'अयोध्या विवाद: नाउम्मीद थे हाशिम अंसारी'

- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
अयोध्या के टेढ़ी बाज़ार की छोटी सी गली के एक छोटे से घर में एक छोटे क़द का इतना बड़ा इंसान रहता था, ये हाशिम अंसारी की मौत की ख़बर पाकर उमड़ी भीड़ को देखकर पता चला.
हाशिम अंसारी यूं तो उस रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद के मुकदमे के पैरोकार थे जिसके चलते देश भर में कई सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं, लेकिन यहां तो हिंदू भी उतना ही ग़मग़ीन था जितना कि मुसलमान.
हाशिम अंसारी पिछले 65 साल से बाबरी मस्जिद पर मुसलमानों के हक़ की लड़ाई लड़ रहे थे, लेकिन उनकी कोशिश थी कि ये मसला आपसी मेल-जोल से सुलझे.
अखाड़ा परिषद के पूर्व अध्यक्ष महंत ज्ञानदास के साथ वो इसके लिए प्रयासरत भी थे.
अब उनकी मौत के बाद लोगों में यही सवाल था कि क्या बातचीत के ज़रिए इस मसले के हल होने की उम्मीद है?

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हाशिम अंसारी के बेटे मोहम्मद इक़बाल तो ऐसा ही सोचते हैं.
वो कहते हैं कि नई पीढ़ी की सोच हमसे कुछ अलग हो सकती है, लेकिन चाहते सभी लोग यही हैं कि ये मसला शांति से हल हो. किसी तरह का ख़ून-ख़राबा न हो. हम लोग अपनी पूरी कोशिश करते रहेंगे.
हाशिम अंसारी मुकदमे की पैरवी की विरासत बेटे इक़बाल के ही नाम कर गए हैं.
उनके जनाज़े में शामिल होने के लिए आए उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त महाधिवक्ता और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक ज़फ़रयाब जिलानी का कहना था कि उन्हें इस मसले के आपसी बातचीत से सुलझने की उम्मीद नहीं है क्योंकि अयोध्या के हिंदू और मुसलमान ऐसा चाहते हैं, लेकिन बाहरी लोग नहीं चाहते.

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और यही बाहरी लोग आज ज़्यादा प्रभावी और ताक़तवर हैं.
ज़फ़रयाब जिलानी ने ये रहस्योद्घाटन भी किया कि उम्मीद तो हाशिम अंसारी को भी नहीं थी लेकिन वो ऐसा किसी से कहते नहीं थे.
लेकिन अयोध्या में ये बात आम है कि हाशिम अंसारी अयोध्या के संतों के साथ इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिश कर रहे थे. अयोध्या के संतों से उनकी दोस्ती के चर्चे भी आम थे.
यही वजह है कि जिस शख्स ने 65 साल मस्जिद की लड़ाई लड़ी उसकी मौत की खबर सुनने के बाद सबसे पहले पहुंचने वालों में राम जन्मभूमि मंदिर के पुजारी महंत सत्येंद्र दास और हनुमानगढ़ी के महंत ज्ञानदास थे.

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महंत ज्ञानदास इस मौक़े पर काफी भावुक हो गए और बोले कि हाशिम अंसारी अपने बेटे इक़बाल को उन्हें सौंप कर गए हैं.
अजीब विरोधाभास है. हाशिम अंसारी ने बाबरी मस्जिद का मुकदमा लड़ने की अपनी ज़िम्मेदारी बेटे इक़बाल को सौंपी और इक़बाल की ज़िम्मेदारी क़ानूनी तौर पर अपने विरोधी महंत ज्ञानदास को.
अयोध्या के आम लोगों का कहना है कि इस मसले के समाधान का रास्ता भी ऐसे ही रिश्तों से होकर जाता है.
ये पेचीदा भले लग रहा हो लेकिन है सच्चा.
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