वापस लौटे 'एकमात्र' कश्मीरी पंडित की कहानी

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
पंडित जगरनाथ खार (85) पंद्रह सालों बाद 2007 में अपने घर कश्मीर वापस लौटे और तब से वो यहीं रह रहे हैं.
पंडित जगरनाथ 1990 में उस समय भारत प्रशासित कश्मीर छोड़ कर चले गए थे जब घाटी में हथियार बंद आंदोलन शुरू हो गया और कश्मीर में रहने वाले हज़ारों और लाखों पंडित अपने घर बार छोड़ भारत के दूसरे शहरों में बसने लगे.
भारत सरकार ने विस्थापित पंडितों को वापस कश्मीर में बसाने के लिए कई क़दम उठाए.
जम्मू-कश्मीर सरकार ने 30 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पिछले 25 वर्षो में अभी तक सिर्फ एक पंडित परिवार कश्मीर वापस लौटा है जिसने अपना माइग्रेशन सर्टिफिकेट रद्द करवा दिया है. और यह परिवार है जगरनाथ खार का.

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वैसे तो घाटी में अभी तक प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कुल 2700 परिवार आ चुके हैं लेकिन ये परिवार हैं जिन्होंने अपने माइग्रेशन सर्टिफिकेट रद्द नहीं किए हैं. ये परिवार सरकार की ओर से बनाए गए ट्रांजिट कैंप में रहते हैं.
रिटायर्ड पुलिस कर्मचारी पंडित जगरनाथ अनंतनाग के मट्टन इलाके में अपनी पत्नी के साथ अपने घर में रहते हैं.
कश्मीर छोड़ने और वापस लौटने के बारे में जगरनाथ कहते हैं, "मुझे कश्मीर से भागने पर किसी ने मजबूर नहीं किया बल्कि उस समय हालात ही ऐसे हो गये थे कि कश्मीर छोड़ना पड़ा. लेकिन कश्मीर से पंद्रह साल दूर रहने का दर्द सिर्फ मेरा दिल जानता है. कश्मीर से बाहर रहकर अज़ाब की ज़िन्दगी गुज़ारी."

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वो बताते हैं, "कश्मीर से भागने के बावजूद हर साल कश्मीर अपने गावों में आता था, क्योंकि कश्मीर देखे बिना मुझसे रहा नहीं जाता था. कश्मीर से बाहर उस एक कमरे की ज़िन्दगी तो मेरे लिये नरक थी. वहाँ कोई अपना नहीं था, यहाँ तो सब अपने हैं."
साल 2007 में पंडित जगरनाथ ने रिलीफ़ कमिश्नर के दफ़्तर में मांग करके अपने माइग्रेशन को खत्म करने की अपील की, जिसको सरकार ने मंज़ूर किया और जगरनाथ लौटकर अपने जले हुए मकान को बनाना शुरू किया.
पंडित जगरनाथ के दोनों मकान जला दिए गए थे. सरकार ने उनको मकान बनाने के लिए सात लाख रुपए का मुआवज़ा दिया.
जगरनाथ कहते हैं कि उनके घर के दरवाज़े के बाहर जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट चरमपंथी संगठन के नाम से पोस्टर चिपकाया गया था और कश्मीर छोड़ने के लिए कहा गया था.

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वो बताते हैं, "जब सब पंडित भाग रहे थे तो उसी दौरान मुझे पोस्टर के जरिये धमकी दी गई कि कश्मीर छोड़ दो. लेकिन में उस धमकी से डरा नहीं. मुझे पड़ोसियों ने कहा कि कुछ दिन के लिए तुम यहाँ से चले जाओ. मेरे पास आज भी उस पोस्टर की एक कॉपी मौजूद है."
कश्मीर की हवाओं, फ़िज़ाओं और मिट्टी के गहरे प्यार ने पंडित जगरनाथ को कभी कश्मीर से बाहर चैन से बैठने नहीं दिया.
उनका कहना है, "कश्मीर से बाहर रहते हुए मैंने लगातार तड़पता रहा कि में अपनी घाटी की दिल फरेब फ़िज़ाओं में कब सो सकूंगा. वह ख़्वाब अब पूरा हो गया. अब और कुछ नहीं चाहिए."
पंडित जगरनाथ इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं करते हैं कि कश्मीर में पंडितों के लिए डरने की कोई बात है.

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वह कहते हैं, "मुझे तो कोई डर नहीं लगता है. कश्मीर में जब पंडितों के बड़े त्यौहार होते हैं तो वह यहाँ आते हैं. पंडितों के मंदिर यहाँ मुस्लमान सजाते हैं. मैं तो पहले की तरह यहाँ मुसलमानों के साथ रहता हूँ. वो मेरे घर आते हैं, मैं उनके घर जाता हूँ. हम एक दूसरे के दुख दर्द में शरीक होते हैं."
जगरनाथ इस बात से भी सहमत नहीं हैं कि कश्मीर में पंडितों को अलग से बसाया जाए.
कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के मुखिया संजय टीकू कहते हैं, "वर्ष 2006 से 2008 तक पंडित वापस आने के लिए तैयार हो गए थे लेकिन 2008 और 2010 में कश्मीर में जिस तरह हालात ख़राब हो गए, तो बात फिर 90 के दशक की याद आ गई. कश्मीर में राजनीतिक उथल पुथल है, जिस वजह से वो वापस नहीं आना चाहते हैं."

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वह आगे बताते हैं, "दूसरी बात ये है कि अगर पंडित कश्मीर वापस आएंगे तो रहेंगे कहाँ, किसी के पास अपना मकान नहीं है, किसी ने बेच दिया तो किसी का जला दिया गया. अलगाववादी पंडितों को अलग बसाने का विरोध करते हैं. अब पंडित कहाँ आएं और कहाँ जाएं? जब पहले हमारे मकान बनेंगे, तभी तो पंडित वापस आ सकते हैं."
संजय टीकू के संगठन ने भारत सरकार को ये प्रस्ताव दिया था कि कश्मीर में पंडितों के लिये स्मार्ट सिटीज़ बनाया जाए.
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