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मंगलवार, 07 अप्रैल, 2009 को 16:36 GMT तक के समाचार
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'जूता फेंकना, एक ख़तरनाक रुझान'

जूता फेंकने की घटना की तस्वीर
जरनैल सिंह नाम के पत्रकार ने संवाददाता सम्मेलन के दौरान जूता फेंका था
जाने माने शिक्षाविद और समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता का कहना है कि अपनी बात कहने या ग़ुस्सा ज़ाहिर करने के लिए किसी पर जूता फेंकना एक ख़तरनाक रुझान हैं.

उनके अनुसार भारत के गृह मंत्री और कांग्रेस नेता पी चिदंबरम पर जूता फेंकने की घटना निंदनीय और सभ्यता के विरुद्ध है.

मंगलवार को दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान वर्ष 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों के बारे में सवाल-जवाब करते समय एक सिख पत्रकार उत्तेजित हो गया और उसने अपना जूता चिदंबरम पर फ़ेंका. जूता चिदंबरम को लगा नहीं बल्कि बग़ल से गुज़र गया.

सभ्यता के ख़िलाफ़

बीबीसी से विशेष बातचीत में उनका कहना था, "सार्वजनिक मंच पर किसी व्यक्ति पर जूता फेंकना या मारना, गालियाँ देना सभ्यता की पहचान नहीं है."

 सार्वजनिक मंच पर किसी व्यक्ति पर जूता फेंकना या मारना, गालियाँ देना सभ्यता की पहचान नहीं है. इसमें नक़ल, लोकप्रियता और कम जोखिम जैसी चीज़ें हैं, क्योंकि इसमें जेल की सज़ा भी नहीं होगी
दीपांकर गुप्ता

उनका ये भी कहना है कि इस बिंदु पर भी सोचने की ज़रुरत है कि क़ानून को तोड़ने वाला किसी भी हालत में सज़ा के बग़ैर छूट न जाए. उनका कहना है कि क़ानून तोड़ने वाले लोग काफ़ी प्रभावशाली होते हैं, 'अगर ये छूट जाते हैं, तो ये भी सभ्यता के विरूद्ध है.'

जब उनसे ये पूछा गया कि क्या ये घटना राजनीतिक व्यवस्था से लोगों की निराशा झलकाती है तो उनका कहना था, "देश में राजनीतिक व्यवस्था की वैधता कम हुई है, क्योंकि हमने देखा कि गुजरात में दंगे हुए, लेकिन दोषियों को सज़ा नहीं मिली, उसी तरह वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों में हुआ."

'सज़ा मिलनी चाहिए'

दीपांकर के अनुसार ऐसे में पीड़ित समुदाय को लगता है कि उन्हें इंसाफ़ नहीं मिला, उनकी देख-भाल कोई नहीं करता और संविधान का पालन नहीं हो रहा है, इसीलिए ऐसी हरकतों को हवा मिलती है.

 देश में राजनीतिक व्यवस्था की वैधता कम हुई है, क्योंकि हमने देखा कि गुजरात में दंगे हुए, लेकिन दोषियों को सज़ा नहीं मिली, उसी तरह वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों में हुआ
दीपांकर गुप्ता

हालांकि दीपांकर गुप्ता ने स्पष्ट किया कि दोनों तरह के रुझान निंदनीय है, न लोगों को ऐसे हमले करने की इजाज़त होनी चाहिए और न ही कोई प्रभावशाली व्यक्ति अपने जुर्म की सज़ा पाए बिना छूट जाए.

जूता फेंकेने की घटनाओं की वजह बाते हुए दीपांकर का कहना था," इसमें नक़ल, लोकप्रियता और कम जोखिम जैसी चीज़ें हैं, क्योंकि इसमें जेल की सज़ा भी नहीं होगी."

उनका कहना है कि ऐसी घटनाओं के बाद जूता फेंकने वाले को लगता है कि उनका मुद्दा उछल गया लेकिन ये ख़तरनाक रुझान है.

ग़ौरतलब है कि पिछले साल दिसंबर में अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के साथ इराक़ में इसी तरह की घटना घटी थी.

वेन जियाबाओअब जियाबाओ पर जूता
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में चीनी प्रधानमंत्री जियाबाओ पर एक युवक ने जूता फेंका.
बुश बुश पर जूते फेंके
इराक़ पहुँचे अमरीकी राष्ट्रपति बुश पर एक इराक़ी पत्रकार ने जूते फेंके.
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