'मोदी के राग बलोच के लिए पाक ज़िम्मेदार'

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में बलूचिस्तान और गिलगित-बल्तिस्तान का ज़िक्र किया.

पाकिस्तान के इन प्रदेशों का ज़िक्र लालकिले से शायद पहली बार हुआ है. मोदी ने कहा, "पिछले कुछ दिनों में बलूचिस्तान, पाक अधिकृत कश्मीर, गिलगित-बल्तिस्तान के लोगों ने मेरा आभार जताया है. दूरदराज़ बैठे लोग हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री का आदर करते हैं तो ये मेरे सवा सौ करोड़ देशवासियों का सम्मान है. मैं उन लोगों का आभार जताना चाहता हूं."

प्रधानमंत्री मोदी के इस भाषण के बाद बलूचिस्तान में आंदोलन चला रहे लोगों ने उनकी सराहना की है.

इससे पहले भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर में हिज्बुल कमांडर बुरहान वानी की मुठभेड़ में मौत के बाद भड़के हिंसक प्रदर्शनों पर पाकिस्तान सरकार और यहां तक कि प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने ज़ोरशोर से बयान दिए थे और काला दिवस मनाया था.

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अब पाकिस्तान ने सोमवार को भारत को कश्मीर पर बातचीत का न्यौता देते हुए कहा कि इस मुद्दे को सुलझाना दोनों देशों का 'अंतरराष्ट्रीय दायित्व' है.

दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव के बीच इस बातचीत की पेशकश का आख़िर क्या मतलब है?

  • भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल का विश्लेषण, उन्हीं के शब्दों में-

"पाकिस्तान ने जो चिट्ठी लिखी है, उसे बस एक कूटनीतिक खेल समझना चाहिए.

रूस के उफ़ा में हुई मुलाक़ात के बाद दोनों तरफ़ से बातचीत का माहौल बनने लगा था.

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में पिछले कई हफ्ते से हिंसा और तनाव है.

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इमेज कैप्शन, भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में पिछले कई हफ्ते से हिंसा और तनाव है.

कुछ समय पहले जब पाकिस्तान के विदेश सचिव अज़ीज़ अहमद चौधरी भारत आए थे और बातचीत चल रही थी, तभी पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने कह दिया कि कश्मीर पर बातचीत हुई है.

भारत कह रहा था कि वो चरमपंथ पर बातचीत करेगा. लेकिन बासित के बयान ने भारत के लिए स्थिति को असहज बना दिया.

आज भी भारत कह रह है कि वो चरमपंथ पर बात करेगा जबकि पाकिस्तान का कहना है कि वो कश्मीर पर ही बात करेगा.

भारत कहता है कि अगर कश्मीर पर बात होगी तो वो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर बात करेगा.

दोनों देशों में अपने-अपने पक्ष को लेकर इतनी दूरी है कि मुझे नहीं लगता कि बातचीत हो सकती है. भारत का रवैय्या पहले से थोड़ा बदला है.

प्रधानमंत्री के स्तर पर पहले कभी नहीं कहा गया कि हम गिलगित-बल्तिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर की बात करेंगे.

पाकिस्तान के बलूचिस्तान में आज़ादी के लिए संघर्ष हो रहा है.

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के बलूचिस्तान में आज़ादी के लिए संघर्ष हो रहा है.

साथ में, बलूचिस्तान की बात भी प्रधानमंत्री ने की है. ये कहा जा सकता है कि इस मामले में भारत का रुख कड़ा हो रहा है.

प्रधानमंत्री के इन क्षेत्रों का ज़िक्र करने के बाद ये मुद्दे अब एजेंडे पर आ गए हैं. प्रधानमंत्री के बयान से बलूचिस्तान मुक्ति संघर्ष को काफ़ी महत्व मिला है, मीडिया में चर्चा हुई है.

भारत के टीवी चैनलों पर उनके नुमाइंदों ने अपनी बात रखी है. इससे पाकिस्तान को ख़ासी मुश्किल हो सकती है.

ऐसा इसलिए क्योंकि बलूचिस्तान की इन ताकतों को अब भारत में पहचान और स्वीकार्यता मिल रही है. इससे तनाव बढ़ेगा.

लेकिन पहल पाकिस्तान की तरफ़ से ही हुई है.

अगर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ कश्मीर में जारी तनाव और हिंसा को लेकर इतने बयान न देते, अभियान न चलाते तो भारत को इस तरह का स्टैंड लेने की ज़रूरत शायद ना पड़ती."

  • पाकिस्तान के मामलों की विश्लेषक आयशा सिद्दीक़ा की राय

"पहले मनमोहन सिंह की हुकूमत कहती थी कि व्यापार होना चाहिए, लोगों के बीच संवाद बढ़ेगा तो कश्मीर का मसला अपने आप हल हो जाएगा.

पाकिस्तान का कहना रहा है कि बड़ा मसला कश्मीर है, पहले उसे हल किया जाना चाहिए. बाकी मसले खुद ही हल हो जाएंगे.

पाकिस्तान अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ये संदेश देना चाहता है कि वो तो बातचीत करना चाहता है, भारत ही ऐसा नहीं चाहता.

अब भारत पहले चरमपंथ पर बात करना चाहता है और कहता है कि बाद में कश्मीर पर भी बात हो जाएगी. इसी को लेकर बात उलझ जाती है.

नवाज़ शरीफ़ अक्सर कश्मीर का मुद्दा इसलिए उठाते हैं क्योंकि उनके पास और कोई चारा ही नहीं है.

हाल में जमाद उद दावा के ऑनलाइन हेड ने नवाज़ शरीफ़ की बेटी को ट्विटर पर उकसाते हुए लिखा- "सीआरपीएफ़ के अधिकारी चरमपंथियों के साथ मुठभेड़ में मारे गए हैं, तुम भी नरेंद्र मोदी के साथ अफ़सोस जताओ."

जमात उद दावा सोचता है कि अगर सब कुछ छोड़ दिया जाए तो शायद नवाज़ शरीफ़ भारत के साथ बेहतर ताल्लुकात बनाने की कोशिश करें.

इसीलिए उन्हें इस कदर घेरा जा रहा है कि वो भारत के साथ बातचीत न चला सकें. नवाज़ शरीफ़ पर यही दबाव है."

(बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय की पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल और पाकिस्तान मामलों की विश्लेषक आयशा सिद्दीक़ा से बातचीत पर आधारित)

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