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नहीं परहेज़ किसी को बाहुबलियों से | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कहते हैं कि आजकल राजनीति में क़दम रखने के लिए या तो बेपनाह अमीर होने की ज़रुरत है या फिर अपने इलाक़े में दबदबा रखने की. लेकिन सबसे ज़्यादा चौकाने वाली बात ये है कि आजकल ज़्यादा-से-ज़्यादा बाहुबली राजनीति के अखाड़े में आमतौर पर दो-दो हाथ करते दिखाई पड़ते हैं और इन्हें सभी प्रमुख राजनितिक पार्टियां टिकट देती हैं. ये जान कर हैरान होने की ज़रूरत नहीं कि भारत में लगभग सभी राजनीतिक दल इस वायरस के शिकार हैं. चाहे वो मौजूदा गठबंधन हो या फिर विपक्ष में बैठा एनडीए. हर राजनितिक पार्टी में तमाम ऐसे बाहुबली हैं जो इस बार भी 15वीं लोक सभा में चुनाव लड़ कर आने को बेताब हैं. इस सिलसिले में मैंने बिहार से मधेपुरा के सांसद राजेश रंजन यानी पप्पू यादव से ही पूछा कि वो क्या सफ़ाई देना चाहेंगे इस मामले पर. पप्पू यादव ने प्रतिक्रिया वयक्त की, "हम पर तो आप लोग आरोप लगाते हो लेकिन नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताया जाता है उस पर कोई सवाल नहीं करता. जबकि ख़ुद नरेन्द्र मोदी पर आरोप है कि उन्होंने हज़ारों मुसलमानों का क़त्ल करवा दिया वो भी कुर्सी पर विराजमान रहते हुए." उन्होंने आगे कहा, "क्या महाराष्ट्र से लोगों को भगाने वाले बालासाहेब और राज ठाकरे से कोई ये सवाल करता है. और पप्पू यादव जिसने ग़रीबों, पीड़ितों की लड़ाई लड़ी उन्हें आप बाहुबली कहते हो. मेरी पृष्ठभूमि आपको पता है? मैंने जब अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी तब तो मेरे ऊपर कोई केस नहीं था, उस वक़्त में इंटर में था." पप्पू यादव को पहले ही हत्या जैसे संगीन आरोप में उम्र क़ैद की सज़ा हो चुकी है और फ़िलहाल ज़मानत पर जेल से बाहर हैं. तब भी अपनी सफ़ाई के बदले वे दूसरों की ख़ामियां पहले गिनाते है. पप्पू यादव अकेले ही ऐसे व्यक्ति नहीं जिनके ख़िलाफ तमाम आपराधिक मामले होने के बावजूद भी वो लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था के सदस्य हैं या फिर आगे भी रहना चाहते हैं. हाल ही में बहुजन समाज पार्टी द्वारा जारी की गई उत्तर प्रदेश के उम्मीदवारों की सूची पर ही एक नज़र दौड़ाएँ. मुख्तार और अफज़ल अंसारी, अरुण शंकर शुक्ल उर्फ़ अन्ना, धनंजय सिंह और डीपी यादव समेत कई ऐसे बाहुबली बने नेता इस सूची में हैं जिनके ख़िलाफ़ दर्जनों आपराधिक मामले अलग-अलग ज़िलों में दर्ज हैं. ये सब कुछ तब हो रहा है जब भारत की सभी राजनितिक पार्टियाँ लगातार यही कहती चली आ रही हैं कि अपराध और राजनीति को एक दूसरे से मीलों दूर रखना चाहिए. मगर आँकड़ों की हक़ीक़त पर नज़र डालें तो सब साफ़ समझ आ जाता है. 14वीं लोक सभा के 543 सांसदों में से 120 यानी 22 फ़ीसदी सांसदों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज थे. आगामी माह में होने वाले चुनावों के लिए जारी पार्टी उम्मीदवारों की सूचियों को देख कर क्या ये नहीं लगता कि सिलसिला आगे भी जारी रहेगा.
मैंने यही सवाल वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह से पूछा तो उनका कहना है," आज की तारीख़ में अगर आप देखें तो मुझे नहीं लगता कि एक भी पार्टी ऐसी है जिसने अपराधियों को चुनाव में नहीं उतारा हो. वे तो सिर्फ़ यही देखती हैं कि उम्मीदवार में जीतने की क्षमता है या नहीं. बीजेपी सहित सभी मुख्य पार्टियाँ इस धारा में शामिल हैं. इन सभी की दिलचस्पी उम्मीदवार के आपराधिक किरदार में न होकर चुनाव जीतने में है." बड़ी राजनितिक पार्टियाँ जैसे कांग्रेस और बीजेपी भी इसमें पीछे नहीं है. दोनों पार्टी के उम्मीदवारों की सूची में तीस से भी ज़्यादा उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज हैं और मामलों की सुनवाई चल रही है. लेकिन क्या वजह है कि इस पूरे मामले में पार्टियां कोई ठोस राजनीतिक पहल नहीं करती और न ही चुनाव आयोग कोई क़दम उठाता है. अधिकार नहीं मैंने इस पर भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णामूर्ति से बात की तो उन्होंने कहा, "चुनाव आयोग को इस मामले में कोई अधिकार नहीं है. क्योंकि इसके लिए क़ानून को बदलने की ज़रुरत है. चुनाव आयोग सिर्फ़ राजनीतिक दलों से अपील कर सकता है कि वे चुनावों में अपराध या उस तरह की पृष्ठभूमि वाले लोगों को दूर रखें. हालांकि कई तरफ़ से इस तरह की मांगें उठ रही हैं, लेकिन अभी प्रयास ढीले ही हैं." पर क्या दाग़ी और आपराधिक पृष्ठभूमि रखने वाले लोगों के चुनाव लड़ने की प्रथा भारतीय लोकतंत्र में शुरू से ही रही है या फिर ये पिछले कुछ दशकों की ही देन है? इस सवाल का जवाब माँगा मैंने राजनितिक मामलों में विशेष रूचि रखने वाले पत्रकार अजय सिंह से. अजय सिंह ने कहा, "सत्तर के दशक में मुझे आश्चर्य होता था जब सीपीआई के भी कुछ लोग चुनाव में खड़े होते थे जिनका अपराधिक इतिहास होता था. लेकिन बाद में ये अपराधी क्षेत्रीय पार्टियों से जा मिले. इसके बाद राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में भी इन लोगों का आना शुरू हो गया. लेकिन अस्सी के दशक के पास तो उत्तर प्रदेश में कई ऐसे राष्ट्रीय दल थे जिनमें आपराधिक मामलों वाले लोग मौजूद थे. इसी के बाद ये सिलसिला आगे बढ़ता चला गया." तो चाहे वो 70 के दशक की राजनीति हो या फिर 2009 में होने वाले आगामी लोकसभा चुनाव. भारतीय राजनीति में बाहुबलियों की तादाद थमने का नाम ही नहीं ले रही है. चुनाव पास होते हैं तो हर पार्टी का यही मक़सद होता है कौन सा उम्मीदवार पार्टी को एक सीट जितवाने की क्षमता रखता है, भले ही वो दाग़ी ही क्यों न हो. तो मतदाता होने के नाते आप भी इन राजनीतिक बाहुबलियों पर अपनी राय बनाइए और चुनाव के नतीजों का इंतज़ार कीजिए. क्योंकि नतीजे ही बताएँगे की इनमें से कितने लोकसभा की कुर्सी के हक़दार हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें पप्पू यादव को कहाँ रखें: सुप्रीम कोर्ट14 दिसंबर, 2004 | भारत और पड़ोस 'मताधिकार के बिना उम्मीदवार कैसे?'30 अप्रैल, 2004 | भारत और पड़ोस 'पप्पू यादव खुले कैसे घूम रहे हैं'07 मई, 2004 | भारत और पड़ोस सुप्रीम कोर्ट में पप्पू यादव की ज़मानत रद्द18 जनवरी, 2005 | भारत और पड़ोस पप्पू यादव को तिहाड़ लाया गया19 फ़रवरी, 2005 | भारत और पड़ोस पप्पू यादव को उम्र क़ैद14 फ़रवरी, 2008 | भारत और पड़ोस पप्पू यादव को मिली ज़मानत18 फ़रवरी, 2009 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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