खाद्य सुरक्षा क़ानून के पालन में बिहार-झारखंड फिसड्डी

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    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, राँची से, बीबीसी हिंदी के लिए

तारीख-14 जून. झारखंड के भरनो प्रखंड कार्यालय में सैकड़ों ग्रामीणों की भीड़ है. यह उस गुमला ज़िले का हिस्सा है, जो नक्सल प्रभावित माना जाता है. रंग-बिरंगे शामियाने के नीचे बैठे लोगों मे ज्यादातर आदिवासी हैं.

इनमें महिलाओं की अच्छी-खासी संख्या है. इस भीड़ में ज्यां द्रेज दरी पर बैठे हैं तो कुर्सियों पर कुछ चुनिंदा अधिकारी. साथ हैं देश के कुछ चर्चित एक्टिविस्ट और खाद्य सुरक्षा कानून के अनुपालन के लिए काम कर रहे स्वयंसेवक.

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यह उस जनसुनवाई की आंखिन देखी है, जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून-2013 (एनएफएसए) के अनुपालन के लिए बुलायी गयी थी. यह जनसुनवाई 13 जून को बिहार के गया में भी हुई. इससे पहले कुछ उत्साही छात्रों ने एनएफएसए को लेकर देश के सबसे गरीब छह राज्यों में इसी महीने एक सर्वे किया.

वरिष्ठ अर्थशास्त्री और जाने-माने सोशल एक्टिविस्ट ज्यां द्रेज ने बीबीसी को बताया कि बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश में सर्वे किया गया. इन राज्यों के 12 प्रखंडों के 3600 घरों में लोगों से बातचीत की गयी. इस दौरान राशन कार्डों और पीडीएस दुकानों की जांच भी की गयी.

बकौल ज्यां द्रेज, सर्वे में खुलासा हुआ कि एनएफएसए को लागू करने के मामले में बिहार सबसे पीछे है. झारखंड इसके साथ ही खड़ा है. इन दोनों राज्यों मे बहुत काम किया जाना बाकी है. जबकि, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और ओड़िशा जैसे राज्यों में इस कानून का अनुपालन ज्यादा मुस्तैदी से हो रहा है.

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ज्यां द्रेज ने कहा कि अनाज के बदले पैसा दिए जाने की रामविलास पासवान की पेशकश इन राज्यों के लिए बेकार साबित होगी. ये गरीब राज्य हैं. यहां के लोगों को अनाज चाहिए, सब्सिडी नहीं.

जनसुनवाई में शामिल होने पहुंचीं अनिता मुंडा ने बीबीसी को बताया कि उऩके घऱ के 3 लोगों के नाम राशन कार्ड में नहीं हैं. चीतागुटु के योगेंद्र उरांव ने बताया कि उऩके गांव में सिर्फ 32 परिवारों के पास राशन कार्ड है. बाकी लोगों को कोई अनाज नहीं मिलता.

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जनसुनवाई में आइआइटी दिल्ली की एसोसिएट प्रोफेसर रितिका खेड़ा और गुमला के डीएसओ विनोद शंकर मिश्र के बीच आधार कार्ड की अनिवार्यता के लेकर तीखी बहस भी हुई. रितिका खेड़ा ने कहा कि झारखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश का लिखित उल्लंघन कर रही है.

इससे पहले डीएसओ ने दावा किया था कि सरकार ने उन्हें आधार कार्ड रहने पर ही राशन कार्ड बनाने का लिखित आदेश दिया है.

भरनो की बीडीओ श्वेता वेद ने बीबीसी से कहा कि ऐसी जन सुनवाईयों से प्रशासन को फायदा होता है. हम तथ्य जान पाते हैं. उन्होंने कहा कि ग्रामीणों की शिकायतों का शीघ्र समाधान करा दिया जाएगा. उन्होंने स्वीकार किया कि जनसुनवाई की फाइंडिंग से वे इत्तेफाक रखती हैं.

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