ज़ाकिर नाइक पर बंटे हुए हैं मुसलमान

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
विवादास्पद इस्लामी धर्मवक्ता ज़ाकिर नाइक के लिए दुनिया मुसलमानों और ग़ैर-मुसलमानों में बंटी हुई है - जो इस्लाम को मानता है सिर्फ़ वो ही सच्चा है.
यूट्यूब पर ज़ाकिर नाइक सर्च करने पर 10 लाख से ज़्यादा नतीजे दिखते हैं. कई वीडियोज़ में आपको दिखेगा कि कोई हिंदू, ईसाई उनकी बात से इतना प्रभावित हुआ कि इस्लाम अपना लिया. इसे इस्लाम की अन्य धर्मों पर प्रधानता की तरह दिखाया जाता है.

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वो बड़े स्टेज पर भाषण देते दिखते हैं. चाहे क़ुरान हो, गीता, वेद, बाइबिल, उन्हें सभी की ऋचाएं, आयतें, पन्ने सब ज़बानी याद है. कोई उनकी बात नहीं काटता है. कोई जाकर पढ़ता नहीं है कि क्या सही में ऐसा कुछ कहा गया है. कोई उन्हें टोकता नहीं. लोग ख़ुश होकर ताली बजाते हैं.
कुछ साल पहले मैंने अपने मुसलमान पत्रकार दोस्त से पूछा कि ज़ाकिर नाइक को इतनी सारी आयतें याद कैसे रह जाती हैं तो वो हंसकर बोले मदरसे में पढ़े कई बच्चे हैं जिन्हें आयतें याद रहती हैं और इसमें कोई बड़ी बात नहीं. बहरहाल मैंने ऐसा देखा नहीं था तो मैंने कुछ नहीं कहा.
ज़ाकिर नाइक भाषणों में सुनने वालों को बताते हैं कि वो मीडिया से बात नहीं करते क्योंकि मीडिया बातों को तोड़-मरोड़कर पेश करता है.

वो कहते हैं, “मेरे पास अंतरराष्ट्रीय मीडिया से साक्षात्कार के लिए बहुत फ़ोन आते हैं लेकिन मैं ज़्यादातर उनसे दूर रहता हूं. इंशाअल्लाह जब हमारा अपना चैनल होगा, तब हमारे पास सही तस्वीर आएगी.”
जिस तरह मीडिया में इस्लाम को पेश किया जाता है, उससे भी वो नाराज़ दिखते हैं. ऐसे माहौल में जहां दुनिया के एक हिस्से में इस्लामोफ़ोबिया बढ़ रहा है, जहां मुसलमानों में बढ़ते चरमपंथ को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है, ज़ाकिर एक ऐसे मसीहा के तौर पर आते हैं जो कहता है कि दुनिया ग़लत है.
ज़ाकिर नाइक कहते हैं, “हमें मीडिया को जवाब देने और मुद्दे को पलट देने का तरीक़ा आना चाहिए लेकिन बदक़िस्मती से हम पर निशाना साधना आसान है.”
नमूने के तौर पर नाइक का मानना है कि सानिया मिर्ज़ा का स्कर्ट पहनना इस्लाम के खिलाफ़ है. अगर आप ऐसा कहेंगे तो मीडिया आपका विरोध करेगा. नाइक के अनुसार रक्षात्मक होने के बजाए आक्रामक रुख़ अपनाइए. वो लोगों के सामने ऋग वेद की एक ऋचा फर्राटे से पढ़ते हैं जिसमें उनके मुताबिक़ कहा गया है, महिला पुरुष के कपड़े नहीं पहनेगी और पुरुषों को पत्नी के कपड़े नहीं पहनने चाहिए.
उनके मुताबिक़ वेद में कहा गया है भगवान ने आपको महिला बनाया है, इसलिए अपनी नज़रें नीची रखिए. ये कितना सही है, ये हिंदू धार्मिक नेता ही बता पाएंगे लेकिन उनके तर्क पर भीड़ खुश होकर ताली बजाए बिना नहीं रह पाती. जैसे उन्हें मीडिया के आरोपों का मुंहतोड़ जवाब देने का तरीक़ा मिल गया हो.

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यूट्यूब पर उनकी सोच दर्शाते कुछ और नमूने.
- इस्लाम एकमात्र सही धर्म है इसलिए हम (इस्लामिक देशों में) दूसरे धर्मों को फ़ैलाने की अनुमति नहीं देते. जब धर्म ही ग़लत है, चर्च में पूजना गलत है, बुतपरस्ती ग़लत है, इसलिए हम ग़लत चीज़ हमारे मुल्क (इस्लामिक देशों) में स्वीकार नहीं करेंगे.
- सुसाइड हमलों पर: शेख सलमान ओहदा कहते हैं, आम परिस्थितियों में आत्महत्या हराम है लेकिन अगर समय की ज़रूरत हो, जैसे फ़लस्तीन में हज़ारों लोगों की हत्या हो रही है, वहां अगर मौत का ख़तरा हो और विपक्ष को नुक़सान हो सकता है तो आख़िरी उपाय के तौर पर शरिया, क़ुरान और हदीस के नियमों का पालन करते हुए, सुसाइड किलिंग, बांबिंग का इस्तेमाल किया जा सकता है.... मैं शेख़ सलमान ओहदा से इत्तफ़ाक रखता हूं.
- मुसलमान का धर्म परिवर्तन: मेरे बेटे ने कई ग़ैर मुसलमानों का इस्लाम में धर्म परिवर्तन कर दिया है. अगर मेरा बेटा धर्म परिवर्तन कर ले तो वो मेरा बेटा ही नहीं रहेगा. धर्म का भाईचारा ख़ून के रिश्ते से बड़ा होता है. अगर मेरा बेटा ग़ैर मुसलमान से शादी कर लेता है तो मैं उससे कहूंगा कि तुम जहन्नुम में जाओगे. उसे मेरी जायदाद का कोई हिस्सा नहीं मिलेगा क्योंकि वो मुसलमान नहीं रहा.
- ओसामा बिन लादेन पर: अगर वो (ओसामा बिन लादेन) इस्लाम के दुश्मनों से लड़ रहा है, मैं उसके साथ हूं. मैं उन्हें नहीं जानता. मैं उनके संपर्क में नहीं हूं. अगर वो सबसे बड़े आतंकी अमरीका को डरा रहा है, मैं उनके साथ हूं. हर मुसलमान को आतंकी होना चाहिए. अगर वो आतंकी को डरा रहे हैं, वो इस्लाम का पालन कर रहे हैं. क्या वो ऐसा कर रहे हैं, मुझे नहीं पता. आप बाहर जाकर ये न कहिए कि ज़ाकिर नाइक ओसामा बिन लादेन के पक्ष में हैं.
- तालिबान पर: (मलेशिया में एक डॉक्टर दंपत्ति ने बताया कि) तालेबान की पगड़ी पहनने का तरीक़ा अलग है. वो डॉक्टर कहने लगे मुझसे कि जिस तरीक़े से बीबीसी और सीएनएन में दिखा रहे थे, तालिबान औरतों को मार रहे हैं, वो तालिबान हैं ही नहीं. वो कलाकारों को लेकर आए थे.... मीडिया ऐसी चीज़ है कि किसी को भी हीरो या ज़ीरो बना सकती है.
- सानिया मिर्जा की स्कर्ट: सानिया मिर्ज़ा जो कपड़े पहनती हैं वो हराम है, इस्लाम के खिलाफ़ है. लेकिन वो उन मुसलमान क्रिकेटरों से कम दोषी हैं जो नमाज़ नहीं पढ़ते, उन मुसलमान कलाकार से कम दोषी हैं जो फ़िल्मों में शिर्क (ग़ैर-इस्लामी काम) करते हैं. अगर बीच वॉलीवॉल अंतरराष्ट्रीय खेल बन जाता है तो क्या आप अपनी बेटियों को इसे खेलने के लिए बिकनी में भेजेंगे? कुछ लोग कहते हैं कि ऐसे कपड़े से उनका प्रदर्शन बेहतर होता है. तो फिर तैराकी में क्यों नहीं पुरुषों और महिलाओं से कहा जाता कि वो नग्न तैरें, उससे प्रदर्शन और बेहतर होगा? हमें (मुसलमानों को) ऐसे सवालों का जवाब देना आना चाहिए और बहस को पलट देना चाहिए.
- दासता: लोग कहते हैं कि क़ुरान दासता की बात करता है, क्या ये सही है? मैं कहता हूं, हां क्यों नहीं. आपको पता है क्यों? दासता पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध है लेकिन आपको पता है कि ग्वांतानामो बे में क्या हो रहा है? इस्लामिक कानून ग्वांतामो बे में जो हो रहा है उससे बहुत बेहतर है. इस्लामी कानून में क़ैदियों को इधर उधर घूमने की आज़ादी है. <image id="d5e430"/>
रिपोर्टों के मुताबिक़ ढाका में कैफ़े पर हुए हमले में शामिल चरमपंथी ज़ाकिर नाइक को फ़ॉलो करते थे. नतीजा ये कि बांग्लादेश में नाइक का चैनल पीस टीवी पर रोक लगा दी है. रिपोर्टों के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में बरेलवी तबक़े ने नाइक की गिरफ़्तारी की मांग की है और याद दिलाया कि 2008 में सरकार ने लखनऊ, कानपुर और इलाहाबाद में नाइक के विवादास्पद भाषणों के कारण उनके कार्यक्रमों पर रोक लगा दी थी. नाइक अब बचाव की मुद्रा में हैं. वो कहते हैं वो चरमपंथ का समर्थन नहीं करते.
सालों से ज़ाकिर नाइक ब्रैंड ऑफ़ इस्लाम पर नज़र रखने वाली सादिया देहलवी कहती हैं ये मिडिल क्लास, अपर मिडिल क्लास के पढ़े लिखे लोग हैं जो ज़ाकिर नाइक को सुनने आते हैं.
वो कहती हैं, “ये शहरी चीज़ है. गावों में आज भी गंगा जमुनी तहज़ीब ज़िंदा है. क़ुरान सुनकर लोगों को आंसू आने चाहिए, ये शो करते हैं जहां तालियां बजती हैं. वो वहाबी सोच फैलाते हैं जहां दूसरे के लिए कोई जगह नहीं है. जहां पर दरगाह जाने वालों, शियाओं, ग़ैर मुसलमानों के लिए जगह नहीं है. ये सोच ख़तरनाक है.”
सादिया के मुताबिक़ नाइक की गिरफ़्तारी से वो शहीद बन जाएंगे लेकिन उनका चैनल हर कीमत पर बंद होना चाहिए.
लेकिन क्या भारत में उन पर कार्रवाई हो सकती है? क्या उन्होंने कोई अपराध किया है जिसके लिए उन्हें सज़ा दी जा सकती है? आखिर भारत जैसे सेक्युलर देश में अपने धर्म का प्रचार करने की आज़ादी तो सभी को होनी चाहिए. और अगर पीस टीवी पर कार्रवाई होती है तो सुदर्शन टीवी पर क्यों नहीं जिस पर मुसलमान विरोध प्रोपोगैंडा फैलाने के आरोप लगते रहे हैं.

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टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ सुरक्षा एजेंसियों के लिए ये साबित करना आसान नहीं होगा कि ज़ाकिर नाइक दो समुदायों के बीच वैमनस्य फैला रहे हैं. साथ ही अपने धर्म को फैलाना संवैधानिक अधिकार है. वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी का भी मानना है कि किसी का ये कहना कि उनका धर्म दूसरे से बेहतर है, गैरक़ानूनी नहीं है. साथ ही भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुसलमानों के बीच छवि को देखते हुए सरकार के लिए ज़ाकिर नाइक के खिलाफ़ कार्रवाई करना आसान नहीं होगा.
ज़ाकिर नाइक ख़ुद को इस्लाम का दूसरे धर्मों से तुलना करने वाले विशेषज्ञ के तौर पर पेश करते हैं, लेकिन भारत जैसे धर्मनिर्पेक्ष, जटिल देश में जहां विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं, जहां धर्म परिवर्तन पहले से ही विवादास्पद मुद्दा है, जहां लोग अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं, वहां भरी सभा में, लाइव टीवी पर ये जताना कि उनका धर्म दूसरे धर्म से बेहतर है, सिर्फ़ उनका धर्म ही सच्चा रास्ता है, ये कितना सही है?
भारत और दुनिया को ऐसे धार्मिक नेताओं की ज़रूरत है जो धर्मों के बीच समानताएं ढूंढे न कि उनकी रैंकिंग करे कि कौन ऊपर है और कौन नीचे.
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