सौ रंगों से सजी उस्ताद साबरी की सारंगी

    • Author, प्रीति मान
    • पदनाम, फ़ोटो पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

सारंगी नवाज़ उस्ताद कमाल साबरी का जन्म संगीत को समर्पित परिवार में हुआ. वे सारंगी वादन की सातवीं पीढ़ी से आते हैं.

उनकी संगीत की शिक्षा सेनिया और मुरादाबाद घरानों की उत्तर भारतीय शैली में हुई.

पाँच वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने पिता और गुरु उस्ताद साबरी खान से सारंगी की शिक्षा लेनी शुरू की.

पदमश्री उस्ताद साबरी खान प्रख्यात सारंगी वादक हैं.

उस्ताद कमाल साबरी ने आज के दौर के संगीत के साथ भी कई नए प्रयोग किए हैं.

उन्होंने तिहाड़ जेल के कैदियों को एक साल संगीत सिखाया और फिर उनके साथ एक एल्बम 'सारंगी रिडिफाइन' नाम से बनाई जो काफी प्रसिद्ध हुई.

इसका प्राचीन नाम 'सारिंदा' है जो बाद में सारंगी हुआ. सारंगी मुख्य रूप से गायकी प्रधान वाद्य यंत्र है. इस यंत्र में 35 तक तार होते हैं.

कमाल साबरी

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इमेज कैप्शन, वर्ष 2006 में उस्ताद कमाल साबरी का पहला एल्बम 'डांस ऑफ़ द डेज़र्ट' ग्रैमी अवार्ड के लिए नामांकित हुआ. वो देश-विदेश में कई एकल प्रस्तुतियां दे चुके हैं. तस्वीर में कमाल साहब अपने बेटे के साथ नज़र आ रहे हैं.
सारंगी

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इमेज कैप्शन, सारंगी मुख्यतः उत्तर भारतीय संगीत शैली का वाद्य यंत्र है. सारंगी शब्द हिंदी के 'सौ' और 'रंग' से मिलकर बना है जिसका मतलब है सौ रंगों वाली. सारंगी को पिनाकिनी या पिनाकी वीणा भी कहा जाता था.
कमाल साबरी

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इमेज कैप्शन, कमाल साबरी का कहना है की सारंगी ऐसा वाद्य है, जो हर तरह के संगीत के साथ बजाया जा सकता है.
कमाल साबरी

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इमेज कैप्शन, कमाल साहब कहते हैं कि एक सारंगी वादक हर घराने के संगीतकार के साथ बजा सकता है. पर यह बात और वाद्य यंत्रों पर लागू नहीं होती.
सारंगी

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इमेज कैप्शन, सारंगी वादक को साज़ के साथ सुर की बारीकियों का ज्ञान होना भी जरूरी है. सारंगी एक विशेष प्रकार के 'तुन' के पेड़ की लकड़ी से बनाई जाती है जिसे ख़ास कारीगर ही बना सकते हैं.
कमाल साबरी

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इमेज कैप्शन, कमाल साबरी सारंगी की परंपरा को आगे ले जा रहे हैं और चाहते हैं उनके खानदान की नयी पीढ़ी इस सफर को बरक़रार रखे.
कमाल साबरी

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इमेज कैप्शन, कमाल साबरी हिंदुस्तानी शागिर्दों को तालीम देने के साथ ही विदेशों में भी सारंगी सिखाते हैं, ताकि यह साज़ दुनिया भर में अपनी पहचान कायम करे.
सारंगी

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इमेज कैप्शन, ऐसा माना जाता है कि सारंगी ही एकमात्र ऐसा वाद्य है जो मानव कंठ के सबसे नजदीक है.
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इमेज कैप्शन, कमाल साबरी कहते हैं कि परंपरा को बिना बदले नए प्रयोग करके ही किसी भी साज़ को नयी पहचान दी जानी चाहिए.

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