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बुधवार, 21 अप्रैल, 2004 को 19:01 GMT तक के समाचार
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शहाबुद्दीन:आरोपों के बावजूद लोकप्रिय

मोहम्मद शहाबुद्दीन
मोहम्मद शहाबुद्दीन सीवान से तीन बार सांसद रह चुके हैं
गंभीर अपराधों के 19 मामलों में अभियुक्त मोहम्मद शहाबुद्दीन बिहार के सीवान लोकसभा क्षेत्र से तीन बार सांसद रह चुके हैं.

इसे संसदीय लोकतंत्र की विडंबना ही कहा जाएगा कि राज्य के एक पुलिस प्रमुख ने जिस व्यक्ति को देश के सबसे बड़े माफ़िया गिरोह का सरगना बताकर जेल में बंद किया, उस व्यक्ति को सीवान की चुनावी राजनीति में अजेय समझा जाने लगा है.

मोहम्मद शहाबुद्दीन ने बीबीसी से विशेष बातचीत की.

जब कभी आप पर यह आरोप लगता है कि आपका संबंध अंतरराष्ट्रीय गिरोहों से है और पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी (आईएसआई) के सूत्र भी आप से जुड़े हुए हैं, तब कैसा लगता है आपको.

दुःख तो होता है लेकिन अब उतना बुरा नहीं लगता क्योंकि आदत सी हो गई है. यदि आप माइनॉरिटी कम्यूनिटी के हैं तो यहाँ इस तरह का आरोप लगना ही लगना है.

आप कहते हैं, आप के काम से यहाँ के लोग इतने प्रसन्न हैं कि आप को सर-आँखों पर बिठाए रखते हैं. तो फिर आपको निजी सुरक्षाकर्मियों के चाक-चौबंद घेरे में क्यों चलना पड़ता है?

यह सुनी-सुनाई बात है कि मैं हमेशा सुरक्षा के घेरे में चलता हूँ. मैं अकेले भी मोटरसाइकिल और गाड़ी ड्राइव करते हुए घूमता हूँ.

आप को जेल पहुँचाने वाले डीपी ओझा तो डीजीपी पद से हटा दिए गए लेकिन क्या उनसे आप की दुश्मनी अब भी बरक़रार है?

जानता भी नहीं हूँ कि क्या दुश्मनी है, क्या नहीं है. लेकिन जो कार्रवाइयाँ हुईं उनकी तरफ से, वो क़ानून सम्मत नहीं थीं. आज भी वो हमसे लड़ाई लड़ रहे हैं क्योंकि जनहित याचिका (पीआईएल) दायर हुई है उनकी तरफ से. हास्यास्पद बात है कि जो डीजीपी रहा हो, उसे पीआईएल का सहारा लेना पड़ा.

क्या ये सच नहीं है कि आप की राजनीति अपराध और उसके ख़ौफ की बुनियाद पर पली-बढ़ी. आख़िर क्यों आपने ये रास्ता चुना?

देखिए, यदि आप अपराध और अपराधी की बात करेंगे तो पहले यह परिभाषित करना पड़ेगा कि अपराध किसे मानेंगे और इस समाज का असली अपराधी है कौन? दूसरी बात कि मैं बाइस साल की उम्र में ही विधायक बन गया और इसे मैं मुक़द्दर का इत्तफ़ाक ही मानता हूँ कि इस तरह राजनीति में उतरना पड़ा.

लालू प्रसाद यादव और आप के बीच का संबंध कभी खट्टा, कभी मीठा और कभी बहुत ही तीखा नज़र आने लगता है. ऐसा उतार-चढ़ाव क्यों होता रहता है?

ये बातें कहाँ से आती हैं, मुझे नहीं मालूम. राजनीति में आने से पहले से ही मेरा लालू जी से संबंध रहा है. मंत्री बनने या और कोई बड़ा पद पाने जैसी महात्वाकाँक्षा नहीं है मेरी. मैं सीवान के विकास की सीमा में ही रहना चाहता हूँ. रही बात लालू जी से मेरे तीखे-मीठे रिश्ते की, तो यह चलता ही रहेगा क्योंकि यह मेरा व्यक्तिगत मामला है.

क्या आप को ऐसा लगता है कि बिहार का मुस्लिम समुदाय लालू जी से पूरी तरह जुड़ा हुआ है, या लालू जी की पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल से जुड़े रहने में ही मुसलमानों की भलाई है?

किसी की कहीं कोई भलाई नहीं होती. देखिए, हज़ारों साल से बकरियाँ कटती रही हैं लेकिन क्या बकरियों की नस्ल ख़त्म हुई? लेकिन जो डायनासोर दूसरों को मारता रहा, वह ख़ुद समाप्त हो गया. जब कटते जाने के बावजूद बकरियाँ ख़त्म नहीं हो सकीं, तो हम आख़िर इंसान हैं और यह मत कहिए कि मुसलमान किसी डर से किसी के साथ हैं. एक आइडियोलॉजी की बात है जो मुसलमान आज भी लालू के साथ हैं.

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