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पहले दिल जुड़े फिर दल जुड़े: पासवान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लोक जनशाक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान का कहना है कि वो प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं लेकिन कुर्सी ख़ाली नहीं है. साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि वो मुख्यमंत्री बनकर बिहार के दलदल में नहीं पड़ना चाहते हैं. रामविलास पासवान से हुई लंबी बातचीत के अंश. सारे मतभेदों को अलग रखते हुए ये कहा जा सकता है कि 2004 के चुनाव में आप लालू यादव और कांग्रेस मिल के लड़े थे. अगर इस बार के चुनाव से उसकी तुलना करें तो ये नज़र आता है कि इस बार आप लालू प्रसाद के साथ अच्छे तालमेल के साथ चुनावी मैदान में उतरे हैं. उस समय ऐसी स्थिति नहीं थी? मैं मानता हूं कि जब भी कोई दल मिलता है तो दल के मिलने से पहले दिल को मिलना होता है. उस समय दल का मिलन तो हो गया था लेकिन दिल का मिलन उतना नहीं हो पाया था. इस बार पिछली ग़लतियों से सबक़ लेते हुए हम लोगों ने कोशिश किया है कि पहले दिल मिले और उसके बाद दल भी मिले. यानी इस बार आप दोनों नेता एक दूसरे के वोट को एक दूसरे के लिए ट्रांसफ़र कराने में कामयाब होंगे? हम लोग तो पिछली बार भी कामयाब हुए थे. लेकिन स्थानीय नेताओं की वजह से कहीं न कहीं कुछ ख़ामियाँ रह गई थीं जैसे अररिया वग़ैरह में. लेकिन इस बार ये कोशिश की जा रही है कि दोनों तरफ़ से कहीं कोई चूक नहीं हो. हाल के दिनों में इस्पात कारख़ानों के खुलने पर या जो भी इकाइयाँ बनी हैं उसको लेकर एनडीए के बड़े नेताओं और बिहार के मुख्यमंत्री ने भी कहा है कि इसकी असलियत कुछ दिनों में सामने आएगी, वो सब ख़ुलासा होगा कि कैसे वहाँ घपला हुआ है. हम तो स्वागत करते हैं कि ख़ुलासा करें. अब वो हम पर ये आरोप लगाते हैं कि महनार में जो ज़मीन ख़रीदी गई उसमें किसानों को ज़्यादा दाम दिए गए. नहीं आरोप यह है कि लोजपा के लोगों ने पहले सस्ते में ज़मीन ख़रीदी और फिर बाद में उसे ऊंचे दामों में बेचा नहीं नहीं, आप तो बीबीसी के हैं आप जाइए और वहां के किसानों से पूछिए कि उन्होंने ज़मीन किस क़ीमत पर ख़रीदी है, राइट टू इंफ़ार्मेशन एक्ट है उससे पता चला लीजिए कि किस दर पर ज़मीन ख़रीदी गई है और कितना भुगतान किया गया है. सेल के ज़रिए कोसी इलाक़े में जो राहत कार्य चलाया गया कहा जाता है कि व्यक्ति प्रचार ज़्यादा हुआ देखिए वह हर चीज़ में होता है कि ‘माल महाराज का मिर्ज़ा खेले होली’. भारत सरकार का 16 हज़ार करोड़ रूपया है और प्रचार नीतीश कुमार क्यों करवा रहे हैं. इनके पास ख़ज़ाने में कितना पैसा है. बिहार सरकार के पास कहां से पैसा आ रहा है हमें बताइए. ये तो भारत सरकार का ही पैसा लेकर सारी टंडैली हो रही है. हमारी कॉर्पोरेट सोशल ज़िम्मेदारी है और उसके सीएसआर के तहत 36 करोड़ रूपए में से जितने अच्छे तरीक़े से पैकेज का वितरण सेल ने किया है उतने अच्छे तरीक़े से उनके एक हज़ार करोड़ का बंटवारा नहीं हुआ है. सरकार से एक हज़ार करोड़ रुपए जो आए हैं उसके लिए जांच होनी चाहिए कि नीतीश कुमार ने कहां ख़र्च किया है. रामविलास जी, 14 हज़ार 800 करोड़ रूपए के विशेष पैकेज की जो मांग हुई थी बिहार सरकार की तरफ़ से कहा जा रहा है कि उसमें से एक धेला भी आप नहीं दे रहे हैं और लगातार टाल रहे हैं? हम उन्हें क्यों देंगे एक ढ़ेला जब तक डीपीआर न हो. हमारे यहां हाजीपुर में हमने उनसे कहा कि भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने हाजीपुर को एक मॉडल टाउन के तौर पर चुना है उसके लिए एक डीपीआर बना कर भेजिए. अभी तक उन्होंने डीपीआर नहीं भेजा और ये लोग भारत सरकार के ऊपर आरोप लगाते हैं. कहा जा रहा है कि कुछ इस्पात इकाइयाँ स्थापित हो रही हैं जो प्राइवेट सेक्टर में ऐसी बहुत सारी निजी इकाइयाँ हैं उन्हें रामविलास जी कारख़ानों का नाम दे रहे हैं हमने इसे कारख़ाने का नाम कहां दिया है. ये स्टील प्रॉसेस मेकिंग इंडस्ट्रीज़ है. धीरे धीरे हमारा लगाया हुआ ये पौधा वृक्ष बनेगा लेकिन मैं पूछता हूं कि तुमने क्या किया. अंबानी को बुलाया फ़लां-फ़लां को बुलाया लेकिन तीन साल में एक सुई का कारख़ाना भी तो नहीं लगाया. उनसे पूछिए की सारे कारख़ाने जो यहां बंद हुए, उस समय नीतीश जी दिल्ली में मंत्री थे. क्या आप को भी ऐसा लगता है कि चुनाव परिणाम को लेकर काफ़ी भ्रम बना हुआ है कुछ भी साफ़ नहीं दिख रहा है? ऐसा कुछ नहीं है, बिहार में तो नक़्शा बिल्कुल साफ़ है, बिहार में लोजपा-राजद चुनाव स्वीप करेगा. जैसा कि मैंने कहा इनकी पार्टी ताश के पत्तों की तरह बिखर रही है, जॉर्ज फ़र्नांडिस से लेकर सारे के सारे नेता चाहे वो दिग्विजय सिंह हो या जगन्नाथ मिश्र हों, नागमणि हों, राम जीवन सिंह हो, ये सारे के सारे लोग पार्टी छोड़-छोड़ कर भाग रहे हैं, और लोग भी भागेंगे. मुस्लिम समाज के बारे में आप का क्या विचार है? मुसलमान एटजुट हैं. एक ओर अगर वे कहते हैं कि हम मुसलमान के हितैषी हैं तो बताएं आपका मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री कौन होगा. प्रधानमंत्री तो आडवाणी ही न होंगे तो क्या मुसलमान आडवाणी को वोट देंगे. उनके भाषण कुछ हैं, विचारधारा कुछ है, एक्ट अलग फ़ैक्ट अलग. यहां तीन साल में कुछ भी अच्छा हुआ या नहीं? कुछ भी अच्छा तो होता ही. जब बच्चा पैदा होता है तो एक फ़ीट का होता है, बीस साल में एक फ़ीट से चार फ़ीट हो गया तो ये तो नहीं कहेंगे कि उसका विकास नहीं हुआ है. लेकिन ये तो कहेंगे कि बौना बच्चा हुआ है. कांग्रेस के मंत्रियों ने और केंद्र के मंत्रियों ने सराहना की है पता नहीं कांग्रेस के मंत्री ने सराहना की है या नहीं अगर की है तो उन्हें एनडीए को समर्थन दे देना चाहिए. ये तल्ख़ी जो बढ़ी है तो लगता है कि चुनाव परिणाम आने के बाद भी आप लोग एक नहीं होंगे? एक होने की बात नहीं है. हम लोगों की लड़ाई कांग्रेस से तो है नहीं. हम तो चाहते हैं कि एनडीए का ख़ात्मा हो. सिर्फ़ आपके दल पर नहीं बल्कि सारे दलों पर ये आरोप है कि बाहुबलियों से मुक्ति नहीं मिल पा रही है, आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग किसी न किसी बहाने आ ही जा रहे हैं और तरजीह भी पा रहे हैं. ऐसा क्यों हो रहा है?
उसमें तो काफ़ी कड़ाई हो गई है. चुनाव आयोग ने एक क़ानून बना दिया है कि जो लोग भी सज़ायाफ़्ता हैं उनको एक निश्चत अवधि तक उम्मीदवार नहीं बनाया जा सकता है तो आपने देखा इस बार बहुत से लोग उसमें छंट गए हैं. लेकिन उनकी पत्नियाँ आ गई हैं चुनावी मैदान में देखिए प्रजातंत्र में उनको कैसे रोक सकते हैं. उनको रोकना तो सिर्फ़ जनता के हाथ में है कि वे किसको जिताते हैं. लेकिन ये पार्टी के हाथ में भी तो है कि वह टिकट देने में परहेज़ रखें टिकट देने में हम लोग परहेज़ रखते हैं. हमारे ऊपर एक ही आरोप है कि हमने सूरजभान सिंह को टिकट दिया था, लेकिन हमने कई बार कहा है कि सूरजभान सिंह के भूत और वर्तमान में कोई तुलना नहीं है. आज के दिन मैं ये जानता हूं कि पिछले पांच साल में सूरजभान सिंह ने जनता के लिए जो काम किया है और जो उनका आचरण और व्यवहार है मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि किसी भी दृष्टिकोण से वह बाहुबली नहीं हैं. लेकिन मैं फिर कहना चाहता हूं कि अतीत के बारे में मुझे नहीं मालूम है. चनाव आयोग के क़ानून की लपेट में सूरजभान सिंह भी आ गए, पप्पू यादव, आनंद मोहन और शहाबुद्दीन भी आ गए. बहुत सारे लोग है जो इसमें आ गए. जब मुन्ना शुक्ला और बहुत सारे लोगों ने आपकी पार्टी को छोड़ा तो उस समय आप को बहुत दुख हुआ था और आपने कहा था कि हमने ग़लती की है जो ऐसे लोगों को हमने शामिल कर लिया था. अब उनसे मुक्ति मिल रही है. लेकिन क्या सचमुच में मुक्ति मिली है? ये तो एक प्रॉसेस है. लोग टिकट के लिए आते हैं. हम लोग भी देखते हैं कि कौन चुनाव जीत सकता है, कभी कभी किसी के घर को तोड़ना होता है तो बुलडोज़र लगा कर ही तो घर को तोड़ा जाता है लेकिन घर को बनाने के लिए ईंट का इस्तेमाल होता है. ये लोग ईंट का काम नहीं कर सकते हैं. इसलिए जब हमारे सामने सरकार बनाने का मामला आया तो हमने कहा कि हम ऐसे तत्वों को लेकर सरकार नहीं बनाएंगे और इसलिए हमने ये शर्त रख दी थी कि मुस्लिम मुख्यमंत्री हो. तो जो जाने वाले थे चले गए. नेता तो वह है जिसके पीछे जनता है. ये सब एमएलए और एमपी तो बुलबुला हैं, आएंगे जाएंगे. उसको पार्टी की ताक़त नहीं माना जा सकता है. इसलिए मुझे कोई दुख नहीं हुआ था. हम तो सिर्फ़ मुस्कुरा कर देख रहे थे. जिस समय बिहार विधानसभा भंग हो रही थी, हम तो कैबिनेट में गए भी नहीं थे. हम तो चाहते थे कि उन लोगों को मौक़ा दे दिया जाए कि उन लोगों के साथ मिलकर सरकार बनाने से उन्हें क्या लाभ या हानि होती है उन्हें पता चल जाए. बिहार की सत्ता में आप जानबूझ कर नहीं आ रहे हैं या आप को मौक़ा नहीं मिल रहा है? हमारा मुख्य उद्देश्य बिहार का विकास है और बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी हमारे लिए कोई ज़्यादा महत्व नहीं रखती है इसलिए कि हम आज से 32 साल पहले 1977 में राष्ट्रीय राजनीति में चले गए. भारत में ही नहीं संसार में सबसे ज़्यादा वोट से जीते. जब एक आदमी राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में चला जाता है तो उसका दृष्टिकोण राष्ट्रीय हो जाता है. फिर राज्य में आकर उसी दलदल में फंसना. हमारे बिहार का आदमी पत्रकारिता में जाता है तो सबसे अच्छा पत्रकार माना जाता है. आईएएस बनता है तो सबसे बेहतर माना जाता है, बाहर वो सबसे अच्छा कहलाता है लेकिन घर में आकर क्यों बदनाम हो जाता है तो इसलिए हम दलदल में फंसना नहीं चाहते हैं. लेकिन अगर आप को खींच कर इसी दलदल में ले लाय गया तो आप क्या करेंगे? जब नीतीश जी को लग रहा था कि लालू यादव आ जाएंगे तो वो कह रहे थे कि ज़बर्दस्ती रामविलास जी को मुख्यमंत्री बनाएंगे. उन्हें खदेड़ कर लाएंगे. हमने उस समय भी कह दिया था कि जब तक हम नहीं चाहेंगें हमें कैसे मुख्यमंत्री बनाएंगे. दलित वर्ग को इस देश में सत्ताशीर्ष पर ले जाने वाला माहौल बन पाया है क्या? दो चीज़ें हैं. एक ये कि दलित अपने बलबूते पर सत्ता हासिल करे जो पहले बहुजन समाज पार्टी नारा देती थी. एक ये कि दलित को सत्ता में ले जाया जाए तो ऐसा तो कई बार हो चुका है. जगजीवन राम अगर प्रधानमंत्री बन भी जाते तो भी कोई बहुत ज़्यादा फ़र्क़ तो नहीं पड़ने वाला था. तो इस नज़रिए के तहत आप का लक्ष्य भारत का प्रधानमंत्री बनना है या नहीं? देखिए जो भी कोई राष्ट्रीय नेता है वो भारत का प्रधानमंत्री तो बनना चाहता है, हर आदमी बनना चाहता है. अगर मैं कहूं कि मैं नहीं बनना चाहता तो यह पाखंड होगा. लेकिन प्रधानमंत्री की जगह जब ख़ाली होगी तभी तो कोई प्रधानमंत्री बनेगा. अभी तो वेकेंसी ही नहीं है. हमें तो लगता है कि अगले समय में भी वेकेंसी नहीं है. दस बीस सीटों के जो हक़दार हैं अगर वो प्रधानमंत्री बनना चाहते हों और जो सौ डेढ़ सौ के हक़दार हैं वो नहीं जा पाते हैं. जब आप की स्थिति ऐसी बनती है कि आप भी 100-150 सीटों को लेकर संसद जाएंगे तभी आप उसके हक़दार हैं? साझा सरकार में ये योग्यता नहीं है, वहां तो यही योग्यता है कि सबसे बड़ी पार्टी को ये मौक़ा दिया जाए. मान लिया जाए कि आप को 272 सीट चाहिए और मान लीजिए की कांग्रेस पार्टी को अभी 140 सीट है सबसे बड़ी पार्टी है तो मनमोहन सिंह के नाम पर सहमति हो गई, कल कांग्रेस को 120 ही सीट आती है, या मान लें बड़ी पार्टी पर सहमति नहीं हो पाती है तो प्रधानमंत्री तो वो होगा जिस पर आम सहमति होगी. आम सहमति में अंकों का खेल नहीं होता है. उसमें तो मधु कोड़ा जैसा आदमी भी मुख्यमंत्री बन गया. आम सहमति सबसे बड़ी बात है. एक समय में देवगौड़ा जी के नाम पर ही आम सहमति हो गई थी उस समय में कांग्रेस तो सबसे बड़ी पार्टी थी. गुजराल जी के नाम पर आम सहमति हो गई थी. लेकिन ऐसे में देश कमज़ोर नहीं होता है? नहीं, देश कमज़ोर नहीं होता है. जितने भी क्रांतिकारी काम हुए हैं वह अल्पसंख्यक सरकार में ही हुए हैं. इंदिरा गांधी ने प्रिवी पर्स को उस वक़्त ख़त्म किया था जब उनकी सरकार अल्पमत में आ गई थी. जब जनता मज़बूत होती है तो सरकार हमेशा कमज़ोर रहेगी और जिस समय सरकार मज़बूत होती है जनता कमज़ोर पड़ जाती है. आज अगर कोई पार्टी बहुमत में आ जाए तो जनता की आवाज़ तो ऐसे ही कुचल जाएगी. इसमें एक डर होता है कि एक साल पर फिर से चुनाव हो जाए कि दो साल बाद. इसके लिए हम सुझाव देते आए हैं कि संविधान में संशोधन करना चाहिए और ऐसी व्यवस्था करना चाहिए की संसद का काल पांच साल का ही हो. जैसे हम अविश्वास प्रस्ताव लाते हैं वैसे ही संसद में ही हम सहमति भी ला सकें. जैसे अगर हमें मनमोहन सिंह से असहमति है तो वहीं ये सामने आना चाहिए कि क्या हमें आडवाणी पर सहमति है. वहीं वोट हो जाए, एक प्रधानमंत्री हटे वहीं दूसरा प्रधानमंत्री बन जाए, एक मुख्यमंत्री हटे दूसरा बन जाए. तो आपके इस प्रस्ताव को किसी ने कभी गंभीरता से नहीं लिया? हमको लगता है कि आप गंभीरता से लेंगे, बीबीसी गंभीरता से लेगी. |
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