'आयकर में छूट के आसार नहीं'

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सोमवार पेश होने वाले आम बजट में वेतन पर निर्भर रहने वाले कर्मचारियों को आयकर में छूट मिलने की संभावना नहीं नज़र आ रही है.
हालांकि उद्योग संगठन एसोचैम ने चार लाख रुपए तक सालाना वेतन पाने वालों को आयकर के बाहर रखने का सुझाव दिया है. लेकिन इसकी संभावना नहीं है कि वित्तमंत्री अरुण जेटली इसे मानेंगे.
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के प्रमुख अर्थशास्त्री डीके जोशी का मानना है कि इस बार आयकर की सीमा में बढ़ोत्तरी के आसार नहीं हैं.
उनका कहना है कि दरअसल सरकार पर वित्तीय दबाव है. उसे सातवें वेतन आयोग की सिफ़ारिशें लागू करनी होंगी, सैनिको को 'वन रैंक, वन पेंशन' स्कीम के तहत पैसे देने होंगे. उसे पैसे की ज़रूरत है.
ऐसे में सरकार की कोशिश अधिक कर उगाही और इसके लिए कर के दायरे में अधिक से अधिक लोगों को लाने की होगी. लिहाज़ा, वह करों में छूट नहीं दे सकती.
इसी तरह इसकी पूरी आशंका है कि सेवा शुल्क के दायरे में और सेवाओं को लाया जाए, ताकि सरकार कुछ और पैसे हासिल कर सके.

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जोशी मानना है कि सरकार का बजट कृषि क्षेत्र और बुनियादी सुविधाओं के विकास पर होना चाहिए.
बीते दो साल से कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है. दूसरी ओर पूंजी निवेश बहुत नहीं हुआ है. इसलिए सरकार ढांचागत सुविधाओं के विकास पर अधिक ख़र्च करेगी.
वो कहते हैं कि सरकार बैंकों को पुनर्जीवित करने की कोशिश भी करेगी. उसे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में और नक़द लगाना होगा या ऐसी व्यवस्था करनी होगी कि बैंकों का नक़द बढ़े. इसके लिए बजट में कुछ इंतज़ाम करना होगा.
सरकार ने बैंकों के लिए जो इंद्रधनुष योजना पहले बनाई थी, उसे लागू करना होगा.
जोशी का मानना है कि सरकार छोटे और मंझोले व्यापारियों के लिए कोई स्कीम ला सकती है, ताकि उन्हें थोड़ा बल मिले.

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डायरेक्ट बेनीफ़िट स्कीम के तहत सब्सिडी सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में देने की योजना शुरू की गई है. खाद्य और उवर्रक सब्सिडी को भी इसके तहत लाया जा सकता है.
उनका अनुमान है कि इस बार के आर्थिक सर्वेक्षण ने यह माना है कि सार्वजनिक प्रणलाी के तहत दी जाने वाली सब्सिडी का एक बड़ा हिस्सा 'लीक' हो जाता है यानी यह पैसा ग़लत तरीक़े से दूसरे लोगों तक पंहुच जाता है. सरकार इसे रोकने के लिए कोई ठोस क़दम उठा सकती है.
इसके अलावा उच्च आय वर्ग के लोगों को और मामलों में सब्सिडी से अलग रखा जाएगा.

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जोशी कहते हैं कि सरकार ने राजकोषीय घाटे को कम कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.50 फ़ीसद तक रोक लेने की बात कही थी. इस बजट में यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल है.
एक तो सरकार का ख़र्च बढ़ेगा, दूसरे उसकी कमाई भी ज़्यादा नहीं बढेगी, ऐसे में इस लक्ष्य को हासिल करना टेढ़ी खीर साबित होगी.
हालांकि जोशी इस बात पर ज़ोर देते हुए कहते हैं, ''हमें यह भी याद रखना चाहिए कि सरकार ने वित्तीय घाटे को कम करने में कामयाबी पाई है तो उसकी बड़ी वजह कच्चे तेल की गिरी हुई क़ीमत है.''
(क्रिसिल के प्रमुख अर्थशास्त्री डीके जोशी के साथ बीबीसी संवाददाता दिनेश उप्रेती की बातचीत पर आधारित)
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