ट्रांसजेंडर इंस्पेक्टर ने बदली नाके की तस्वीर

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संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक़ दुनियाभर में क़रीब डेढ़ करोड़ ट्रांसजेंडर महिला और पुरुष हैं. ख़ास बात ये है कि ये ट्रांसजेंडर्स सामाजिक दायरों को तोड़ते हुए अपने आस-पास का माहौल बदल रहे हैं.
महाराष्ट्र में मैथ्यू व्हीलर और प्रीति गुप्ता एक पुलिस नाके पर ख़ासा वक्त गुजारते हैं.
भारत की भीड़भाड़ भरी सड़कों पर हॉर्न के शोर और तेज़ दौड़ते वाहनों के बीच सीटी बजाता पुलिसकर्मी हो सकता है किसी को नज़र न आए. हो सकता है कि इस पुलिसकर्मी के इशारों पर वाहन चालक ध्यान भी न दें.
लेकिन जब दो-तीन ट्रांसजेंडर्स इंस्पेक्टर्स को चमकती जैकेटों के साथ इस नाके पर उतारा गया तो नज़ारा ही बदल गया.
ट्रैफिक को रोकने और नियंत्रित करने में कोई समस्या आड़े नहीं आई.

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मुंबई के पूर्वोत्तर में ठाणे के ग्रामीण इलाके में पुलिस इन स्वयंसेवकों के साथ काम कर रही है और पुलिस को सूचना के अपने इन नए स्रोतों से काफी मदद भी मिल रही है. दूसरी ओर ट्रांसजेंडरों को विश्वसनीयता हासिल होने के साथ-साथ सम्मान भी मिल रहा है.
इन ट्रांसजेंडर्स को लेकर लोगों का नज़रिया बदलने लगा है और जो लोग पहले उनका मजाक उड़ाया करते थे, वे अब उन्हें अधिकारपूर्ण स्थिति में देखने लगे हैं.
महाराष्ट्र के ठाणे में ये व्यवस्था पिछले साल के अंत में शुरू हुई थी. इसके पीछे भी दिलचस्प वाकया है. पुलिस तब एक चोर का पीछा कर रही थी, तब ट्रांसजेंडरों के एक समूह ने इस चोर को रोका था. उसके बाद पुलिस ने इन ट्रांसजेंडरों को ‘पुलिस मित्र’ के रूप में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया था.
इन ट्रांसजेंडरों के काम में शामिल है त्यौहारों में भीड़ को नियंत्रित करना, झुग्गी-झोपड़ियों और अन्य बस्तियों में जाना और उन्हें सुरक्षा के बारे में सलाह देना. इसके अलावा ये ट्रांसजेंडर लोगों को ये भी बताते हैं कि अपराध होने पर किससे और कैसे संपर्क किया जाए.

भारत में, वैसे भी ट्रांसजेंडर्स को लेकर लोगों का नज़रिया बेहद नकारात्मक रहता है और यही वजह है कि अधिकांश ट्रांसजेंडर महिला और पुरुष समाज से कटे रहने को मजबूर हैं. लेकिन उम्मीद है कि इस योजना से देशभर में ट्रांसजेंडरों की स्थिति में बदलाव होगा. स्वयंसेवी इंस्पेक्टर श्रीशाह स्नातक हैं, लेकिन इस शैक्षिक योग्यता के बावजूद उनके लिए नौकरी हासिल करना मुश्किल हो रहा था.
लेकिन पुलिस के साथ काम करने से लोगों की उनके प्रति सोच बदली है. वो कहती हैं, “मेरे साथ अब पहले जैसा अमानवीय बर्ताव नहीं होता है. मैं अब सड़कों पर बेफिक्र होकर चल सकती हूं.”
महाराष्ट्र पुलिस के राजेश प्रधान का मानना है कि ये व्यवस्था बेहद सफल रही है. उनका कहना है कि इस व्यवस्था में लगभग 50 लोग काम कर रहे हैं और वो चाहते हैं कि और भी स्वयंसेवक इससे जुड़ें.
राजेश कहते हैं, “उनकी निगरानी की क्षमता शानदार है.”
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