जब डॉक्टर ही 'ख़तरे' में डाले तो कौन बचाए

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- Author, सुहैल हलीम
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता
कुलवंत सिंह संधू कनाडा में रहते हैं. वतन आए, बस में सफ़र किया, एक गिलास पानी पिया और उनका पेट ख़राब हो गया.
उन्होंने एक बड़े अस्पताल का रुख किया और फिर...
कुलवंत बताते हैं, "ये ये टेस्ट कराईए. ये मेडिसीन लीजिए."
कुलवंत का सिर्फ़ पेट खराब था, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें पांच-छह दवाएं लिख डालीं और कुछ मेडिकल जांच कराने के लिए कहा.
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कुलवंत सिंह को लीवर, किडनी, पेशाब और स्टूल टेस्ट तक के लिए कहा गया है. कुलवंत बताते हैं कि उन्हें सिर्फ पेट खराब के लिए 4,572 रुपये मेडिकल जांच के नाम पर भरने पड़े.
कुलवंत को अब लगता है कि उन्हें बस में पानी नहीं पीना चाहिए था.
वे तो हंस सकते हैं कि जान फिर भी सस्ते में ही छूट गई. लेकिन दर्द भरी कहानियां बहुत हैं.
हिंदुस्तान के सबसे मशहूर अस्पतालों में से एक में मेडिकल पेशेवरों के एक तबके में 'लालच' की बीमारी पर बहस हो रही है.
यहां कमरा डॉक्टरों से भरा हुआ है. यहां एक महिला डॉक्टर एक मामले का ज़िक्र करती हैं, जिसमें एक मरीज़ को बिना किसी ज़रूरत के एमआरआई जांच के लिए कह दिया गया था.
मेडिकल प्रोफेशन

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कहीं कमीशन की पेशकश तो कहीं गैरजरूरी टेस्ट. इस तरह के मामले कोई अनोखी बात नहीं हैं. अनोखी बात ये है कि अब डॉक्टर खुद इसके खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं.
डॉक्टर अरुण गादरे और डॉक्टर अभय शुक्ला ने एक किताब लिखी है 'व्यॉसेज़ और कॉन्शंस फ्रॉम दी मेडिकल प्रोफेशन.'
इस किताब में खुद डॉक्टरों ने अपने कुछ साथियों को बेनकाब किया है.
डॉक्टर अभय शुक्ला कहते हैं, "हमने ये किताब इसलिए लिखी है क्योंकि हमें ये समझ में आया कि आज प्राइवेट अस्पतालों में मरीज़ों पर जो कुछ भी बीत रही है, उसको लेकर ज़्यादा कुछ नहीं किया गया है और इस बारे में डॉक्टरों के अनुभव के बारे में भी कोई दस्तावेज़ नहीं दिखाई पड़ता है."
दोबारा इस्तेमाल!

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इसी तरह की एक कोशिश आलम सिंह और सुनील नंदराज ने भी एक वेबसाइट की शक्ल में शुरू की है. दोनों का ताल्लुक हेल्थकेयर सेक्टर से है. इनकी वेबसाइट 'मेडीलीक्स' पर कोई मरीज़ अपना अनुभव शेयर कर सकता है.
आलम सिंह कहते हैं, "कई बार ये होता है कि अस्पतालों में किसी चीज़ का एक से ज़्यादा बार इस्तेमाल होता है और हर बार उसकी पूरी कीमत वसूली जाती है. हालांकि उस सामान का दोबारा इस्तेमाल नहीं होना चाहिए था. जैसे पेसमेकर निकाले जाने के बाद उसका दोबारा इस्तेमाल होता है और मरीज़ के परिवार को इसके बारे में पता नहीं होता है."
मेडीलिक्स पर एक साहब ने लिखा है उनकी मां को एंजियोप्लास्टी कराने की सलाह दी गई थी, बाद में उन्हें एक डॉक्टर ने कहा कि कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है. बस दवा ही काफी है. हालांकि ये और बात है कि वो डॉक्टर उनके भाई का दोस्त था.
बीमा के दावे

जानकार मानते हैं कि असल मसला कमीशन का है और अस्पतालों में कुछ डॉक्टरों पर कथित तौर पर ज़्यादा से ज़्यादा सर्जरी और टेस्ट करने के लिए भी दबाव डाला जाता है.
देश की एक बड़ी बीमा कंपनी के एक सीनियर मैनेजर ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया, "डॉक्टर को इसके लिए ज़्यादा पैसा मिलता है. मरीज़ को होने वाले फायदे के आधार पर डॉक्टर को तो कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता. जितना ज़्यादा बिलिंग होगी, डॉक्टर को उतना ज़्यादा पैसा मिलेगा."
उन्होंने बताया कि बीमा के दावे के कई ऐसे मामले सामने आए जिनमें इसकी कोई ज़रूरत ही नहीं थी. अस्पताल के मापदंड अलग हो सकते हैं, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक तो पूरे नहीं किए जाते.
सेहत का ख्याल

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लेकिन सवाल ये है कि मसले का हल क्या है? क्या वाकई में लालच पर लगाम लगाई जा सकती है?
डॉक्टर शुक्ला कहते हैं, "सामान्य लोग, मरीज़ो के संगठन, जनआंदोलनों से जुड़े लोग, नीतिगत तरीके से काम करने वाले डॉक्टरों को इसके ख़िलाफ़ एक साथ आना चाहिए."
शायद हल ये है कि सरकारी अस्पतालों को बेहतर बनाया जाए ताकि मरीज़ों के पास एक रास्ता और भी हो.
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