फ़्रांसः लाइव प्रसारण ने लोगों को ख़तरे में डाला

इमेज स्रोत, Getty
- Author, ह्यू स्कोफ़ील्ड
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
चरमपंथी घटना की लाइव कवरेज के वक्त प्रसारण करने वाले पत्रकारों की हद क्या होनी चाहिए?
ख़ासकर तब जबकि उनकी रिपोर्ट घटना पर असर डाल सकती हो और इससे कई लोगों का जीवन भी ख़तरे में पड़ सकता हो.
फ्रांस की राजधानी पेरिस में जनवरी में हुए हमलों को मीडिया ने जिस तरह से हैंडल किया, उसे लेकर कानूनी जांच शुरू हो गई है और उसी के बाद ये सवाल पूछा जा रहा है.
भारत में भी ऐसी घटनाओं के दौरान लाइव कवरेज करने वाले पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की भूमिका और ज़िम्मेदारी को लेकर सवाल उठते रहे हैं.
'ख़तरे में पड़ी जान'

इमेज स्रोत, AFP
फ्रांस में कानूनी शिकायत के एक मामले में सुपरमार्केट में हुए हमले के दौरान कोल्ड रूम में छुपे छह लोगों ने दावा किया है कि घटना के सीधे प्रसारण से हमलावर अमिदी कॉलिबली को उनकी मौजूदगी के बारे में जानकारी मिल सकती थी.
इसे लेकर उन्होंने क़ानूनी कार्रवाई शुरू की है.
वहीं दूसरे मामले में लिलियां लेपरे ने आरोप लगाया है कि क्वाशी भाइयों के हमले के वक्त एक रिपोर्ट से उनकी जान ख़तरे में पड़ गई थी.
उनका कहना है कि अगर चमरपंथी रिपोर्ट सुन रहे होते तो उनकी जान ले सकते थे. क्वाशी भाई 'शार्ली एब्डो' पत्रिका के दफ्तर पर हमला करने वाले संदिग्ध हमलावर बताए गए थे.
दोनों मामलों में जांच शुरू हो गई है. अगर जांच करने वालों को सबूत काफ़ी लगे तो कई रेडियो और टीवी चैनलों के खिलाफ केस चलाया जा सकता है.
उठे सवाल

कानूनी पहलुओं के परे इस मुद्दे से जुड़े कई नैतिक सवाल भी हैं.
हाल के वर्षों में तकनीक ने नाटकीय और त्रासद घटनाओं के सीधे प्रसारण को संभव बना दिया है.
अमरीका की वर्जीनिया में लाइव रिपोर्टिंग के दौरान दो पत्रकारों को गोली मारने की घटना के बाद भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या लगातार कवरेज देकर प्रसारक अपराधियों और चरमपंथियों के गेमप्लान में घिर रहे हैं?
पेरिस में हुए हमले जैसी घटनाओं को लेकर सवाल उठते हैं कि क्या प्रसारकों को खबरों को रोक कर रखना चाहिए?
क्या उन्हें पुलिस के सेंसर को मान लेना चाहिए?
उन्हें 'खास तस्वीरों' को रोक लेना चाहिए चाहें वो सोशल मीडिया पर छाई हुई हों.
'आरोप गलत'

इमेज स्रोत, AP
फ्रांस के प्रसारकों को लगता है कि जनवरी की घटना को लेकर उन पर बेवजह हमला किया जा रहा है
बीएफएमटीवी के न्यूज़ हेड हर्व बेरु कहते हैं, "अगर संगठित और ज़िम्मेदार मीडिया को दंडित किया जाता है, खुद को सेंसर करने को कहा जाता है तो दर्शक सोशल मीडिया और इंटरनेट पर जाएंगे जहां सामग्री पर कोई कंट्रोल नहीं है."
वो कहते हैं कि जनवरी हमले के दौरान 70 घंटे की लाइव कवरेज में सिर्फ 23 सैकेंड के लिए गलती हुई जब ये बता दिया गया कि लोग कोल्ड रूम में हैं.
उन्होंने कहा कि वो इस गलती को मानते हैं.
कानून के विशेषज्ञ भी मानते हैं कि अगर ऐसे मामले अदालत तक पहुंचे तो टिकेंगे नहीं. ऐसे सबूत न के बराबर हैं कि मीडिया रिपोर्ट्स ने लोगों की जान जोखिम में डाली.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>













