भारत का स्वास्थ्य सर्वेक्षण छापने में देरी क्यों?

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इमेज कैप्शन, भारत के एक तिहाई बच्चों का वज़न औसत से कम है
    • Author, जस्टिन रौलेट
    • पदनाम, दक्षिण एशिया संवाददाता, बीबीसी

भारत में स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े मिलना बहुत मुश्किल है. आख़िरी बार स्वास्थ्य पर विस्तृत सर्वेक्षण 2007 में प्रकाशित हुआ था.

तो, भारत सरकार ने यूनिसेफ के साथ महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर जो व्यापक सर्वेक्षण करवाया था, उसे प्रकाशित क्यों नहीं किया गया?

भारत का 'रैपिड सर्वे ऑफ चिल्ड्रन' एक विशाल कार्यक्रम था. लगभग एक लाख बच्चों को नापा गया, वज़न तोला गया और देश के 29 राज्यों में तकरीबन दो लाख लोगों से बात की गई.

इसकी अंतिम रिपोर्ट को पिछले साल अक्तूबर में जारी किया जाना था. लेकिन छह महीने से भी ज्यादा बीत गए हैं. आज तक इस रिपोर्ट को गुप्त ही रखा गया है.

ज़रूरी हैं आंकड़ें

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प्रसिद्ध विकास अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ का कहना है कि रिपोर्ट के प्रकाशन में देरी किसी 'घोटाले' जैसी है.

उनका कहना है, "सभी पड़ोसी देश, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, पाकिस्तान और यहां तक कि अफगानिस्तान के पास भी पोषण संबंधी ताज़ा सर्वेक्षण हैं. प्रकाशन में दस साल की देरी की वजह किसी तरह की राजनीतिक अनिच्छा ही हो सकती है."

यूनिसेफ के मुताबिक सरकार सर्वेक्षण प्रणाली की समीक्षा कर रही है लेकिन एजेंसी को रिपोर्ट प्रकाशित होने का इंतज़ार है.

भारत में यूनिसेफ की पोषण संबंधी मामलों की प्रमुख सबा मेब्राहतु बताती हैं, "एक प्रमाण आधारित ठोस योजना बनाने के लिए आंकड़े बहुत ज़रूरी होते हैं. इससे हमें ये जानने में मदद मिलती है कि कुपोषण के क्या कारण हैं ताकि उन्हीं क्षेत्रों में योजनाओं को केंद्रित किया जाए."

कमज़ोर प्रदर्शन

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इमेज कैप्शन, गुजरात में बच्चों की हालत में कोई सुधार नहीं

बीबीसी ने भारत सरकार से पूछा है कि सर्वेक्षण की ये रिपोर्ट अभी तक प्रकाशित क्यों नहीं की गई. लेकिन इस पर हमें सरकार की तरफ से कोई जबाब नहीं मिला.

लेकिन बीबीसी को इस रिपोर्ट की एक प्रति मिली है. समग्र आंकड़ों को देख कर इस रिपोर्ट को छापने पर सरकार की अनिच्छा हैरान कर देती है क्योंकि नतीजे उत्साहवर्धक हैं.

इससे पता चलता है कि कुपोषण अब भी काफी ज़्यादा है, ज़्यादातर अफ्रीका देशों से भी ज़्यादा, लेकिन हालात में सुधार आ रहा है.

दस साल पहले पांच साल से कम उम्र वाले चालीस फीसदी बच्चों का वज़न औसत से कम था. अब ये आंकड़ा एक तिहाई है.

लेकिन इस राज्यों के बीच आंकड़ों में बहुत अंतर है. प्रधानमंत्री के राज्य गुजरात का इस संबंध में प्रदर्शन काफी खराब रहा है.

नरेंद्र मोदी एक दशक से ज्यादा अवधि तक इस राज्य के मुख्यमंत्री रहे और उनका चुनावी अभियान भी इस बात पर केंद्रित था कि वे देश को गुजरात की तरह ही विकास की राह पर ले जाएंगे.

महाराष्ट्र में सकारात्मक प्रयास

तीन साल की फातिमा इतनी कमज़ोर है कि उसे गोद में उठाना पड़ता है

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इमेज कैप्शन, तीन साल की फातिमा इतनी कमज़ोर है कि उसे गोद में उठाना पड़ता है

गुजरात का आर्थिक विकास प्रभावशाली है लेकिन बच्चों की सेहत के लिहाज़ से राज्य का प्रदर्शन काफी खराब रहा. सर्वे के नतीजों से कुछ लोग पूछ सकते हैं कि क्या वाकई गुजरात मॉडल स्टेट है.

रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात के 41.8 फीसदी बच्चे शारीरिक तौर पर पूरी तरह विकसित नहीं हैं और 43.8 फीसदी बच्चों का ज़रूरत के हिसाब से टीकाकरण नहीं हुआ है.

गुजरात के खराब प्रदर्शन की वजह से अटकलें लगाई जा रही हैं कि रिपोर्ट को प्रकाशित नहीं करने की ये भी एक वजह है ताकि प्रधानमंत्री को शर्मिंदगी से बचाया जा सके.

सेहत पर खर्च कम

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एक दशक पहले पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र में भी ये आंकड़े इतने ही खराब थे. लेकिन महाराष्ट्र ने इस ओर महत्वपूर्ण कदम उठाए.

महाराष्ट्र के स्वास्थ्य वुभाग की प्रमुख सुजाता सौनिक का कहना है कि पिछले सर्वेक्षणों के आंकड़ों को आधार पर उन्होंने राज्य के बच्चों की सेहत सुधारने के लिए कदम उठाए.

इसके सकारात्मक नतीजे भी आए. कम वज़न के बच्चों की संख्या में 24 फीसदी कटौती हुई है और बच्चों में अविकास की दर को भी 41 फीसदी कम कर दिया गया है.

भारत सरकार अपने सकल घरोलू उत्पाद का सिर्फ एक फीसदी स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च करती है.

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद केंद्रीय सरकार के खर्चों में और कटौती की गई है.

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