'छाती का दूध पिलाती हूं तो बच्चा ज़िंदा है'

असम बाढ़ और बच्चे

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    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

असम में बाढ़ की वजह से आबादी का एक बड़ा हिस्सा बुरी तरह प्रभावित हुआ है. प्रभावित लोगों में से अधिकतर खेती करने वाले और दिहाड़ी मज़दूर हैं.

राहत शिविर सरकारी स्कूलों में खोले गए हैं जहां ज्यादातर लोग फिर से अपना घर बनाने के लिए अब सरकारी मुआवज़े के इंतजार में हैं.

लेकिन संपत्ति नुकसान का आकलन कर रहें सरकारी अधिकारी कहते है कि नए घर बनाने में अभी समय लगेगा, लेकिन कितना, वे इसके बारे में कुछ नहीं बताते.

राज्य के बंगाईगाव ज़िले के बिजनी राजस्व क्षेत्र के कुरसाकाटा के दो नंबर गारो गांव में बने राहत शिविर का दौरा करने पर सरकार के दावों और विस्थापितों की दुर्दशा का पता चला.

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इमेज कैप्शन, गुलेज़ा बेगम अपने तीन महीने के बच्चे के साथ

21 साल की गुलेज़ा बेगम अपने तीन महीने के बच्चे को छाती पर लगाती हुई कहती हैं, ''बाढ़ और ज़मीन कटाव ने हमसे सबकुछ छीन लिया. 15 दिन पहले हम अपने परिवार के साथ अपने घर में रह रहे थे. अचानक आई बाढ़ की वजह से घर मिट गया, अब बेघर हैँ.''

वह कहती हैं कि राहत शिविर में भी भरपेट खाना नहीं मिलता, सरकार कोई बेबी फ़ूड नहीं देती और अब उनके पास बच्चे को खिलाने के लिए कुछ नहीं बचा है.

वह कहती हैं, “मैं अपने बच्चे को छाती का दूध पिलाती हूं. इसलिए वह जिंदा है. सरकार समय पर चावल दे तो हम पर बहुत मेहरबानी होगी.''

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46 साल के कार्तिक बर्मन पेशे से मज़दूर हैं. वह कहते हैं, ''बाढ़ आने के बाद सरकार ने राहत के नाम पर केवल दो दिन चावल दिए थे. प्रति व्यक्ति डेढ़ किलो चावल. मंत्री या ज़िलाधिकारी अपने घर वालों के साथ ऐसा करेंगे?''

ननी गोपाल राय कहते है कि बाढ़ और मिट्टी कटने की वजह से जब हमारे घर और खेत ख़त्म हो गए, उसके बाद सरकारी अधिकारियों ने ख़बर लेना सही नहीं समझा.

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उन्होंने बताया कि बाद में गांव वालों के साथ उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग 31 पर धरना दिया तब ज़िला अधिकारियों की आंखें खुलीं और वे यहां आए.

हालांकि उनकी शिकायत है कि उन लोगों को राहत सामग्री अब भी नियमित नहीं मिलती, ऐसे में दवाइयां और बाक़ी के सामान तो दूर की बात हैं.

पुराना दर्द

91 वर्षीय मरियम बेवा के लिए बाढ़ एक पुरानी कहानी है. लेकिन इस बार तबाही का मंज़र कुछ अलग है. उनका घर-बार पानी में पूरी तरह डूब चुका है, खेत खलिहान ख़त्म हो गए हैं.

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वह कहती हैं, ''सरकार नदी पर बांध बनाने का काम कभी समय पर नहीं करती और हमें भुगतना पड़ता है.''

अब कहां जाओगी, ये पूछने पर वह कहती हैं, ''घर अब नहीं है, नदी बहाकर ले गई. सबके घर चले गए. अब सरकार कुछ करेगी तो ही हमारा कुछ होगा. तबाही बिना बुलाए आती है और इस बार भी आई है. मदद मांगने पर भी नहीं आई और शायद न आएगी.''

बंगाईगाव की अतिरिक्त जिला उपायुक्त ने राहत कार्य में देरी की वजह लाल-फीताशाही बताई.

वह कहती हैं, "दरअसल नए अधिकारी सरकारी नियमों का ज़्यादा ध्यान रखने की कोशिश करते हैं और इसके कारण हर काम को करने में काफी वक्त लग रहा है.''

बाढ़ की ताज़ा स्थिति

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बाढ़ की स्थिति पर राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग ने रविवार शाम बताया कि बेघर हुए लोगों की संख्या 1.5 लाख से भी ज़्यादा हो गई है.

लगभग 1077 गांव बाढ़ की चपेट में आने से क़रीब छह लाख लोग प्रभावित हुए हैं.

बाढ़ से मरने वालों की संख्या 13 हो गई है. कोकराझाड़, बंगाईगांव, धुबड़ी, मोरीगांव, नगांव और डिब्रूगढ़ ज़िले में बाढ़ के कारण हालात काफी ख़राब हैं.

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