पनामा पेपर्स और 'नवाज़ के पास घर तक नहीं'

    • Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, इस्लामाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए

अभी तो मोसाक फ़ोंसेका का रिकॉर्ड हैक हुआ है तो इतना उधम मच गया.

किसी दिन अगर टॉप टेन टैक्स हैवेंस यानी स्वीट्ज़रलैंड, हांगकांग, यूएस राज्य डेलावेयर, सिंगापुर, कैमन आइलैंड लग्ज़मबर्ग, बेरूत, जर्मनी, बहरीन और यूएई के फ़ंड मैनेजर का रिकॉर्ड हैक हो गया तो क्या होगा.

मुझे तो लगता है कि तब इंडिया और पाकिस्तान के हज़ारों धनी मुँह छिपाते फिरेंगे. वो सब लोग जिनके नाम पनामा पेपर्स में आए हैं, वो आम जीवन में कितनी अच्छी-अच्छी बातें करते हैं.

सब के दिल में भी राष्ट्र और जनता का दर्द कूट-कूटकर भरा है. मगर जब ख़ुद पर या अपने परिवार की संपत्ति के उद्गम पर सवाल उठता है, तो ये बुद्धिजीवी फ़ौरन एक छोटे से बच्चे जैसी सफ़ाई पेश करने लगते हैं.

जैसे प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ कह रहे हैं कि भला मेरा किसी गुप्त ऑफ़शोर कंपनी से क्या लेना-देना.

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ये तो मेरे बच्चे हैं जिनका अपना कारोबार है. मेरे पास तो अपना घर तक नहीं. रावविंड में माता जी के घर में रहता हूँ और मरी में उस घर में जो पत्नी जी के नाम है.

मेरे और छोटे शहबाज़ शरीफ़ के पास तो दो लैंड क्रूज़र्स हैं, वो भी किसी सज्जन ने गिफ़्ट की हैं. हमारा इतना धन-दौलत थोड़े ही है कि छिपाना पड़ जाए. विश्वास न हो तो मेरे टैक्स रिटर्न्स देख लें. हर साल तीन लाख, चार लाख, ज़्यादा से ज़्यादा पांच लाख टैक्स बनता है.

इससे ज़्यादा तो आप इन्कम टैक्स दे देते होंगे. पता नहीं लोग मेरे पीछे क्यों पड़ गए.

अब तक 220 पाकिस्तानियों के नाम पनामा पेपर्स में सामने आए हैं. सब कहते हैं ये कोई बड़ी साज़िश है.

एक सीनेटर उस्मान सैफ़-उल्लाह के परिवार की तो 34 कंपनियां सामने आई हैं, लेकिन सैफ़-उल्लाह नेशनल टैक्स रिफ़ॉर्म कमीशन के सदस्य हैं.

पीपुल्स पार्टी के सदस्य सीनेटर रहमान मलिक का नाम भी पनामा पेपर्स में है. मगर उनका कहना है कि उनका नाम इंडियन एजेंसी रॉ ने डलवाया है.

नवाज़ शरीफ़

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जितनों के भी पनामा पेपर्स में नाम आए हैं, सब कह रहे हैं कि ऑफशोर कंपनी खोलना अवैध, अनैतिक या पाप तो नहीं.

आप सब जजमान बिल्कुल ठीक कह रहे हैं. तो फिर ऐसा करें कि पूरे इंडिया का बैंक क़ानून स्वीट्ज़रलैंड जैसा और पाकिस्तान का निवेश क़ानून कैमेन आइलैंड जैसा बनवा दें ताकि बस हज़ार-दो हज़ार पाकिस्तानी और भारतीय और उनके पुत्र-सुपुत्र और बेटियां ही क्यों?

हम सब के सब ऐसे क़ानूनों का लाभ क्यों न लें.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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