हार्दिक की 'हठी राजनीति' के मायने

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- Author, शिव विश्वनाथन
- पदनाम, समाजशास्त्री
हार्दिक पटेल अब एक ऐसे बेतरतीब नौजवान भर नहीं हैं जिन्होंने नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी को उनके ही अखाड़े में ताल ठोंककर हैरान कर दिया था.
अब उन्हें महज़ जुनूनी शख़्स के तौर पर नहीं देखा जाता बल्कि वो भारतीय मध्य वर्ग के उस सामूहिक परिदृश्य का हिस्सा हैं जो ओबीसी के तहत कोटे की मांग करने के संकम्रण में जकड़ा है.
उन्होंने ख़ास क़िस्म की राजनीति से शुरुआत की, फिर वो उसका प्रतीक बन गए और वो अब पिछड़ों की उस राजनीति की नुमाइंदगी कर रहे हैं जहां हर जाति दूसरी जाति से ज़्यादा पिछड़ी नज़र आना चाहती है.
इसके लिए तर्क क़ानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था से उपजे हैं. अगर लाइसेंस राज समाजवादी व्यवस्था को भ्रष्ट बना देता है तो कोटा राज आरक्षण व्यवस्था को पटरी से उतार देता है.
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कोर्ट का आदेश है कि आरक्षण की अधिकतम सीमा पचास फ़ीसदी होनी चाहिए जिससे न्याय की नज़र में क़ाबिलियत और आरक्षण के बीच संतुलन रह सके.
लेकिन चुनावी राजनीति की अपनी विडंबनाएं हैं, जहां संख्या का तर्क, ख़ासकर वो जो दबंग जातियों जुड़े हों, वो कोर्ट के निर्देश को बनावटी कार्रवाई के तौर पर देखता है.
अजब ये है कि इससे चुनाव लोकतंत्र के ख़िलाफ़ संघर्ष में तब्दील हो जाते हैं जहां वितरण की मांग की टक्कर न्याय से होती है.
अब लोकतंत्र के मायने हाशिए पर मौजूद लोग और जनजातीय समूह नहीं बल्कि दबंग जातियों के लिए मलाई का बड़ा हिस्सा हासिल करना है.
ज़्यादा सीटों और ज़्यादा हिस्सा आबंटित करने की मांग करने वाली जातियां असल में ट्रेड यूनियनों की तरह हो गई हैं.
हार्दिक पटेल इसी परिदृश्य के प्रतिनिधि हैं. एक तरह से हार्दिक जिस बात को लेकर इतने हठी बने हुए हैं और खुलेआम धमकी दे रहे हैं, उसे लेकर ही जाटों, गुजर्रों और पटेलों में असंतोष है.
आरक्षण का खेल

ये सभी दबदबे वाली जातियां हैं जो मानती हैं कि वो कोटे के खेल में पीछे छूट गई हैं और अपनी नाराज़गी अपेक्षाकृत वंचितों की भाषा में ये पूछते हुए जाहिर करती हैं कि जब नब्बे फीसदी नंबरों के साथ एक पटेल लड़का चालीस फीसदी पाने वाले अनुसूचित जाति वाले शख़्स से पिछड़ जाता है तो कैसा लगता है.
इन जातियों को न्याय में दिलचस्पी नहीं है बल्कि वो नियमों पर टिके आरक्षण नाम के खेल की प्रक्रिया में निष्पक्षता चाहती हैं.
हां, ये सही है कि हर खेल में थोड़ी बहुत संस्थागत बेईमानी होती है. भारत में विधायिका अपनी हेराफेरी या फिर अधिक लोकलुभावन प्रयासों को अनुसूची नौ के तहत छुपा सकती है.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख़ अपनाते हुए सुनिश्चित किया है कि अनुसूची नौ का इस्तेमाल कम से कम हो.
इसका हासिल जातिगत कोटे की बढ़ती मांग है जिसे स्वार्थी नेता हवा देते हैं. वो जानते हैं कि जातिगत कोटा ‘रुसी रुलेट’ की तरह का खेल है जो कोर्ट और विधायिका के बीच खेला जाता है.
अंदर ही अंदर सुलगने वाली नाराज़गी की ये राजनीति जो हाल तक सड़क और ट्रेन जाम करते हुए दिखती थीं, अब हार्दिक पटेल के आने पर खुला खेल बन चुकी है.
हार्दिक पटेल हर वो जाट, गुर्जर और पाटीदार है जो कोटा राजनीति के मोह में जकड़ा है.
ब्रांड हार्दिक

ये मानना होगा कि हार्दिक पटेल की राजनीति पर घरेलू राजनीति हालात का ही असर है.
उन्होंने दमदार पटेल राजनीति के ख़िलाफ़ नाराज़ युवा पटेलों के संघर्ष की अगुवाई की. ये ब्रांड हार्दिक का एक और पहलू है जिसे पहचानने की ज़रूरत है.
हार्दिक ने सामाजिक स्तर पर युवाओं की उस अधीरता, महत्वाकांक्षा और सपनों को अभिव्यक्त किया जिसे मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल नहीं देख सकीं.
आनंदीबेन ने एक राजनेता के तौर पर सिर्फ़ पटेलों और भारतीय जनता पार्टी को ही मान्यता दी. उनका साफ़ तौर पर मानना था कि दोनों विकास के पहिए से गुंथे हैं.
वास्तव में वो हार्दिक की मांग को गुस्ताखी मानते हुए ख़ारिज करने की कोशिश में रहीं. उन्होंने इस तरह की राजनीति की ताक़त को कम करके आंका जो हर धमकी, हर वार और हर गिरफ़्तारी के बाद बढ़ती गई.
इसकी वजह ये रही कि वो नहीं बल्कि हार्दिक युवाओं की उम्मीदों की दुनिया का प्रतिनिधित्व कर रहे थे.
'इंडियन ऑफ द ईयर'

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मुख्यमंत्री की अनदेखी से अस्सी के दशक जैसे दंगे भड़क उठे लेकिन कोई भी ये समझ सकता है कि पहले के नवनिर्माण मूवमेंट की तरह हार्दिक पार्टी आकाओं के सावधानी से तैयार किए गए ढांचों को तबाह कर सकते हैं.
पटेल की छोटी सी जंग ये है कि जातिगत कोटे के बड़े संघर्ष में पटेलों की अनदेखी ना हो.
हार्दिक पटेल के पास ओबीसी का मर्तबान है जो कोटा संघर्ष की आंच में उबल रहा है. वो पार्टी और नौकरशाही को चुनौती देने को तैयार युवाओं की स्वायत्त शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं.
वो ऐसे नए नागरिक भी हैं जो लोकतंत्र को एक ग्राहक के नज़रिए से देखता है और उसका असर देखने के बाद ही नतमस्तक होने को तैयार होता है.
हार्दिक ने राजनीतिक खेल की रूपरेखा बदल दी है. वो जीतें या हारें वो 'इंडियन ऑफ द ईयर' बन चुके हैं.
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