शादी के झगड़े सुलझाने का अनोखा पारसी ढंग

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    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

आदी नरीमन मोग्रेलिया व्यंग में कहते हैं, “एक समय था, जब तलाक़ के अधिकांश मामले त्रिकोणीय प्रेम कहानियों की वजह से होते थे.”

“मतलब अक्सर किसी तीसरा मर्द या औरत तलाक़ का कारण बनते थे. अब ज़माना बदल गया है. मीडिया, नॉवेल, टीवी आदि चीज़ों ने महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति सजग बना दिया है. इसलिए हमारे समुदाय में तलाक़़ के मामले बढ़ गए हैं.”

75 साल के आदी नरीमन एक रिटायर्ड सेल्समैन हैं और पिछले साढ़े तीन दशक से पारसी समुदाय में वैवाहिक विवादों के निपटारे के लिए समुदाय के जूरी के रूप में काम कर रहे हैं.

वो डेढ़ सौ साल पुरानी परम्परा को निभा रहे हैं जिसके तहत इसी धर्म के सदस्यों वाली जूरी, तेज़ी से छोटे होते समुदाय के वैवाहिक विवादों को निपटाती है.

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पांच सदस्यों वाली इस जूरी में आम तौर पर रिटायर्ड आदमी और औरतें शामिल होते हैं.

ये जूरी पारसी जोड़ों को तलाक़ देने या न देने का फ़ैसला करने के लिए मुंबई हाईकोर्ट में रोज़ाना छह घंटे तक और एक सत्र में अधिकतम 10 दिनों तक समय देती है.

फ़ैसला देने वाले इन सदस्यों को समुदाय की काउंसिल एक दशक के लिए नामित करती है.

अध्यक्षता करने वाला जज इन पांच सदस्यों को लॉटरी के मार्फ़त चुनता है, हालांकि मुद्दई और प्रतिवादी पक्षों के वकील किसी जूरी सदस्य पर दूसरे पक्ष के साथ जान-पहचान का हवाला देकर वीटो कर सकते हैं.

इन जूरी सदस्यों के पास सारे काग़जात होते हैं, वो जज से अलग बैठते हैं और अपना फ़ैसला जज को बताते हैं.

अनोखी अदालत

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जूरी में शामिल इन सदस्यों को, जो रिटायर्ड बैंक ऑफ़िसर, टीचर, डॉक्टर, पुलिस कर्मचारी, बीमा एजेंट, सेल्समैन होते हैं, समुदाय की परिषद की ओर से रोज़ 500 रुपये का भत्ता दिया जाता है.

ये जूरी आम तौर पर साल भर में कुछ दफ़े ही बैठती है. पिछली जुलाई में अंतिम सत्र हुआ था जो कि इस साल का तीसरा था. इन दस दिनों में तलाक़़ के 26 मामलों की सुनवाई हुई हालांकि काफ़ी मुक़दमे अभी भी लंबित हैं.

भारत ने साल 1959 में जूरी सिस्टम को ख़त्म कर दिया था जब एक नेवी अधिकारी द्वारा एक महिला की कथित सनसनीखेज़ हत्या के मामले में जूरी के एक फ़ैसले को मुंबई हाईकोर्ट ने पलट दिया था.

पारसी क़ानूनी संस्कृति पर क़िताब लिखने वाले अमरीका के क़ानून इतिहासविद़ प्रोफ़ेसर मित्रा शराफ़ी कहते हैं, “पारसी परिवार अदालतें भारत में अनोखी हैं. पर्सनल लॉ का कोई और निकाय जूरी का इस्तेमाल नहीं करता है.”

प्रोफेसर शराफ़ी कहते हैं, "शुरुआती दिनों में नौ सदस्यों वाली जूरी में मुख्य रूप से बुज़ुर्ग पारसी आदमी होते थे, जो मुंबई के व्यापारी, पेशवर या बौद्धिक कुलीन वर्ग से होते थे."

तलाक़़ के मामले

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आश्चर्यजनक रूप से, भारत जैसे देश में मुक़दमा करने वालों की अधिक संख्या महिलाओं की है.

दशकों पहले भी तलाक़ के मामले में मुकदमा करने वालों में महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया था. इनमें अधिकांश महिलाएं ग़रीब और मज़दूर वर्ग से आती थीं और आम तौर पर ये अपने मुक़दमें जीतती थीं.

लेकिन डेढ़ शताब्दी के बाद भी ये चीजें बहुत नहीं बदली हैं.

मोग्रेलिया कहते हैं, “आजकल सामने आने वाले तलाक़़ के आधे मामले महिलाओं की ओर से दायर किए जाते हैं.”

उनके मुताबिक़, “अब वो अपने अधिकारों के लिए पहले से अधिक सजग हैं. लेकिन मेरे लिए जो एक यादगार केस था, उसमें एक आदमी ने कहा कि वो अपनी पत्नी द्वारा किए जाने वाले मानसिक उत्पीड़न के कारण तलाक़ चाहता है. उसने कहा कि उसकी पत्नी उसे इतना झगड़ा करती है कि वो काम करने में अपना मन नहीं लगा पाता. हमने उसे तलाक़ की इजाज़त दे दी.”

जूरी के सदस्य कुछ यादगार मामलों को याद करते हैं: एक महिला को इसलिए तलाक़ की इजाज़त दी गई क्योंकि उसका पति परिवार को छुट्टियों में बाहर नहीं ले जा रहा था, परिवार को समय नहीं दे रहा था और बहुत ज़्यादा जुनूनी था.

महिलाओं में जागरूकता

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एक अन्य मामले में पति इतना धार्मिक था कि रोज़ समुदाय के 25 धार्मिक स्थलों पर प्रार्थना करने जाता था.

एक दशक तक जूरी के सदस्य के रूप में काम करने वाले 65 साल की रिटायर्ड बैंक अधिकारी जास्मिन बस्तानी कहती हैं, “मुझे याद है कि जज ने पति को समझाया कि वो अपने घर में प्रार्थना कर सकता है या केवल एक धर्मस्थल पर जा सकता है, इससे ज़्यादा करने की कोई ज़रूरत नहीं. वो आदमी सहमत हो गया और तलाक़ की इजाज़त नहीं दी गई.”

व्यभिचार, दो शादियां और साथी को छोड़ देने जैसे मामले शुरुआती दिनों में तलाक़़ के प्रमुख कारण थे.

वो बताती हैं, “लेकिन अब जैसे जैसे पारसी महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और जागरूक हो रही हैं, वैसे वैसे व्यवहार में अपने साथी के साथ मेल मिलाप और सहने की कमी आती जा रही है.”

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के इतिहासविद दिनयार पटेल, जो खुद एक पारसी हैं, कहते हैं, “पिछली शताब्दी की शुरुआत से ही यह समुदाय बेहद पश्चिमी रहन सहन वाला था. हमने प्रेम विवाह के पश्चिमी तौर तरीकों को अपनाया. स्वाभाविक रूप से इसने शादी से होने वाली उम्मीदें के बारे में मानक को और ऊंचा उठा दिया है.”

पश्चिमी रहन सहन

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दिनयार पटेल बताते हैं, “पिछले कुछ दशकों में, हमने विवाह को लेकर बहुत लापरवाही वाला रुख़ अख़्तियार कर लिया है. कुछ साल पहले एक नौजवान पारसी महिला ने मुझे बताया था कि उसके और उसके पति के बीच संबंध न के बराबर रह गया था इसलिए उसने तलाक़ की अपील दायर कर दी थी. मैं हैरान रह गया था क्योंकि इससे पहले मैंने किसी पारसी से ऐसी बात कभी नहीं सुनी थी.”

वे कहते हैं, “मैंने केवल गंभीर अपराध जैसे बेवफ़ाई आदि पर ही तलाक़ मांगने के बारे में सुना था. मैं समझता हूं कि अधिक से अधिक पारसी अपने विवाह को दुरुस्त करने की कोशिश की बजाय उससे निकलना चाहते हैं.”

भारतीय पारसी एक अनोखा समुदाय है. भारत में क़रीब 70,000 पारसी रहते हैं और इनमें से अधिकांश मुंबई में हैं.

पूरे भारत के मुक़ाबले इनमें शादी की औसत उम्र सबसे अधिक है. इनमें शादी की दर और जन्मदर पूरी दुनिया में सबसे कम है. एक पारसी जन्म लेता है तो तीन मरते हैं.

मुंबई में महंगी रिहाईश भी तलाक होने की एक वजह है. अधिकांश पारसी मुंबई में काउंसिल की 18 अधिसूचित कॉलोनियों में रियायती दरों पर रहते हैं.

जिन पारसी जोड़ों की आय महीने में 80,000 रुपए से कम है, उनको सस्ते घर देने के लिए काउंसिल ने मुंबई में 4,500 फ़्लैट बनावाए हैं. क़रीब 500 जोड़े मुफ़्त रिहाईश पाने के इंतज़ार में हैं और संयुक्त परिवार में रह रहे हैं.

बिखराव

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यह समुदाय बिखर गया है और पत्नियां नई जगह पर जाना नहीं चाहतीं. बढ़ते अंतर धार्मिक विवाहों और इसकी वजह से सांस्कृतिक भिन्नता आने के कारण तनाव बढ़ा है.

मुंबई में इस तरह की शादियों का प्रतिशत क़रीब 40 है जबकि अन्य जगहों पर ये इससे भी अधिक है.

पारसी वकील आर्मेटी खुशरूशाही के मुताबिक़, तलाक़ की वजह है देर से शादी होना, मां-बाप का ख़याल रखने वाले एक ही बच्चा होना, सास-ससुर से विवाद, जगह की किल्लत वाले मुंबई शहर में संयुक्त परिवार वाले तंग अपार्टमेंटों में रिहाईश.

इन सबके बीच पारसी पारिवार अदालतें आलोचना के घेरे में हैं. मुख्य आलोचना है कि जो पारसी तलाक़ चाहते हैं उन्हें लंबा इंतज़ार करना पड़ता है क्योंकि साल में कुछ बार ही ये जूरी बैठती है.

वो कहते हैं, “इसके बावजूद कुल मिलाकर ये समुदाय की बेहतर सेवा करती हैं. जूरी सदस्य व्यावहारिक होते हैं और दंपत्तियों की तकलीफ को बढ़ाते नहीं हैं.”

ये ऐसा ही जैसा कि रोहिंगटन मिस्त्री के एक नॉवेल का एक क़िरदार कहता है, ‘गंदे पारसी कपड़ों को सार्वजनिक रूप से धोने का कोई फ़ायदा नहीं.’

मिस्त्री खुद मुंबई के पारसी समुदाय से आते हैं.

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