'हां, नेपाल से संबंध ख़राब हुए हैं'

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- Author, महेश आचार्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, काठमांडू
पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा के बाद भारत और नेपाल के संबंध अच्छे हुए थे पर पिछले कुछ महीनों में दोनों के संबंध ख़राब हुए हैं.
नेपाल में भारत के राजदूत रंजीत रे कहते हैं कि यह बात सही है कि संबंध ख़राब हुए हैं लेकिन इसकी वजह तलाश कर उसे दूर भी दोनों देशों को ही करना होगा.
उनका कहना है, "भारत की नीति पूरे नेपाल के लिए है, किसी एक समुदाय या पार्टी विशेष के लिए नहीं. हम चाहते हैं कि नेपाल में स्थिरता आए. "
"नेपाल एक विविधतापूर्ण देश है. यहां सभी समुदायों की अपनी-अपनी आकांक्षाएं हैं और एक समझ थी कि जो नया संविधान बन रहा है उसमें सबकी बात रखी जाएगी. हमारा संदेश बस इतना था, कोई हस्तक्षेप नहीं था. यह बस एक दोस्ताना सलाह थी."

आलोचक आरोप लगाते रहे हैं कि भारत ने नेपाल के अंदरूनी मामले में दख़ल दिया है और राजनीतिक रूप से एक समुदाय को समर्थन दिया है.
नेपाल का संविधान संसद में 85 फ़ीसदी समर्थन के साथ पारित किया गया है.
रंजीत रे के मुताबिक़ यह सिर्फ़ नंबर गेम की बात नहीं. लोगों की जो भावनाएं है उनका भी ख्याल रखना होगा. अगर इसको नज़रअंदाज़ करेंगे तो संविधान तो आ जाएगा पर समस्या का समाधान नहीं होगा.
रे भारत की नेबरहुड फ़र्स्ट पॉलिसी को असफल नहीं मानते. वह कहते हैं कि भारत का विकास तब तक नहीं होगा जब तक भारत के पड़ोस में शांति नहीं होगी.

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वह कहते हैं, ''पहली बात तो यह देखना है कि अस्थिरता और अशांति क्यों है? क्या यह किसी अंदरूनी कारण से है, नेपाल में या भारत की वजह से है. हमें लगता है कि यह नेपाल में अंदरूनी कारण से है.''
चीन के बढ़ते प्रभाव की बात को ख़ारिज करते हुए रंजीत रे कहते हैं, ''आज अंतरराष्ट्रीय संबंध व्यापार और निवेश से तय होते हैं. भारत और नेपाल के व्यापारिक संबंधों को देखें तो भारत और नेपाल के संबंध बहुत प्रगाढ़ हैं.''
उनके मुताबिक़ नेपाल में जो भारत विरोधी भावनाएं भड़की हैं, उनसे स्वाभाविक रूप से थोड़ा असर ज़रूर पड़ेगा. आगे दोनों देश एक-दूसरे से क्या चाहते हैं. इस पर गंभीरता से सोच-विचार करना चाहिए.
(बीबीसी नेपाली सेवा से नेपाल में भारत के राजदूत रंजीत रे की बातचीत पर आधारित)
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