कितनी मुश्किल है कश्मीर की रिपोर्टिंग?

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कश्मीर से लौटकर

मुझे लगता है कि भारत प्रशासित कश्मीर से रिपोर्टिंग करना सबसे कठिन काम है.

हाल में जब कश्मीर में लोग प्रदर्शन कर रहे थे और सुरक्षा बल उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रहे थे, तब मुझे ये एहसास हुआ कि वहां से रिपोर्टिंग कितनी मुश्किल हो गई है.

श्रीनगर के एसएमएचएस अस्पताल में 200 से अधिक ऐसे प्रदर्शनकारी भर्ती थे जिनके या तो चेहरे पर चोटें आई थीं या आँखों पर. दर्जनों की आँखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई थी. ज़ाहिर है उनके रिश्तेदार और मोहल्ले से आए लोग इससे उत्तेजित थे.

वो अस्पताल के अंदर आने वाले पत्रकारों की पिटाई कर रहे थे. मैंने एक स्थानीय नौजवान से मदद मांगी जो अस्पताल के एक डॉक्टर का दोस्त था. हम लोगों ने अपनी गाड़ियां अस्पताल से बहुत दूर पार्क कर दीं. नौजवान अंदर गया अपने डॉक्टर दोस्त से मिला.

उसने एक घंटे के बाद वापस आकर कहा कि अंदर माहौल बहुत ख़राब है. लोग नाराज़ हैं और मीडिया वालों की पिटाई कर सकते हैं

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हम मायूस होकर वापस लौट आए. अगले दिन हम उस स्थानीय नौजवान के बगैर गए और अपनी गाड़ी अस्पताल के क़रीब पार्क कर दी. मैंने उस डॉक्टर को फोन किया जो स्थानीय नौजवान का दोस्त था.

उन्होंने कहा वो हम से बाहर आकर मिलेंगे. डॉक्टर ने इंटरव्यू के बाद महसूस किया कि बीबीसी को अस्पताल के अंदर आने की इजाज़त मिल सकती है. वो हमें सर्जिकल वार्ड में ले गए, जहाँ उन्होंने हमें दो मरीजों से मिलवाया. उन दोनों मरीजों का उन्होंने ही आपरेशन किया था.

हमें आँखों के इलाज़़ वाले वार्ड में जाना था, जहाँ वो लोग भर्ती थे जिनकी आँखें ख़राब हो गई थीं. डॉक्टर ने कहा वहां ख़तरा ज़्यादा है, मत जाओ.

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लेकिन मेरी ज़िद पर वो हमें वहां तक ले गए. वहां जाकर उन्होंने मुझसे कहा, "मैं तो चला." डॉक्टर भी सहमा हुआ था. आंखों के इलाज़़ वाले वार्ड में 50 के क़रीब मरीज़ थे और उत्तेजित भीड़ की शक्ल में सौ से अधिक की संख्या में लोग.

वो मुझसे कई तरह के सवाल करने लगे. मैंने कहा मैं बीबीसी से हूँ और दो-तीन मरीज़ों से मिलना है. मैं हैरान हुआ जब वो तैयार हो गए. उन्होंने कहा बीबीसी से उन्हें कोई परेशानी नहीं है.

ये मरीज़ वो थे जो सुरक्षाकर्मियों के पैलेट से घायल हुए थे. अगले दिन हम उस अस्पताल में गए जहाँ घायल सुरक्षाकर्मियों का इलाज़ चल रहा था. इस अस्पताल के प्रवेश में हमें कोई परेशानी नहीं हुई.

लड़ने वाले दोनों पक्षों में आपकी पहुँच हो तो इसका मतलब साफ़ है कि हम अपना काम सही से कर रहे हैं.

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ये एक कठिन काम था. बीबीसी की साख पर हमें एक बार फिर से गर्व हुआ. लेकिन मेरी राय हमेशा ऐसी नहीं थी.

बीस साल पहले बीबीसी में नौकरी के लिए इंटरव्यू में मुझसे पूछा गया था कि क्या कश्मीर पर बीबीसी की रिपोर्टिंग निष्पक्ष है?

मेरा जवाब था बीबीसी का झुकाव पाकिस्तान की तरफ है. यही सवाल पाकिस्तान में एक कैन्डिडेट से किया गया, जो बाद में मेरा दोस्त बना. उसने कहा था कि बीबीसी का भारत के प्रति नरम रवैया है. हम दोनों का जवाब सही नहीं था. लेकिन नौकरियां हमें मिल गईं.

कश्मीर पर रिपोर्टिंग करते हुए मुझे 22 साल हो चुके हैं. लेकिन मेरे विचार में आज भी इस मुद्दे पर लोगों की राय विभाजित है. आज भी हर सच्चे पत्रकार के लिए निष्पक्ष रिपोर्टिंग एक बड़ी चुनौती है.

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इसका अंदाज़ा मुझे पिछले हफ़्ते एक बार फिर वहां से रिपोर्ट करने के दौरान हुआ. जब मैंने कश्मीर से भागकर जम्मू में पनाह लेने वाले कश्मीरी पंडितों पर स्टोरी की तो लोगों का कहना था कि आपको केवल कश्मीरी पंडितों की पड़ी है, आपका ध्यान कश्मीर में मारे जाने और घायल होने वाले कश्मीरी मुसलमानों की तरफ बिल्कुल नहीं है.

और जब मैंने घायल प्रदर्शनकारियों पर रिपोर्टिंग की, युवा प्रदर्शनकारियों की राय लोगों तक पहुंचाई, तो सवाल किया गया कि घायल सुरक्षाकर्मियों को नज़रंदाज़ कर रहे हो?

इसके बाद जब घायल सुरक्षाकर्मियों की आपबीती सुनाई तो लोगों ने कहा अस्पताल में दर्जनों ऐसे प्रदर्शनकारी हैं जिनकी हमेशा के लिए आँखों की रोशनी चली गई है...और तुम...

बीबीसी ने जब घायल प्रदर्शनकारियों की ख़बर छापी तो लोगों ने कहा कि तस्वीर का केवल एक रुख दिखाना निष्पक्षता नहीं है.

सच ये है कि बीबीसी कश्मीर के मामले में बिलकुल निष्पक्ष है. बीबीसी का संवाददाता कोई भी हो कश्मीर से आई हर रिपोर्ट पड़ताल के बाद ही छापी जाती है. लेकिन इस मुद्दे पर हर किसी का अलग-अलग दृष्टिकोण है, ठीक उसी तरह से जैसे हमारा और बीबीसी के हमारे पाकिस्तानी साथी का बीबीसी से जुड़ने से पहले था.

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बीबीसी में आने के बाद एहसास हुआ कि हमारी ये सोच ग़लत थी कि बीबीसी का पाकिस्तान की तरफ झुकाव है. उसी तरह से हमारे पाकिस्तानी साथी का नज़रिया कि बीबीसी भारत के पक्ष में है ग़लत था.

हमारी कोशिश ये रही कि हम कश्मीर के मुद्दे से जुड़ी हर आवाज़ और हर विचार को आप तक पहुंचाएं. हमने अगर कश्मीरी युवाओं के विचार जानने की कोशिश की तो वहीं कश्मीरी पंडितों की शिकायतों पर भी रिपोर्ट तैयार की. हमने सुरक्षाकर्मियों और अधिकारियों की राय जानने की कोशिश की तो वहीं प्रदर्शनकारियों की आवाज़ें भी आप तक पहुंचाने की कोशिश की.

कर्फ्यू और संचार व्यवस्था में बाधाओं के कारण रिपोर्टिंग करना पहले से कहीं कठिन था. लेकिन बीबीसी की निष्पक्षता के कारण हमारी टीम का हर खेमे में स्वागत हुआ. ये हमारी निष्पक्षता ही थी जिसके कारण उपमुख्यमंत्री निर्मल सिंह ने हमारे हर मुश्किल सवाल का बुरा माने बगैर जवाब दिया.

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