मुस्लिम लीग पर तेल के दाम की मार

तेल का कु्आ

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    • Author, प्रगित परमेश्वरन
    • पदनाम, कोच्चि से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

तेल के दामों में गिरावट ने उत्पादक अरब देशों पर ख़ासा असर डाला है. लेकिन इससे ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले, लेकिन एक ही समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाला दक्षिण भारत का एक राजनीतिक दल भी प्रभावित हुआ है.

2011 केरल विधानसभा के आंकड़ों के मुताबिक़ पैसे ख़र्च करने के मामले में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग दूसरे नंबर पर थी.

कभी आईयूएमएल से जुड़े रहे केटी जलील कहते हैं, "मेरे पास सूचना है कि पार्टी अपना ख़र्च घटा रही है. यह प्रवासियों के वापस लौटने की वजह से है. हालांकि आईयूएमएल को खाड़ी से लौटने वालों से वोट मिलने की उम्मीद भी है."

जलील पहले आईयूएमएल से जुड़े थे, लेकिन हाल ही में उन्होंने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था.

मुस्लिम लीग रैली

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विधानसभा में आईयूएमएल के 20 विधायक हैं, जिनमें से पांच मंत्री हैं. इसके अलावा लोकसभा में पार्टी के तीन सदस्य हैं.

निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार आईयूएमएल ने प्रचार पर 10.54 लाख रुपये प्रति विधायक ख़र्च किए. चुनाव आयोग के मुताबिक़ एक उम्मीदवार प्रचार पर 16 लाख रूपयों तक ख़र्च कर सकता है.

राजनीतिक टीकाकार डॉक्टर फ़ज़ल गफ़ूर कहते हैं, "आईयूएमल का कार्यक्रम और चुनावी ख़र्च प्रवासियों और उनके संगठनों के दिए पैसों से चलता है."

पत्रकार एमजी राधाकृष्णन कहते हैं, "मध्य पूर्व में रहने वाले भारतीयों का बड़ा हिस्सा केरल के लोगों का है. इसलिए यहां के सभी बड़े दल पैसे के लिए उन पर निर्भर रहते हैं. लेकिन तेल के दाम कम होने का सबसे ज़्यादा असर मुस्लिम लीग पर पड़ा है. मध्य-पूर्व में केरल से गए प्रवासियों में सबसे ज़्यादा मुस्लिम हैं और वो मालाबार इलाक़े के हैं."

केरल विधानसभा

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लेकिन लीग के राज्य सचिव केपीए माजीद कहते हैं कि प्रवासियों के वापस आने का पार्टी की चुनाव तैयारियों और सामाजिक कार्यों पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

वह कहते हैं, "यह सही है कि हमारे प्रवासियों के सगंठनों से गठबंधन हैं. लेकिन हमें चंदा देने वाले देश के अंदर के ही हैं. हम अपनी चुनाव तैयारी पूरी गति से शुरू कर रहे हैं."

मुस्लिम आधार वाली पार्टी होने के बावजूद मुस्लिम लीग को एक 'धर्मनिरपेक्ष पार्टी' समझा जाता रहा है.

आज़ादी के बाद 1947 में मुस्लिम लीग के नेता हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने प्रस्ताव रखा था कि अलग पाकिस्तान के लिए लड़ने वाली मुस्लिम लीग को भंग कर दिया जाए क्योंकि इसका मक़सद पूरा हो चुका है. लेकिन उनके इस प्रस्ताव का तब की मद्रास प्रेसिडेंसी के दो नेताओं ने जमकर विरोध किया था.

केरल के हाउसबोट

ये दो नेता थे केएम सिथी साहब और मोहम्मद कोया. इन दोनों नेताओं ने ही बाद में तब के मद्रास प्रेसिडेंसी में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की नींव रखी.

इस्लामी और मज़हबी राजनीति के आलोचक रहे मोहिउद्दीन एन करासरी कहते हैं, "कच्छ मेमन समुदाय के सत्तार सेठ अकेले इंसान थे, जो केरल से पाकिस्तान जा कर बस गए. सिथी साहब और उनके अनुयायी कोया धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और दूरदृष्टि वाले लोग थे."

उनके मुताबिक़, "इस वजह से मलाबार के लोगों ने उनका समर्थन किया और आईयूएमएल मज़बूत हो गई. यह सामुदायिक राजनीति है, सत्ता की राजनीति है, लेकिन सांप्रदायिक राजनीति नहीं है."

1967 में मुस्लिम लीग के सदस्य पहली बार ईएमएस नंबूदिरीपाद की सरकार में मंत्री बने थे. सीएच मोहम्मद कोया तो 1979 में राज्य के मुख्यमंत्री भी बने.

चुनाव आयोग

मुस्लिम एजुकेशन सोसायटी के फ़ज़ल गफ़ूर कहते हैं कि मलाबार में रहने वाले मुसलमान मप्पीलाहों का समर्थन करने की वजह से आईयूएमएल मजबूत हुई.

गफ़ूर ने बीबीसी को बताया, "आईयूएमएल कामकाज में धर्मनरिपेक्ष है, लेकिन सैद्धांतिक रूप से नहीं. मप्पीलाह पहचान अनूठी है और सिर्फ़ केरल में है. उत्तर भारत के मुसलमान सोच के स्तर पर इससे बिल्कुल अलग हैं और केरल के मुसलमान अपने आपको बिल्कुल अलग थलग पाते हैं."

आईयूएमएल के सामने वेलफ़ेयर पार्टी ऑफ़ इंडिया और पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया जैसे दलों के उभार से साख बचाने की चुनौती भी है.

हालांकि लीग के राष्ट्रीय सचिव ईटी मोहम्मद बशीर का दावा है कि पार्टी का तमिलनाडु में भी मजबूत आधार है, जहां इसने डीएमके के साथ गठजोड़ किया है. इसके अलावा कर्नाटक के मैसूर और बेंगलुरू के कुछ हिस्सों में भी इसका जनाधार है.

केरल का मुस्लिम समुदाय

वे कहते हैं, "हमने महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बंगाल में अपनी पहचान बनाई है. उन राज्यों में लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों में हमारे सदस्य चुने गए हैं. लेकिन कुल मिला कर हमारी छवि नकारात्मक है."

पहले लोकसभा चुनाव और फिर स्थानीय निकाय चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन से कांग्रेस और लेफ़्ट फ़्रंट तो चिंतित हैं ही मुस्लिम लीग को भी ख़तरा नज़र आता है.

हालांकि आईयूएमएल के राष्ट्रीय सचिव और सांसद ईटी मोहम्मद बशीर का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी की लोकप्रियता से मुस्लिम लीग पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

इससे सहमति जताते हुए पत्रकार राधाकृष्णन कहते हैं कि इससे मुस्लिम लीग को मज़बूती ही मिलेगी और उसे पहले से अधिक वोट मिलेंगे.

कोट, मोहम्मद बशीर

हालांकि कुछ संकेत ऐसे मिले जिनसे लगता है कि लीग वोट बैंक को बचाने के दबाव में है.

केरल के शिक्षा मंत्री पी के अब्दु रब्ब ने एक कार्यक्रम के उद्घाटन में दीप जलाने से इनकार कर दिया था और इसे 'ग़ैरइस्लामिक' क़रार दिया था.

डीएमके और आईयूएमएल के नेता एक मंच पर
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डॉ. फ़ज़ल गफ़ूर कहते हैं, "मैं दिया जलाता हूं. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. यह निहायत ही निजी फ़ैसला है. इसमें कुछ भी धार्मिक नहीं है. यह लोकतांत्रिक देश है, अब्दु रब्ब को अपने विचार रखने का हक़ है. लेकिन इसे दूसरे मुसलमानों पर धर्म और मज़हब के नाम पर थोपा नहीं जा सकता."

प्रोफ़ेसर करसरी कहते हैं, "यदि आप इस्लामी तौर तरीक़े से ही चलना चाहते हैं तो इफ़्तार में ग़ैर मुसलमानों को नहीं आना चाहिए. लेकिन इसमें तो सभी मज़हबों और जातियों के लोग आते हैं."

सीपीएम नेता एमए बेबी आईयूएमएल के धर्मनरिपेक्षता के दावे को ख़ारिज करते हैं.

वे कहते हैं, "यदि आईयूएमएल खुद को धर्मनरिपेक्ष कहती है तो सबसे पहले इसे अपना नाम बदल लेना चाहिए. इसका मुख्य एजेंडा मुसलमानों की सुरक्षा करना है क्योंकि वे अल्पसंख्यक हैं. लेकिन राज्य में सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं हैं, जिनका दमन अल्पसंख्यक होने की वजह से होता है."

कोट, एमए बेबी, सीपीएम

भाजपा की राज्य इकाई के महासचिव के सुरेंद्रन कहते हैं कि ये "मुस्लिम लीग व्यापारियों और सांप्रदायिक ताक़तों की पार्टी है और किसी तरह धर्मनिरपेक्ष या लोकतांत्रिक नहीं है."

उन्होंने कहा, "पहले लीग धर्मनिरपेक्ष छवि पेश करने के लिए यूसी रमन जैसे हिंदुओं को टिकट देती थी. लेकिन वे पार्टी के सदस्य नहीं होते थे, वे महज़ चुनाव लड़ने के लिए पार्टी में आते थे."

के सुरेंद्रन, राज्य, केरल भाजपा

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भाजपा के बढ़ते प्रभाव और तेल के दाम में गिरावट से क्या वाक़ई लीग का दीया मधम हो जाएगा?

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