कश्मीरी पंडितों को बसाने का मसला ठंडे बस्ते में ?

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- Author, बशीर मंज़र
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
हालांकि भारत सरकार ने ये कहकर विवादों को शांत कर दिया है कि कश्मीरी पंडितों के लिए 'अलग से टाउनशिप' बनाने का कोई प्रस्ताव नहीं है. लेकिन जितना उपर से दिखाई देता है ये मामला उससे कहीं पेचीदा है.
यह विवाद पिछले महीने तब शुरू हुआ जब भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाक़ात की.
दोनों की बैठक के बाद प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के ज़रिए एक बयान जारी किया गया. इसमें कहा गया कि मुफ़्ती ने राजनाथ को आश्वस्त किया है कि वो कश्मीरी पंडितों के लिए 'अलग से टाउनशिप' बनाने के लिए जल्द से जल्द ज़मीन अधिग्रहण कर उपलब्ध करवाएँगे.
इस बयान से जम्मू-कश्मीर में तीखी बहस छिड़ गई. अलगाववादी गुट इसके ख़िलाफ़ सड़क पर उतर आए. नेशनल कॉन्फ्रेंस ने भी इसका विरोध किया.
'सांप्रदायिक बंटवारे की कोशिश'

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अलगाववादी नेताओं, सीपीआई (एम), कुछ निर्दलीय विधायकों के अलावा मुख्य विपक्षी दल नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जम्मू-कश्मीर को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की एजेंडे का हिस्सा बताया.
हालांकि मुफ़्ती और उनकी पार्टी पीडीपी ने इन आरोपों को ये कहकर ख़ारिज किया किया कि ये टाउनशिप केवल पंडितों के लिए नहीं बल्कि सबके लिए होगी. राज्य में पीडीपी और बीजेपी की गठबंधन सरकार है.
लेकिन विपक्षी दलों का विरोध तीखा होता गया.
अलगाववादियों की शह पर राज्य में विरोध प्रदर्शन, हड़ताल, धरने और पत्थरबाज़ी तक हुई.
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हरिभाई चौधरी ने लोकसभा में कहा है कि सूबे में पंडितों के लिए अलग से कोई विशेष ज़ोन नहीं तैयार करने का प्रस्ताव नहीं है.
गठबंधन विवादों में

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इस बयान के बाद फ़िलहाल पीडपी-बीजेपी गठबंधन राहत की साँस ले सकता है.
हालांकि गृह राज्य मंत्री के बयान से कश्मीरी पंडितों के एक गुट को निराशा हुई क्योंकि ये गुट लंबे समय से अपने लिए अलग से टाउनशिप बनाने की माँग कर रहा था.
बीजेपी के फ़ैसलों से लगता है कि इस समय वो राज्य में सत्ता में बने रहने को प्राथमिकता दे रही है. वो राज्य में अपने समर्थकों को ख़ुश करने के लिए कोई वैसा क़दम नहीं उठाना चाहती जिससे गठबंधन पर किसी तरह का ख़तरा आए.
हाल में लिए गए क़दम से समझा जा रहा है कि पार्टी मुफ़्ती सरकार पर से सूबे के अंदर मौजूद दबावों को कम करने की कोशिश कर रही है. गठबंधन तैयार होने के दिन से ही विवादों में घिरी रही है.
गठबंधन बचाने के लिए

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यह गठबंधन तब ख़तरे में नज़र आने लगा था कि जब अलगाववादी नेता मसर्रत आलम भट को जेल से रिहा किया गया. बीजेपी इससे काफ़ी आहत हुई थी और पार्टी के भीतर के कुछ नेता गठबंधन तोड़ने का दबाव बना रहे थे.
लेकिन मुफ़्ती को इस मामले में राहत मिली मसर्रत आलम से जिन्होंने पाकिस्तान झंडा फहराया और पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाये. उन्हें पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया.
मसर्रत के मामले में मुफ़्ती ने उन्हें गिरफ़्तार करके गठबंधन को बचाया तो पंडितों के लिए टाउनशिप के मु्द्दे पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह सुनिश्चित किया कि सूबे की सरकार बनी रहे.
(ये लेखक के अपने विचार हैं.)
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