भारतीय सेना के स्टार अफ़सर थे जनरल जैकब

जैकब
    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

अगर 1971 की जंग में ले. जनरल (रिटायर्ड) जैकब की योजना और युद्ध रणनीति पर अमल न होता तो बांग्लादेश को आज़ादी मिलती? मंगलवार को 92 साल की उम्र में ले. जनरल जैकब की मृत्यु पर ये सवाल उठाना ग़ैर मुनासिब नहीं होगा

आम तौर से बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई में कामयाबी का सेहरा पहले फ़ील्ड मार्शल मानिकशॉ और जनरल जगजीत अरोड़ा को दिया जाता है. तीसरे नंबर पर ले. जनरल जैकब का नाम आता है.

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लेकिन अगर उनकी योजना और रणनीति पर अमल न होता या इसमें कुछ दिनों की देरी हो जाती तो संभवत: संयुक्त राष्ट्र में युद्ध विराम का प्रस्ताव पास हो जाता और शायद कश्मीर की तरह पूर्वी पाकिस्तान में सीज़ फ़ायर की लाइन खिंच जाती और बांग्लादेश का जन्म नहीं हो पाता.

राजनीतिक नेतृत्व चाहता था कि सेना अप्रैल 1971 में ही पूर्वी पाकिस्तान में प्रवेश करे. लेकिन 2011 में बीबीसी को दिए इंटरव्यू में ले. जनरल जैकब ने कहा था कि उन्होंने 15 नवंबर तक रुकने की सलाह दी ताकि मानसून पूरी तरह से ख़त्म हो जाए और ज़मीन सूख जाए.

उनके अनुसार मानिकशॉ भी अप्रैल में हमले की तयारी के आर्डर दे चुके थे. "इसलिए मैंने मानिक शॉ से कहा कि इसे 15 नवंबर तक स्थगित करिए तब तक शायद ज़मीन पूरी तरह से सूख जाए.

मानिकशॉ ने अपनी योजना में राजधानी ढाका पर क़ब्ज़ा करना शामिल नहीं किया था. जैकब ने अपने इंटरव्यू में ये कहा था, "हमें सिर्फ़ खुलना और चटगाँव पर क़ब्ज़ा करने के आदेश मिले थे. मेरी उनसे लंबी बहस भी हुई थी. मैंने उनसे कहा था कि खुलना एक मामूली बंदरगाह है."

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जैकब ने ढाका पर क़ब्ज़ा करने की रणनीति का तर्क दिया था, "मैंने उनसे कहा कि अगर हमें युद्ध जीतना है तो ढाका पर क़ब्ज़ा करना ही होगा क्योंकि उसका सामरिक महत्व सबसे ज़्यादा है और वह पूर्वी पाकिस्तान का एक तरह से भूराजनीतिक दिल भी है"

वह जैकब ही थे जिन्हें मानिक शॉ ने आत्म समर्पण की व्यवस्था करने ढाका भेजा था. उन्होंने ही पाकिस्तान के जनरल नियाज़ी से बात कर उन्हें हथियार डालने के लिए राज़ी किया था. जैकब ने 1971 के अभियान पर दो पुस्तकें लिखी हैं.

उनकी योजना और रणनीति कामयाब रही. जनरल (रिटायर्ड) अशोक मेहता उस युद्ध में शामिल थे और उस समय फ़ौज में मेजर थे. पाकिस्तान को हराने में जनरल जैकब की भूमिका पर बोलते हुए उन्होंने कहा, "एक हज़ार साल में किसी युद्ध में भारत के लोगों को पहली बार इतनी भारी कामयाबी मिली थी और इसमें ले. जनरल जैकब का भारी योगदान था"

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सालों बाद ख़ुद ले. जनरल जैकब ने शिकायत की थी कि उन्हें इस सफल मुहिम में जितनी मान्यता मिलनी चाहिए थी नहीं मिली.

इस पर जनरल मेहता कहते हैं, "जनरल जैकब को हमेशा ये शिकायत थी कि जैसा उन्होंने काम किया उन्हें सरकार से इसकी उस तरह से मान्यता नहीं मिली. सारे पुरस्कार जनरल मानिकशॉ और जनरल जगजीत अरोड़ा को मिले. मैं उनसे कहता था कि आप एक स्टार अफ़सर थे. उनकी तरह कमांडर नहीं थे. शायद इसीलिए मानिकशॉ और जैकब के बीच बाद में रिश्ते बिगड़ गए.''

जनरल मेहता के अनुसार उन्हें जितनी मान्यता मिलनी चाहिए थी वो मिली.

ये सच है कि वो एक ऐसे निराले फ़ौजी अफ़सर थे जिन्हें तीन देशों में मान्यता, शोहरत और इज़्ज़त मिली. भारत के अलावा बांग्लादेश सरकार ने जनरल मानिकशॉ और जनरल जगजीत अरोड़ा के साथ उन्हें भरपूर मान्यता दी. इसराइल ने भी उनका हमेशा सम्मान किया.

वो एक यहूदी थे और भारत-इसराइल संबंध सुधरने के बाद वो कई बार इसराइल गए जहाँ उन्हें हमेशा इज़्ज़त मिली. वहां के एक संग्रहालय में उनकी पुरानी बंदूक़ें और सैन्य उपकरणों को जगह दी गई है.

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जनरल जैकब ने कभी शादी नहीं की. जनरल मेहता के अनुसार वो एक बौद्धिक आदमी थे और कला और कलाकृतियों में उनकी रुचि गहरी थी. वो द्वितीय विश्वयुद्ध में लड़े थे. जनरल मेहता कहते हैं कि पुरानी बंदूक़ें और उनकी परख उन्हें ख़ूब थी.

वो गोवा और पंजाब के राज्यपाल भी रहे. अवकाश के कई साल बाद वो भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे.

जनरल मेहता कहते हैं कि पारंपरिक युद्ध के बजाए छद्म और कम तीव्रता वाले युद्ध का दौर है. हाल में पठानकोट के सैन्य प्रतिष्ठान पर हुआ आतंकी हमला इसकी एक मिसाल है. तो क्या आज जैकब की युद्ध रणनीति इस बदलते दौर में भी कामयाब होती?

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जनरल मेहता कहते हैं, "मुझे पूरा विश्वास है कि वो पारंपरिक और छद्म युद्ध दोनों में कामयाब होते. दोनों तरह के युद्ध के लिए उनकी तैयारी, योजना और रणनीति पहले से बनी रहती और इसमें उन्हें कामयाबी मिलती."

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