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आंध्र: त्रिकोणीय लड़ाई, एक बड़ा मुद्दा नहीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आंध्र प्रदेश में लोकसभा की 42 सीटों और विधानसभा के लिए एक साथ हो रहे चुनावों में कई बातें अनूठी हैं. महत्वपूर्ण ये है कि तीस साल में पहली बार त्रिकोणीय लड़ाई हो रही है और दूसरा यह कि इस बार कोई एक सबसे बड़ा मुद्दा नहीं है. पिछले तीस साल में पहली बार त्रिकोणीय लड़ाई में कांग्रेस, तेलुगुदेशम के नेतृत्व वाले गठबंधन और सिने स्टार चिरंजीवी की प्रजा राज्यम पार्टी का मुक़ाबला होगा. तेलुगुदेशम के गठबंधन में टीडीपी के अलावा तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (टीआरएस), सीपीआई और सीपीएम शामिल हैं. इस बार पूरे राज्य में कोई एक सबसे बड़ा मुद्दा नहीं है. ऐसा प्रतीत होता है कि मुद्दों की जगह व्यक्तित्व इस चुनाव में ज़्यादा बड़ी भूमिका अदा कर रहे हैं. स्थानीय मुद्दे ज़्यादा महत्वपूर्ण एक ज़िले से दूसरे ज़िले में जाएँ और एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाएँ तो चुनावी स्थिति बदली हुई नज़र आती है. लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ-साथ होने के कारण राष्ट्रीय मुद्दों की जगह स्थानीय मुद्दे ज़्यादा महत्वपूर्ण नज़र आ रहे हैं. राज्य में सत्ता की चुनावी जंग ने राष्ट्रीय चुनावों यानी लोकसभा की सीटों के लिए लड़ाई को कुछ हद तक पीछे धकेल दिया है. यदि तेलंगाना का उदाहरण लें तो वर्ष 2004 में पूरे प्रचार में अलग तेलंगाना राज्य की माँग का मुद्दा छाया हुआ था. इस बार उत्तरी तेलंगाना के कुछ क्षेत्रों को छोड़ इस मुद्दे पर ज़्यादा ज़ोर नहीं है. बात यहाँ तक पहुँच गई है कि टीआरएस के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव को महबूबनगर चुनाव क्षेत्र में मुश्किल का सामना करना पड़ रहा था और उन्हें इस सीट को छोड़ कर दूसरी जगह से चुनाव लड़ना पड़ा है. महबूबनगर चुनावी क्षेत्र में पड़ने वाले करीमनगर शहर में एक इंटरनेट कैफ़े चलाने वाले रमन्ना रेड्डी कहते हैं, "राव से लोग इतने ज़्यादा निराश हैं कि वे तेलंगाना राज्य बनने की उम्मीद ही गँवा बैठे हैं. यदि वे यहाँ से चुनाव लड़ते तो हार जाते."
वर्ष 2004 के चुनावों के मुकाबले में इस बार अंतर ये भी है कि टीआरएस पिछली बार कांग्रेस के साथ थी लेकिन इस बार टीडीपी के साथ है. लेकिन इससे तेलंगाना के लोग ख़ुश नहीं हैं क्योंकि पिछले साल तक टीडीपी तेलंगाना की माँग का विरोध कर रही थी. कांग्रेस का कारगुज़ारी पर ज़ोर हर पार्टी अलग मुद्दा उठा रही है. सत्ताधारी कांग्रेस और मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी का प्रचार राज्य सरकार की कारगुज़ारी पर आधारित है. कांग्रेस कई राहत योजनाओं का डंका पीट रही है जिनमें किसानों के लिए मुफ़्त बिजली, दो रुपए प्रति किलो के दाम पर चावल देने, पेंशन योजनाएँ, छात्रों को स्कॉलरशिप देना और ग़रीबों के लिए मुफ़्त स्वास्थ्य बीमा योजना शामिल हैं. रेड्डी सिंचाई योजनाओं का हवाला देकर किसानों को रिझाने की कोशिश में लगे हुए हैं. उन्होंने बीबीसी बातचीत में दावा किया, "हमारी सरकार के प्रदर्शन और काम के जो नतीजे नज़र आए हैं, उनके आधार पर लोग हमारे पक्ष में मतदान करेंगे." लेकिन ज़मीनी स्थिति ये है कि लोग नाराज़ हैं कि इन योजनाओं के फ़ायदे उन तक नहीं पहुँचे हैं. किसानों को वादे के अनुसार सात घंटे बिजली नहीं मिल रही है और जो परिवार किसानों की आत्महत्याओं से प्रभावित हैं, उन्हें भी मदद नहीं मिली है. अब भी आत्महत्याएँ हो रही हैं. लेकिन इसका असर कांग्रेस के प्रचार पर नज़र नहीं आता क्योंकि पार्टी ने नौ घंटे मुफ़्त बिजली और रियायती दरों पर चावल की सीमा चार किलो से छह किलो बढ़ाने का वादा किया है. टीडीपी के वादे और आलोचना टीडीपी गठबंदन का प्रचार आलोचना के साथ-साथ वादों पर चल रहा है. एक तरफ़ चंद्रबाबू नायडू और टीआरएस के राव मुख्यमंत्री पर भष्ट्राचार का आरोप लगा रहे हैं तो दूसरी ओर वे अपने गठबंधन को लोगों के असल मसीहा के रूप में पेश कर रहे हैं. नायडू ने अपनी सारी पूरानी नीतियों से मुँह फेर लिया है और कहा है कि इनसे ग़रीबों का भला नहीं हुआ है. बीबीसी के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, "हमने अभूतपूर्व - पैसा देने की स्कीम- घोषित की है जिसके तहत सबसे ज़्यादा ग़रीब परिवारों को 2000 रुपए प्रति माह, कम ग़रीबों को 1500 रुपए प्रति माह और निम्न मध्य वर्ग को 1000 रुपए प्रति माह दिया जाएगा." राज्य में तीसरी ताकत बनकर सामने आई प्रजा राज्यम पार्टी के सिनेस्टार से राजनीतिक नेता बने चिरंजीवी जहाँ भी जा रहे हैं, उन्हें सुनने जनता की भीड़ उमड़ रही है. टीकाकारों का मानना है कि इस पार्टी की चुनावों में अहम भूमिका हो सकती है. लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहा है, वैसे-वैसे पार्टी में अव्यवस्था की स्थिति बढ़ रही है. कई वरिष्ठ नेता पार्टी के अलग हो गए हैं और उन्होंने ग़लत उम्मीदवारों के चयन और टिकटों बेचे जाने का आरोप लगाया है. प्रजा राज्यम पार्टी ने जो वादे किए हैं उनमें सौ रुपए में एक माह का राशन, सौ रुपए का खाना पकाने का सिलिंडर शामिल हैं. चिरंजीवी का कहना है कि भुखमरी सबसे बड़ी समस्या है. वे कहते हैं, "यदि एक मज़दूर दिन के 80 या सौ रुपए कमाता है तो दो-तीन दिन के वेतन से उसका परिवार पूरे महीने का राशन जुटा पाएगा." लेकिन कुल-मिलाकर इन तीनों खिलाड़ियों में से चिरंजीवी की पार्टी सबसे ज़्यादा कमज़ोर लग रही है. जहाँ तक चुनाव प्रचार में नज़र आ रहे बड़े खिलाड़ियों की बात है, तो चिरंजीवी अपने फ़िल्म स्टार भाइयों - पवन कल्याण और नाग बाबू के साथ जनता को आकर्षित कर रहे हैं जबकि नायडू ने परिवार के फिल्म स्टार एन बालाकृष्णा, एनटीआई जूनियर, तराका रत्ना और कई अन्य को भीड़ जुटाने के लिए मैदान में उतारा है. कांग्रेस के पास जो फ़िल्म स्टार हैं उनका क़द ज़्यादा बड़ा नहीं है और मुख्यमंत्री रेड्डी ही सबसे बड़े स्टार हैं. उन्हें सोनिया गांधी और राहुल का सहयोग मिल रहा है. जाति और समुदाय अहम
इस चुनाव में जाति और समुदाय का भी ख़ासी भूमिका है. सभी पार्टियाँ अपने-अपने तरीके से पिछड़ी जातियों को लुभाने में लगी हुई हैं. राज्य में पिछड़ी जातियों का वोट 50 प्रतिशत से ज़्यादा है. मुसलमानों का लगभग दस प्रतिशत वोट है. जहाँ पिछड़ी जातियाँ विभाजित हैं वहीँ अधिकतर मुसलमान कांग्रेस के पक्ष में नज़र आते हैं. रेड्डी सरकार ने मुसलमानों के लिए चार प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था. आंध्र प्रदेश में इस चुनाव का एक और दिलचस्प नज़ारा ये है कि भाजपा लगभग हाशिए पर है और शायद उसके हाथ कुछेक सीटें ही लगें. पिछली बार कांग्रेस और उसके सहयोगियों को 42 में से 37 सीटें मिली थीं लेकिन इस बार नहीं लगता कि वह अपने प्रदर्शन को दोहरा सकेगी. |
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