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'मताधिकार के बिना उम्मीदवार कैसे?' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार के पटना उच्च न्यायालय ने आपराधिक रिकॉर्ड के साथ जेल से चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा है कि जेल में बंद लोगों को जब मतदान का अधिकार ही नहीं है तो वे चुनाव कैसे लड़ सकते हैं? न्यायालय ने इसे ग़ैर-क़ानूनी मानते हुए चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह चुनाव परिणाम घोषित होने से पहले इस बारे में रुख़ स्पष्ट करे. हालांकि वरिष्ठ वकील शांतिभूषण का कहना है कि वर्तमान क़ानूनों के तहत ऐसे किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता जो किसी मामले में दोषी न ठहराया गया हो. उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रवि स्वरूप धवन और न्यायमूर्ति शशांक कुमार सिंह की खंडपीठ ने ये व्यवस्था दी है. न्यायालय ने इस बात पर भी आपत्ति की कि जेल में बंद रहे कुछ उम्मीदवारों ने बाद में इलाज के बहाने अस्पताल जाकर चुनाव प्रचार किया. न्यायालय ने कहा कि इस पर चुनाव आयोग या राज्य प्रशासन ने कोई आपत्ति क्यों नहीं की, उसे क्यों नहीं रोका?
न्यायालय ने ये भी कहा कि हाजीपुर क्षेत्र से लोकजनशक्ति पार्टी के विधायक रमा सिंह फ़रार घोषित हैं और तीन राज्यों की पुलिस उन्हें खोज रही है ऐसे में वह मतदान करने में सफल कैसे हो गए? न्यायालय ने इस बारे में ज़िला प्रशासन के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए भी कहा है. ये आदेश सीवान लोकसभा क्षेत्र से जनता दल(यू) प्रत्याशी और जन चौकीदार नाम की एक संस्था की दो जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान दिया है. उल्लेखनीय है कि पाँच लोकसभा सीटों से जेल में बंद लोग उम्मीदवार हैं. इनमें पूर्णिया से राजेश रंजन उर्फ़ पप्पू यादव लोकजनशक्ति पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. उनके अलावा बहुचर्चित मोहम्मद शहाबुद्दीन सीवान सीट से राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. रंजीत डॉन बेगूसराय से, बरमेश्वर सिंह आरा से और राजन तिवारी बेतिया सीट से निर्दलीय उम्मीदवारों के रूप में मैदान में हैं. इन लोकसभा सीटों में से सीवान, आरा और बेतिया में मतदान हो भी चुका है. इस फ़ैसले के बाद अब ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि इन क्षेत्रों के चुनाव रद्द किए जा सकते हैं. विशेषज्ञ का मत वरिष्ठ वकील और सामाजिक कार्यकर्ता शांति भूषण से जब बीबीसी से अदालत के निर्देश पर टिप्पणी माँगी तो उनका कहना था, ''जो जेल में होता है वो तो वोट देने जा नहीं सकता क्योंकि जेल में कोई मतदान केंद्र नहीं होता. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि वो चुनाव नहीं लड़ सकता.'' शांति भूषण का कहना है कि जब तक किसी अदालत ने किसी को क़ानून के तहत अयोग्य न ठहरा दिया गया हो और उसे सज़ा न दे दी गई हो उसे चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता. उनका कहना है कि हो सकता है कि यदि किसी पर किसी मामले में केस चल रहा है तो उसे अयोग्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि वो उस मामले से बरी भी हो सकता है. शांति भूषण मानते हैं कि कोई भी व्यक्ति जेल में रहकर भी चुनाव लड़ सकता है. इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जॉर्ज फ़र्नांडिस भी 1977 में जेल में थे और चार लाख वोटों से जीत गए थे. उन्होंने कहा कि इसके लिए संसद को अलग क़ानून बनाकर प्रावधान करने होंगे. |
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