मज़दूरी में पैसे के बदले लाल मिर्ची

इमेज स्रोत, PURUSHOTTAM SINGH THAKUR
- Author, पुरुषोत्तम ठाकुर
- पदनाम, सुकमा से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से सुकमा की ओर आने वाली बसों में कुछ यात्री ऐसे भी हैं जो लाल मिर्ची की एक दो बोरियाँ लेकर वापस लौट रहे हैं.
इसमें अचरज की नहीं बल्कि एक बात खास है. और वो ये है कि लोग लाल मिर्ची ख़रीदकर नहीं बल्कि मिर्ची तोड़ने की मज़दूरी के एवज़ में लेकर आ रहे हैं.

इमेज स्रोत, PURUSHOTTAM SINGH THAKUR
दरअसल हर साल धान की कटाई के बाद छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों से खेतिहर मज़दूर और छोटे किसान दूसरे राज्यों में मज़दूरी करने निकल जाते हैं.
वहीं छत्तीसगढ़ और ओडिशा के कई आदिवासी मज़दूर पड़ोसी राज्य आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में मजदूरी करने जाते हैं.

इमेज स्रोत, PURUSHOTTAM SINGH THAKUR
एक मजदूर एलमा देवा के अनुसार, “धान का काम खत्म होने के तुरंत बाद हमारे लोग (छत्तीसगढ़ के आदिवासी) यहाँ आते हैं, मिर्ची तोड़ने का काम करते हैं और महुआ गिरना शुरू होते ही, महुआ बीनने वापस गाँव चले जाते हैं.”
लेकिन सवाल तो यह है कि आखिर ये लोग मज़दूरी के तौर पर पैसे नहीं लेकर मिर्ची क्यों लेते हैं ?

इमेज स्रोत, PURUSHOTTAM SINGH THAKUR
छत्तीसगढ़ के टेकालगुड़ा से मिर्ची तोड़ने के लिए आई मजदूरों की एक टोली के एक सदस्य देवा कोसा का कहना है कि, “मिर्ची तो हमारी ज़रूरत की चीजों में से एक है, जो हमारे खाने में रोज़ चाहिए. इसलिए यहाँ से मिर्ची लेकर जाने से हमारी साल भर की ज़रूरत पूरी हो जाती है."
वो बताते हैं, "हम मिर्च की इस कमाई में से कुछ मिर्च अपने रिश्तेदारों में भी बांट देते हैं.”

इमेज स्रोत, PURUSHOTTAM SINGH THAKUR
ओडिशा के मालकानगिरि ज़िले से आए उमाशंकर पोडियामी कहते हैं, “मैं पिछ्ले 3 साल से यहाँ आ रहा हूँ और घर के लिए मिर्ची लेकर जाता हूँ. इस बार हमारे गाँव से मिर्ची तोड़ने के काम के लिए हम बीस लोग आए हैं. हम पिछले हफ्ते आए हैं और तीन हफ्ते करीब यहाँ और रहेंगे और मिर्ची लेकर जाएँगे."
पोडियामी बताते हैं, “मज़दूरी तो 120 रुपये है पर हम लोग इसके बदले मिर्ची लेना पसंद करते हैं. दरअसल हम जितना मिर्ची तोड़ते हैं उसका तेरहवाँ हिस्सा हमें मज़दूरी के तौर पर मिलता है.”

इमेज स्रोत, PURUSHOTTAM SINGH THAKUR
आदिवासी संस्कृति के शोधकर्ता और पत्रकार परेश रथ का कहना है कि “नमक, मिर्च, हल्दी और इमली, ये चार चीज़ें हैं या मसाले हैं जो हर एक आदिवासी परिवार के खाना बनाने में आमतौर पर शामिल होता है.”
मार्च महीने के शुरू में जब हम तेलंगाना गए थे तो वह मिर्ची तोड़ने का ही समय था. सड़क के दोनों ओर लाल मिर्च की ढेरियां हर पचास से सौ मीटर की दूरी पर लगी थीं.

इमेज स्रोत, PURUSHOTTAM SINGH THAKUR
शाम का समय था और काम खत्म कर मज़दूरों का अपने डेरों की ओर जाने का सिलसिला भी शुरू हो गया था, यह देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वहाँ मिर्ची की मंडी लगी हो.

इमेज स्रोत, PURUSHOTTAM SINGH THAKUR
हमने देखा कि मिर्ची तोड़ने के लिए छत्तीसगढ़ से भारी तादाद में आदिवासी जिनमें युवा, बच्चे और महिलाएं शामिल हैं, गए हुए थे और उनमें से ज़्यादातर उन मिर्ची की खेती करने वाले सेठों या किसानों के यहाँ ठहरे हुए थे.
श्रम के बदले अनाज ग्रामीण पारंपरिक संस्कृति का हिस्सा रहा है और आदिवासियों में यह आज भी प्रचलन में है.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>












