पटेल आंदोलन को गुजरात सरकार ने कैसे थामा?

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- Author, दर्शन देसाई
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
22 साल के हार्दिक पटेल के पाटीदार आंदोलन ने कुछ ही महीने पहले आनंदीबेन पटेल की गुजरात सरकार को हिला दिया था, लेकिन राजकोट में भारत और दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ वनडे मैच के दौरान प्रदर्शन की उनकी धमकी का कहीं कोई असर नहीं दिखा.
उन्हें दर्जन भर समर्थकों के साथ स्थानीय पुलिस ने मैच शुरू होने से काफ़ी पहले ही गिरफ़्तार कर लिया और इस पर सामुदायिक स्तर पर कोई विरोध देखने को नहीं मिला. हार्दिक की गिरफ़्तारी के बाद क्रिकेट स्टेडियम भी दर्शकों से भरा नजर आया.
पटेल ने धमकी दी थी कि वे अपने 50 हज़ार समर्थकों के साथ भारत और दक्षिण अफ़्रीकी टीम को स्टेडियम तक नहीं पहुंचने देंगे. लेकिन उनके समर्थन में कोई भीड़ नहीं आई.

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टीम होटल से लेकर स्टेडियम तक पुलिस की पुख़्ता सुरक्षा व्यवस्था थी. सौराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन ने मैच के दौरान कोई बाधा नहीं आए, इसका इंतज़ाम किया हुआ था.
इतना ही नहीं बीजेपी के कार्यकर्ता नरेंद्र मोदी की टीशर्ट पहने हुए स्टेडियम में दर्शकों की भीड़ में नजर आए. वैसे यह पहली बार नहीं है, जब हार्दिक पटेल के आंदोलन की हवा निकली हुई दिखी.
बहरहाल, महज चार महीने पहले ही अहमदाबाद के वीरामगम तहसील के इस युवा ने गुजरात की राजनीतिक में भूचाल ला दिया था.
अब तक बीजेपी के समर्थक रहे पटेलों (सूबे की मुख्यमंत्री भी इसी समुदाय से हैं) को साथ लेकर हार्दिक पटेल ने पाटीदार आंदोलन समिति की शुरुआत की थी.
दरअसल गुजरात में पाटीदार पटेल, लेउवा और काडवा समुदाय को सामूहिक रूप से कहते हैं.

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पहले तो हार्दिक को ज़्यादा महत्व नहीं दिया गया, लेकिन जल्दी ही हार्दिक की रैलियों में हज़ारों की भीड़ उमड़ने लगी.
आनंदीबेन पटेल सरकार ने जब कहा कि पटेलों को कोटा आरक्षण देना संभव नहीं होगा क्योंकि संविधान केवल 50 प्रतिशत तक आरक्षण देता है, इसके बाद हार्दिक का ग्राफ़ तेजी से चढ़ा.
आनंदीबेन पटेल ने पटेलों से इस विरोध प्रदर्शन से दिगभ्रमित नहीं होने की भी अपील की. लेकिन इससे हालात नहीं बदले और सूरत में हार्दिक की पहली मोटरसाइकिल रैली में बड़ी तादाद में युवा शामिल हुए. अहमदबाद में 26 अगस्त को हुई रैली में लोगों की संख्या और बढ़ गई.
पुलिस ने जब इस रैली पर कार्रवाई की तो पाटीदारों ने भी ज़ोरदार ढंग से विरोध किया. देर रात हुई हिंसा में 12 लोगों की मौत हो गई.
इन रैलियों की कामयाबी को देखते हुए हार्दिक ने रिवर्स दांडी यात्रा निकालने की घोषणा की. उधर राज्य सरकार ने सीनियर कैबिनेट मंत्री नितिन पटेल की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाकर हार्दिक की मांगों पर विचार करने को कहा.

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इसके बाद 14 सितंबर को मुख्यमंत्री ने हार्दिक पटेल और उनके समर्थकों से मुलाकात भी की. इस मुलाकात में हार्दिक और उनके समर्थकों ने कोटे की मांग के बदले अहमदाबाद रैली पर कार्रवाई करने वाले 4200 पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई करने की मांग की.
इसके अलावा उन्होंने राज्य के गृह मंत्री रजनीकांत पटेल को निलंबित करने की मांग भी की.
राज्य सरकार ने हार्दिक से दस दिन का समय मांगा और उनसे सभी रैलियों और विरोध प्रदर्शन को रद्द करने को कहा.
यहीं पर हार्दिक पटेल से चूक हुई, उनकी इच्छा राष्ट्रीय राजनीति में सभी पटेलों को एकत्रित करने की हो चली थी लेकिन उन्होंने सरकार के साथ बातचीत का पहला नियम तोड़ा, बैठक से बाहर निकलते ही उन्होंने कहा कि रिवर्स दांडी यात्रा अब 19 सितंबर को एकता यात्रा के नाम से होगी.

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यहीं से हार्दिक के आंदोलन कमज़ोर होता गया. सरकार ने उनपर रणनीतिक तौर पर अंकुश लगाने का फ़ैसला कर दिया. सूत्रों के मुताबिक यह केंद्र सरकार से सलाह मशविरा के बाद किया गया.
एक जगह पर चार से ज्यादा लोगों के एकत्रित होने से रोकने के लिए धारा 144 लगा दी गई. मुख्यमंत्री कार्यालय ने किसी भी विरोध प्रदर्शन पर सख़्ती के आदेश दे दिए.
इसके बाद हार्दिक पटेल ने घोषणा की एकता यात्रा निकालने के लिए उन्हें जेल जाना पड़ा तो भी वे जाएंगे. लेकिन इस यात्रा के लिए वे समर्थन नहीं जुटा पाए.
ऐसा केवल इसलिए नहीं हुआ कि सरकार ने सख़्ती दिखानी शुरू की, बल्कि दूसरे मंच भी सामने आ गए. दलित और आदिवासियों के मंच ओबीसी एकता मंच ने दांडी में काउंटर रैली निकालने की घोषणा कर दी थी.
दक्षिण गुजरात में अति पिछड़ा वर्ग और आदिवासियों की बड़ी संख्या को देखते हुए हार्दिक अगर रैली करते भी तो उनकी रैली कामयाब नहीं होती.

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हार्दिक पटेल 19 सितंबर को बदहवास नज़र आए. उन्होंने अलग अलग स्थानों से एकता यात्रा शुरु करने की कोशिश की और आख़िरी समय में सूरत के पटेल बाहुल्य इलाक़े वारच्छा से रैली शुरू की, लेकिन वहां बमुश्किल 50 लोग एकत्रित हो पाए.
पुलिस ने पहले तो वहां बैठक करने की इजाजत दी और बाद में हार्दिक और उनके 30 समर्थकों को हिरासत में ले लिया. देर रात में उन्हें रिहा किया गया और इस दौरान ना तो कोई विरोध प्रदर्शन हुआ, ना हिंसा हुई, कुछ नहीं हुआ.
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