वो पंडित जो कश्मीर में रहना नहीं चाहते

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारत प्रशासित कश्मीर में पंडितों के लिए अलग बस्ती बनाने के मुद्दे पर राजनीति गरमा रही है.
चरमपंथी और कुछ राजनीतिक दल पंडितों के लिए अलग बस्ती बनाने का विरोध कर रहे हैं. कश्मीर लौटे कुछ पंडित भी कश्मीर में नहीं रहना चाहते.
पिछले पांच साल में प्रधानमंत्री के विशेष पैकैज के तहत 1,460 पंडित परिवार वापस घाटी लौटे हैं जिनके रहने के लिए कई ज़िलों में अलग-अलग शरणार्थी शिविर बनाए गए हैं.
23 वर्षीय अनूद रैना कश्मीरी पंडित है और पिछले पांच साल से कश्मीर घाटी में रह रहे हैं लेकिन हमेशा कश्मीर में नहीं रहना चाहते.
'कश्मीर में क्यों रहूं?'
अनूद 2010 में प्रधानमंत्री के विशेष पैकेज के तहत कश्मीर लौटे थे.

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कश्मीर वापस लौटने के लिए उनको सरकारी नौकरी और अनंतनाग के मट्टन इलाके में बनाए गए शरणार्थी शिविर में रहने की जगह दी गई थी.
वह इस समय राजस्व विभाग में नौकरी कर रहे हैं.
लेकिन अनूद का कहना है कि उनका दिल कश्मीर में नहीं लगता बल्कि वह हमेशा इस बात से परेशान रहते हैं कि न तो कश्मीर में उनको कोई जानता है और न ही वह किसी को जानते हैं.
वह कहते हैं, "जब 1990 में मेरा परिवार कश्मीर छोड़कर गया था तो मैं पैदा भी नहीं हुआ था. मेरी पैदाइश जम्मू में हुई और वहीं पला-पढ़ा. मेरे सब दोस्त कश्मीर से बाहर रहते हैं. मैं तो यहां खुद को अजनबी महसूस करता हूं."
अनूद का पैतृक घर कश्मीर घाटी के चिठुरगुल में है. हालांकि अनूद पिछले चार साल में अपने घर गए भी लेकिन एक अजनबी की तरह.

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उनका कहना है, "मैं दो बार अपना घर देखने गया जो खंडहर बन गया है. वहां किसी ने मुझे पहचाना नहीं और न ही मैंने किसी को पहचाना. अब मैं कश्मीर में रहूं तो क्यों?"
यह पूछने पर कि क्या आपका परिवार कश्मीर लौटना चाहता है तो उनका कहना था, "मेरे मम्मी-पापा तो वापस लौटना चाहते हैं लेकिन मैं नहीं.
अनूद को कश्मीर में पंडितों के लिए अलग बस्ती से कोई दिलचस्पी नहीं.
वह कहते हैं, "मैं तो दो साल बाद नौकरी छोड़कर वापस जम्मू जा रहा हूं. मुझे कश्मीर में बसना नहीं है."
'और सहम गए'
घाटी के दूसरे शरणार्थी शिविरों में रहने वाले पंडितों के विचार अनूद से कुछ अलग हैं.
कुछ भारत सरकार से नाखुश हैं तो अलगावादियों के अलग बस्ती के विरोध से भी नाराज़ हैं.

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बड़गाम में बनाए गए ट्रांज़िट कैंप में रहने वाले 40 वर्षीय अश्वनी कुमार का कहना है कि अलगावादियों के बस्ती के खिलाफ़ बंद के आह्वान ने पंडितों को और भी डरा दिया है.
वह कहते हैं, "पुनर्वास सही तरीके से हो. हम पिछले चार साल से यहां शरणार्थी शिविर में रह रहे हैं, हमारा पुनर्वास कहां हुआ है?"
"सरकार ने कहा था कि सारे पंडितों को वापस लाएंगे लेकिन यह अभी तक नहीं हो पाया है. जब तक सरकार सबको वापस नहीं लाएगी तब तक सब कुछ अधूरा है."
"रही बात अलगावादियों की तो हमें उम्मीद नहीं थी कि वह हमारे पुनर्वास के खिलाफ कश्मीर बंद का आह्वान करेंगे. मैं दिल से कहता हूं कि बंद के आह्वान से बहुत दुख हुआ. उस बंद के आह्वान से हम और भी सहम गए. हमारी हालत ऐसी हो गई है कि हम डर के मारे अब सच बोल भी नहीं पाते हैं."
रहने की मुश्किलें
45 वर्षीय मनोहर लाल वह पंडित हैं जिन्होंने कश्मीर कभी छोड़ा ही नहीं. वह बड़गाम के शरणार्थी शिविर में रहते हैं.

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पेशे से पत्रकार मनोहर लाल के इलाक़े में साल 1998 में कुछ पंडितों की हत्या की गई जिसके बाद उनको अपना घर-बार छोड़ना पड़ा.
विस्थापित हुए पंडितों की कश्मीर वापसी के बारे में वह कहते हैं कि इस बात का फैसला वह करेंगे जो वापस आना चाहते हैं.
कश्मीर न छोड़ने की वजह बयान करते हुए मनोहर लाल कहते हैं, "एक तो किस्मत की बात है, दूसरा यह कि जहां मैं रहता था वहां माहौल मेरे ख़िलाफ़ नहीं था. साल 1998 तक मेरे इलाके लालगाम से कोई भागा नहीं था."
"लेकिन जब 1998 में वन्धमा में कुछ पंडितों की हत्या हुई तो सरकार ने मेरे इलाके के सब पंडितों को बड़गाम में एक साथ रखा. अब 2010 में यहां शरणार्थी शिविर कैंप में रखा गया."
अलबत्ता मनोहर लाल के दिल को इस बात का सदमा है कि पिछले 25 साल में कश्मीर में रहकर उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा.

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उनका कहना है, "शादी किसी की होती है तो कश्मीर से बाहर जाना पड़ता है. कोई मरता है तो पुरोहित को भी बाहर से लाना पड़ता है और त्यौहार होता है तो उसमें भी ऐसा ही होता है."
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