बिहार: 'सपने अब भी बिकते हैं, बशर्ते भरोसा हो'

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    • Author, मधुकर उपाध्याय
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

भारतीय राजनीति का एक अलिखित नियम है कि चुनाव में जीत नेता की होती है और हार कार्यकर्ता की. दोष-पाप धोने की यह व्यवस्था हर पार्टी में एक जैसी है.

पहले चुनाव से लेकर आज तक इस नियम में कोई बदलाव नहीं हुआ है. इसे जस-का-तस बिहार विधानसभा के चुनावों पर देर-सबेर लागू कर दिया जाएगा.

यह प्रश्न पूछने की जगह नहीं छोड़ी जाएगी कि भारतीय जनता पार्टी की इस धुआंधार पराजय के लिए कौन ज़िम्मेदार है? या कि ठीकरा किसके सिर फोड़ा जाएगा?

इतिहास गवाह है कि यह सवाल जितनी बार पूछा गया, उत्तर हमेशा यही रहा कि पार्टी विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद स्थिति की ‘समीक्षा’ करेगी. वह ‘समीक्षा’, जिसमें अंततः तय पाया जाता है कि पराजय की ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री, पार्टी अध्यक्ष या रिमोट कंट्रोल की नहीं है, चाहे वह जनपथ पर हो या नागपुर में.

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राजनीतिक दलों से इतर इन नतीजों की तमाम व्याख्याएं होंगी जिनमें मोदी सरकार से मतदाता के मोहभंग का आकलन होगा. सिर्फ़ इसलिए नहीं कि भाजपा हार गई है बल्कि इसलिए भी कि राजनीति का नया समीकरण गढ़ने के उसके प्रयासों को धक्का लगा है.

अप्रैल-मई 2014 में हुए आम चुनाव में भाजपा सत्ता में आई तो उसकी एक बड़ी वजह इस नए समीकरण की उत्तर प्रदेश में सफलता को माना गया.

अस्सी में से इकहत्तर सीटें जीतकर भाजपा ने साबित कर दिया कि जाति इतना बड़ा अवरोध नहीं है और विकास की गाड़ी उसे कचरे के डिब्बे में डाल सकती है.

उत्तर प्रदेश में भाजपा पचास से अधिक सीटों का अच्छा प्रदर्शन पहले कर चुकी थी, लेकिन 2014 के परिणामों ने उसे बहुमत के साथ सत्ता में पहुंचा दिया. वही सीटें घटा दी जाएं तो भाजपा 2014 में भी उसी आंकड़े के आसपास होती, जहां वह पहले होती थी.

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हालांकि बिहार की तरह ही ‘जाति-ग्रस्त’ उत्तर प्रदेश ने ऐसा आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में भी किया था, लेकिन वह पैंतीस साल पुरानी बात थी. नए संदर्भ में उसे नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, कार्यक्षमता और सपने के बर-अक्स देखा गया, जो अनुचित नहीं था.

2014 में माना गया कि उत्तर प्रदेश के नतीजों ने साबित कर दिया है कि विकास जाति से बड़ा मुद्दा है. सपने अब भी बिकते हैं और लोग उन्हें ख़रीदते हैं, बशर्ते बेचने वाले पर उन्हें भरोसा हो.

साल भर बाद, 2015 में सवाल यह है कि क्या बिहार में लालू-नीतीश की जीत ने जातिगत समीकरणों को राजनीति में पुनः स्थापित कर दिया है?

या यह नीतीश के विकास और लालू के मज़बूत जाति समीकरणों का नतीजा है, जिसे भाजपा तोड़ नहीं पाई. या फिर इसे जाति और विकास का कॉकटेल माना जाए, जो भविष्य की राजनीति का आधार बनेगा?

या भारतीय जनता पार्टी का सपनों का सौदागर अब पहले जैसा बिसाती नहीं रह गया? उसका टोकरा ख़ाली हो गया?

जाति के आधार पर टिकट सभी दलों ने दिए. यादव या कुर्मी बहुल क्षेत्रों में सभी दलों के उम्मीदवार उन्हीं जातियों के थे लेकिन अंतिम परिणाम में सीटों का गणित भाजपा और मोदी के ख़िलाफ़ चला गया.

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तात्कालिक रूप से उपलब्ध आंकड़े इसकी तस्दीक़ करते हैं.

कुल विजयी यादव प्रत्याशियों में से 54 लालू-नीतीश-राहुल के महागठबंधन के थे जबकि भाजपा के खाते में केवल पांच यादव सीटें आईं.

कुर्मी उम्मीदवारों में 16 विजेता महागठबंधन के रहे, और भाजपा को एक सीट मिली. कोरी विजेताओं में महागठबंधन को भाजपा से चार गुना अधिक सीटें मिलीं.

यद्यपि अति पिछड़ों में मुक़ाबला सात-छह से लगभग बराबरी का रहा, पर दलित उम्मीदवारों में लालू-नीतीश को 27 और भाजपा को नौ सीटें प्राप्त हुईं.

इसके बावजूद यह तथ्य महत्वपूर्ण है और उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता कि बिहार ने अश्वमेध का घोड़ा दूसरी बार रोका है. दोनों बार यज्ञ करने वाली जमात भारतीय जनता पार्टी रही. पहले उसने लाल कृष्ण आडवाणी का रथ रोका था और इस बार, उसके दूसरे संस्करण में, नरेंद्र मोदी का.

लोकसभा चुनाव के साल भर में बहुत कुछ बदल गया. बिहार के मतदाताओं ने मोदी के विकास और उनके जाति-समीकरण पर भरोसा नहीं किया. कटाक्ष उलटे पड़ गए. जुमले मज़ाक़ बने. एनडीए मूलतः बिहार के डीएनए में नहीं था और उसने इसे दिखा दिया.

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