बिहारः मज़दूरों का 'पलायन,' सरकार बेख़बर!

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- Author, नीरज सहाय
- पदनाम, सहरसा, बिहार से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
उत्तर बिहार के सहरसा, मधेपुरा और सुपौल ज़िले से मज़दूरों की एक बड़ी आबादी दिल्ली-पंजाब समेत देश के कई राज्यों में हर साल 'पलायन' कर जाती है.
सहरसा के देवनवन मंदिर घाट पर खड़ीं 45 साल की विशाखा देवी बताती हैं कि उनके पति दिल्ली में रेहड़ी लगाते हैं.
चार बच्चों की माँ विशाखा एक मज़दूर हैं. एक कट्ठा ज़मीन में रोपनी करने पर उन्हें रोज़ाना ढ़ाई किलो अनाज या 50 रुपये मज़दूरी मिलती है.
वहीं आठ बच्चों की माँ अशराफुल खातून के पति अपाहिज हैं जिन्हें ये काम भी साल में कभी-कभी ही मिल पाता है.
पत्रकार नीरज सहाय की रिपोर्ट की दूसरी कड़ी
नहीं है कोई आंकड़ा

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राज्य के विभिन्न ज़िलों की किस पंचायत से कितने लोग देश भर में काम कर रहे हैं, इसकी कोई जानकारी सरकारी महकमों को नहीं है. जबकि विदेशों में काम कर रहे 84 हज़ार बिहारी मज़दूरों का पूरा आंकड़ा है.
राज्य के दो प्रमुख शोध संस्थानों जैसे एएन सिन्हा समाज अध्ययन संस्थान और एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट के पास भी बाहर जाकर रोजी-रोटी कमाने वाले मज़दूरों का कोई आंकड़ा नहीं है.
वहीं अधिकारी बताते हैं कि पंजाब जाने वाली जनसेवा एक्सप्रेस में ही करीब चार हज़ार यात्री हर दिन सफ़र करते हैं जबकि इस ट्रेन में लगभग 2200 यात्रियों के बैठने की ही क्षमता है.
इससे लगता है कि मजबूरी में रोजग़ार की खोज में हो रहे 'पलायन' को शासन के स्तर पर गंभीरता से नहीं लिया गया है. आंकड़ा जुटाने की कोशिश अब शुरू हुई है.
श्रम विभाग ने एक अगस्त, 2014 को पंचायती राज विभाग को हर एक पंचायत से जानकारी जुटाने के लिए चिट्ठी लिखी है.
खेती पर असर

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कोसी के इलाके से मज़दूरों का सामूहिक 'पलायन' मुख्यतः साल में तीन बार होता है, वह भी फसल की बुआई और कटाई के समय.
इससे स्थानीय किसानों की मुसीबत बढ़ जाती है. खेतों में बुआई तक रुक जाती है. पररी गाँव के किसान आशुतोष झा का मानना है कि पलायन की वजह से क्षेत्र की क़रीब 50 प्रतिशत ज़मीन बुआई और रोपाई से वंचित रह जाती है.
स्थानीय खेती महिलाओँ, बाल श्रमिकों और बूढ़े मज़दूरों के भरोसे रह जाती है. ऐसे कामगार भी कम मिलते हैं और इस वजह से किसानों में टकराव की नौबत आती है.
जब तक मज़दूर गांव लौटते हैं, तब-तक यहां खेती का समय निकल गया होता है.
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