पांच हज़ार साल से भारत का अनसुलझा सवाल

भारतीय किसान

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    • Author, हरतोष सिंह बल
    • पदनाम, राजनीतिक संपादक, कारवां

भारतीय उप-महाद्वीप की एक ख़ासियत ऐसी है जो अक्सर तब हमारे सामने खुलती है जब हम दुनिया के दूसरे हिस्से में होते हैं.

वो ख़ासियत है इस उप-महाद्वीप में ऋतुओं की नियमितता और हर ऋतु के मौसमों का एक ख़ास बरताव.

एक लंबी गर्मी, मॉनसून, छोटा-सा पतझड़, सर्दी, नन्हा सा बसंत और उसके बाद फिर से लंबी गर्मी. इन ऋतुओं के दौरान मौसम कैसा होगा, इसका कमोबेश अनुमान लगाया जा सकता है.

यहाँ तक कि दैनिक तापमान का भी काफ़ी हद तक अंदाज़ लगाया जा सकता है. इस ढर्रे में एक ही उल्लेखनीय बदलाव आता है, वो है मॉनसून का सीज़न.

कम या ज़्यादा मॉनसून

आसाम, बाढ़

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बाढ़ से जो भी तबाही हो, लेकिन औसत से अधिक मॉनसून से लोग डरते नहीं हैं.

इससे होने वाला नुक़सान भारी हो सकता है लेकिन एक बार बाढ़ का पानी उतर जाए तो वो अपने पीछे जो तलछट और उपजाऊ मिट्टी छोड़ जाता है उससे अच्छी फ़सल की गारंटी मिल जाती है.

बुरे मॉनसून से ऐसी कोई राहत नहीं मिलती. इसका असर सीज़न बीतने के बाद भी दिखाई देता है.

एक ऐसा तबका जिसका पास शायद ही कोई जमापूँजी होती है और जो शायद किसी मामूली झटके को भी बर्दाश्त करने में सक्षम न हो उसके लिए ख़राब खेती और फ़सल न होने का झटका भारी साबित हो सकता है.

मॉनसून एक ऐसा सवाल है जिसके बारे में भारत में 5000 सालों से माथापच्ची की जा रही है लेकिन अभी तक बुरे मॉनसून का पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं हो सका है.

मौसम विज्ञान की स्थापना

भारत, गर्मी, सूखा

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भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) की स्थापना के पीछे ये एक बड़ा उद्देश्य था.

आईएमडी की वेबसाइट पर उसके संक्षिप्त परिचय में लिखा है, "1864 में कलकत्ता में बड़ा ट्रॉपिकल सायक्लोन आया. उसके बाद 1866 और 1871 के मॉनसून में बारिश नहीं हुई. साल 1875 में तत्कालीन भारत सरकार ने भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना की. सरकार ने मौसम से जुड़े सभी कार्यों को इस विभाग के तहत केंद्रीकृत कर दिया."

मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना के ठीक बाद ही 1877 में भारत में ख़राब मॉनसून की मार पड़ गई.

आईएमडी के पहले डायरेक्टर हेनरी फ्रांसिस ब्लैफ़ोर्ड उप-महाद्वीप की जलवायु संबंधी आंकड़ों की मदद से मॉनसून के पूर्वानुमान की संभावनाएँ तलाशनी शुरू कर दी.

1885 से आईएमडी ने नियमित तौर पर मौसम के पूर्वानुमान जारी करना शुरू किए. इसके लिए मॉनसून से पहले के महीनों में हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली बारिश के आंकड़ों का व्यापक प्रयोग किया जाता था.

पूर्वानुमान का मॉडल

बरसात, मौसम

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अगले दशक तक ये साफ़ हो गया कि मॉनसून के पूर्वानुमान का ये मॉडल सही नहीं है. 1899 के भयानक मॉनसून के पूर्वानुमान में आईएमडी की विफलता के कारण औपनिवेशिक सरकार को भविष्य में मौसम के पूर्वानुमान की जानकारी को गोपनीय रखने का फ़ैसला करना पड़ा.

1904 में गिल्बर्ट वॉकर आईएमडी के तीसरे डायरेक्टर बने. उन्हें मौसम विज्ञान संबंधी कोई प्रशिक्षण नहीं प्राप्त था.

उनका चुनाव अप्लाइड मैथमैटिक्स में उनकी ख्याति के कारण किया गया था. उन्हें व्यावहारिक समस्यों के हल के लिए व्यापक आंकड़ों के प्रयोग में महारत हासिल थी.

उन्हें जल्द ही एहसास हो गया कि मौसम के पूर्वानुमान का सिद्धांत विकसित करना असंभव भले न हो, लेकिन उसके लिए अभी लंबा रास्ता तय किया जाना बाक़ी है. ऐसा गणितीय समीकरण लिखना संभव नहीं लग रहा था जिसके आधार पर मौसम का पूर्वानुमान लगाया जा सके.

ऐसे समीकरण की तलाश की जगह गिल्बर्ट ने आईएमडी द्वारा इकट्ठा किए जा रहे ढेर सारे आकंडों और मॉनसून के बीच अंतर्संबधों की पड़ताल शुरू कर दी.

वॉकर सर्कुलेशन

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गिल्बर्ट अगले 20 सालों तक पूरी दुनिया में मौसम, तापमान और वायुदमंडलीय दबाब के आपसी सबंधों पर ख़ास काम करते रहे. 1924 में रिटायर होने के बाद उन्होंने उन्होंने अपनी रिसर्च से जुड़े महत्वपूर्ण पेपर प्रकाशित करना शुरू किए.

उनके शोध परिणामों में प्रमुख है वॉकर सर्कुलेशन. इस सिद्धांत से वायुमंडल के निचले स्तर में हवा के बहाव के उष्णकटिबंधीय प्रारूप का पता चलता है. यह प्रारूप विभिन्न महासागरों के हिसाब से बदल जाता है. इनमें सबसे ख़ास है प्रशांत महासागर के ऊपर हवा के बहाव का प्रारूप.

ये प्रारूप पूर्वी प्रशांत महासागर के ऊपर उच्च दबाव और इंडोनेशियाई क्षेत्र में निम्न दबाव से बनता है. लेकिन ये हर साल एक जैसा नहीं रहता.

पूर्वी प्रशांत महासागर के ऊपर उच्च दबाव के हिसाब से इसका प्रारूप बदलता रहता है. इस बदलाव को सदर्न ऑसिलेशन कहते हैं और इसका संबंध पूरी दुनिया के मौसम के सबसे उठापटक वाले बदलावों से है.

अल नीनो

प्रशांत महासागर में अल नीनो प्रभाव
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वॉकर ने इस बदलाव की पहचान की थी और पाया था कि पूर्वी प्रशांत पर सामान्य से कम दबाव का संबंध सामान्य से अधिक जल तापमान से है. इसका नतीजा सामान्य से कम मॉनसून के रूप में सामने आता है. इस अवधारणा को अल नीनो कहा जाता है. वहीं सामान्य से अधिक दबाव जिसे अल नीना कहा जाता है, रहने पर सामान्य मॉनसून आता है.

ये ज़रूरी नहीं कि हर अल नीनो वर्ष में मॉनसून ख़राब ही हो लेकिन जिन सालों में ख़राब मॉनसून रहा उनमें से ज़्यादातर अल नीनो वाले साल थे. जाहिर है इसके आधार पर मौसम का पूर्वानुमान लगाना काफ़ी दूर की कौड़ी है लेकिन वॉकर के इस शोध से हमें एक ऐसी अवधारणा को समझने में मदद मिली जो हमें बुरे मॉनसून की संभावनाओं के प्रति सचेत करता है.

पूरे भारत में साल दर साल किसानों के आत्महत्या के नैशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के नीचे दिए गए आंकड़ों पर गौर करें. नीचे दी गई तालिका में आत्महत्या करने वालों की संख्या और सालाना मॉनसून (जून से सितंबर) के उतार-चढ़ाव (जिन्हें मौसम विभाग ने दर्ज किया है) को दिखाया गया है.

किसानों की आत्महत्या से जुड़े एनसीआरबी के आंकड़ों पर सवाल उठते रहे हैं लेकिन उनसे एक बात तो साफ़ है.

जिन सालों में मॉनसून ख़राब रहा, 2002, 2004 और 2009 उन सालों में किसानों की आत्महत्या की संख्या में उछाल देखा जा सकता है, जबकि आम तौर पर साल दर साल आत्महत्या की संख्या में गिरावट दर्ज की जा रही है.

आत्महत्या और मॉनसून

आत्महत्या करने वाले एक किसान का परिवार

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जिन सालों में मॉनसून ख़राब रहा उन सालों में पिछले साल से क़रीब 1000 ज़्यादा किसानों ने आत्महत्या की. हर मौत वैसी ही परिस्थिति में जी रहे हज़ारों किसानों की व्यथा की कहानी कहती है.

शहरों में ख़राब मॉनसून का मतलब होता है खाने-पीने की चीज़ों के दाम थोड़ा बढ़ जाना. लेकिन बाक़ी देश के लिए ये ज़िंदगी और मौत का मसला है.

इस तालिका से एक और ख़ास बात पता चलती है कि जिन सालों (2002, 2004 और 2009) में मॉनसून ख़राब रहा वो अल नीनो वर्ष थे.

मौसम विज्ञानियों ने पहले ही 2015 को अल नीनो वर्ष घोषित कर दिया है. उनका अनुमान है कि इस साल सामान्य से 12 प्रतिशत कम बारिश हो सकती है.

वॉकर के शोध से भले ही हमें मौसम जानने का पक्का तरीका न मिला हो लेकिन उन्होंने हम इस काबिल तो बना ही दिया है कि हम बुरे वक़्त के लिए पहले से तैयार रहें.

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