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बिहार के समीकरणों को समझना मुश्किल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार लोकतांत्रिक राजनीति की किताबी समझ को चुनौती देता है. यह बात आम तौर पर मानी जाती है कि लोग अपनी चुनी हुई सरकार के कामकाज के आधार पर अपना फैसला देते हैं. लेकिन लोकतंत्र नेताओं की सदिच्छा और निस्वार्थपने से नहीं चलता. चुनाव हारने का डर ही उन्हें सही रास्ते पर रखता है. मगर बिहार सारे कायदे-कानूनों से अलग है. लालू प्रसाद यादव की पार्टी, पहले जनता दल और फिर उसी में से निकले राष्ट्रीय जनता दल ने एक दशक से ज्यादा समय से बिहार पर राज किया है. ऐसे में ये सवाल पूछा जा सकता है कि क्यों लालू का बड़ा से बड़ा समर्थक भी नहीं सोचता कि ठीक पाँच वर्षों में उन्होंने बिहार की स्थिति सुधार दी है और सही कहें तो ये दावा वो खुद कभी नहीं करते, चुनावी सभाओं में भी नहीं. आर्थिक आंकड़े भी यही गवाही देते हैं. हर जनमत संग्रह में बिहार के मतदाता अपने प्रदेश के हाल से दुखी ही नज़र आते हैं. बदले समीकरण इसका एक जबाव तो बिहार का बँटवारा है. राज्य की कुल 54 में से 14 सीटों वाला इलाका झारखंड में चला गया है. इन सीटों पर राजद की शक्ति कम थी. अब बाकी बिहार से 40 सीटों पर उसकी औसत ताकत बढ़ गई है.
ऐसा बिहार की सामाजिक बनावट में ही बंटवारे से फर्क आने से हुआ है. नए बिहार की आबादी में यादव और मुसलमान वोटरों का अनुपात पहले से बढ़ गया है. आदिवासी आबादी के दूसरी तरफ कट जाने से राजद को लाभ हुआ है क्योंकि आदिवासियों में पार्टी का आधार न था. बँटवारे से बिहार के राजस्व के संसाधनों में भारी कमी आई है. उसे खनिजों पर रॉयल्टी मिलना बंद हो गई और लगभग सारे कारखाने झारखंड में चले गए हैं. विडंबनापूर्ण लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि ये चीजें लालू यादव की राजनीति में अनुकूल पड़ती है क्योंकि विकास की बात आज किसी पक्ष में नहीं आ रही है और असली मसला यही है. बिहार का दुर्भाग्य यह है कि सिर्फ शासक-दल के एजेंडे से ही विकास गायब नहीं है, पूरी राजनीति से, राजनीतिक चर्चा-कार्यक्रम से यह मुद्दा गायब है. लालू प्रसाद यादव का विकल्प पेश करने का दावा करने वालों की तरफ से भी विकास का कोई विश्वसनीय एजेंडा सामने नहीं आया है. सामाजिक न्याय और समता की तो बात ही अलग है और जब ऐसा एजेंडा हो ही नहीं तो राजनीतिक लड़ाई जातिगत निष्ठाओं की ओर मुड़ जाती है जिसने बहुत ही ठोस रूप ले रखा है और वहाँ बने समीकरण जड़ जैसे हो गए हैं. लालू की सफलता का कारण यही है. विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प सामने न आने पर वही जातिगत समीकरण राजनीति पर भारी पड़ रहे हैं जो अभी लालू के अनुकूल हैं. समर्थन संख्या की दृष्टि से दो सबसे बड़े समूहों-यादव और मुसलमान के इर्द-गिर्द ही लालू ने अपना सामाजिक ताना-बाना बुना है. इन दोनों का राज्य की आबादी में अब करीब 30 फीसदी हिस्सा है.
मुस्लिम-यादव मतों में से दो तिहाई से लेकर तीन चौथाई तक वोट पा जाने का मतलब है कि राजद का उम्मीदवार किसी भी चुनाव में मुकाबले में आ जाता है. लेकिन इतने भर से सत्ता निश्चित नहीं होती. इस फासले को भरने के लिए लालू प्रसाद यादव ने अति पिछड़ों, दलितों और आम गरीबों में भी अपना आधार बनाया है. बिहार के सामंती समाज में जब यह सामाजिक ताना-बाना बुना गया तब यह अपने-आप में कुछ हद तक क्रांतिकारी था. लालू का पहली बार सत्ता में आना पिछड़ों में स्वाभिमान और मुसलमानों में सुरक्षा का ठोस भाव जगाने के लिए जाना गया. लेकिन धीरे-धीरे निचले स्तर से उठा यह उभार भी राज्य को निरंतर पिछड़ा रखने जैसे बहुत ही प्रतिगामी व्यस्त स्वार्थ की चपेट में आ गया. आज बिहार करीब-करीब दो पक्के खेमों में बंट चुका है- अगड़ी जातियां किसी भी कीमत पर लालू यादव को पछाड़ना चाहती है जबकि मुस्लिम-यादव वोट बैंक आँख मूँदकर उनका समर्थन करता है. पहला समूह आज भाजपा के साथ है. लालू का समर्थन जैसे-जैसे अन्य पिछड़ों और गरीबों में कम होता गया या कोई पिछड़ी जाति लालू विरोधी खेमे में जा मिली, तब कमजोरियां भी दिखीं. दूसरा खेमा राज्य की राजनीति में नीतीश कुमार के उभरने और जनता दल में टूट से कुर्मी वोट अलग होने से भी फर्क पड़ा. नीतीश के इस कुर्मी आधार और रामविलास पासवान के साथ दुसाध वोटों के भाजपा के संग जुड़ने से फर्क पड़ा और इसी के चलते 1999 के लोकसभा चुनाव में लालू को धूल चाटनी पड़ी.
लेकिन इस लालू विरोधी खेमे में ऊंची जाति के वर्चस्व वाली स्थिति बनी रही और गरीबों-पिछड़ों का इसके प्रति कभी बहुत भरोसा नहीं बना. चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों से भी इस चुनाव में कोई बहुत ठोस नए जातिगत समीकरण नहीं दिखते. बड़ी जातियां अभी भी भाजपा के साथ हैं तो मुस्लिम-यादव राजद के साथ. कुर्मियों का समर्थन राजग के लिए है पर उनमें पहले वाला उत्साह नहीं दिखता. दुसाध वोटों में राजद की तरफ स्पष्ट झुकाब दिखता है. अन्य दलित जातियों में लालू के प्रति पहले से कम उत्साह है. अति पिछड़ों में राजग के प्रति रूझान है, पर यह निर्णायक नहीं है. गठबंधन सर्वेक्षण में यह बात भी सामने आई है कि लोग निवर्तमान सांसदों से बहुत नाराज हैं.
ऐसी स्थिति में राजनीतिक जोड़-तोड़ और चुनावी रणनीति की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है. लालू यादव गैर-एनडीए मतों का बंटवारा न होने देने का महत्व समझते हैं और उन्होंने बहुत सफलतापूर्वक एक बड़ा गठबंधन बना भी लिया है. कांग्रेस, रामविलास पासवान, राष्ट्रवादी कांग्रेस और माकपा को साथ लेकर उन्होंने मजबूत चुनौती पेश की है. पासवान के आने से दुसाध मतों का ठोस लाभ हुआ है क्योंकि दलितों में यही मजबूत और संगठित जाति है-उत्तर प्रदेश के जाटवों की तरह. उनके साथ आने से हर इलाके में उसे 5 फीसदी वोटों का फर्क पड़ेगा. अगर राजग को दिलाए वोटों में से आधा भी पासवान अपने साथ ले आने में सफल होते हैं तो राज्य में राजनीतिक समीकरणों में भारी बदलाव आ जाएगा. इतने भर से राज्य की 22 सीटें राजद की अगुवाई वाले गठबंधन के पास आ जाएंगी. अगर केंद्र सरकार के खिलाफ़ हल्की नाराजगी भी उभरी तो भाजपा-जनता दल यूनाईटेड गठबंधन धुल जाएगा. मौजूदा राजनैतिक समीकरण के मद्देनजर 1999 की तुलना में एनडीए का नुकसान तय है. इस ऊपरी और राज्य स्तरीय चर्चा से बिहार की राजनीति ठीक से नहीं समझी जा सकती, क्योंकि जहां हर क्षेत्र का अपना समीकरण और उम्मीदवारों का अस्तित्व भी बहुत निर्णायक भूमिका निभाता है. |
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