सीपीएम कैसे आया यहाँ, येचुरी ले जाएंगे कहाँ

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- Author, पंकज सिंह
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
सीपीआईएम 1964 में सीपीआई के सातवें अधिवेशन में हुए बंटवारे के बाद वजूद में आई थी.
कलकत्ता में 21 अक्टूबर से 7 नवंबर 1964 के दौरान हुए उस सातवें अधिवेशन में पार्टी के वे सदस्य मुखर और सक्रिय हुए थे जिनकी राय थी कि बहुत से मुद्दों पर सीपीआई ग़लत ढंग से कांग्रेस का समर्थन कर रही थी.
लेकिन सीपीआई से निकलकर सीपीएम बनाने वाले नेताओं का यह भी मानना था कि भारतीय समाज और भारत के शासक वर्ग की बनावट और चरित्र के विषय में सीपीआई की समझ सही नहीं थी.
सैद्धांतिक लड़ाई

अंतरराष्ट्रीय पूंजी से भारतीय शासक वर्ग और भारतीय पूंजी के संबंधों को लेकर भी सीपीआईएम की राय सीपीआई से अलग थी.
नतीजतन, सीपीआईएम ने यह कोशिश की कि क्रांतिकारी संघर्ष की रणनीति और तौर तरीकों को लेकर उसकी दृष्टि और व्यवहार अलग दिखें.
वह अनिश्चय और बदलाव का दौर था. सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी ने निकिता सर्गेइविच ख्रुश्चेव की अगुवाई में साठ के दशक की शुरुआत में पूंजीवाद से समाजवाद की ओर 'शांतिपूर्ण संक्रमण‘ के विवादास्पद सिद्धांत को मान लिया था.
नव संशोधनवादी?

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माओ त्से-तुंग की अगुवाई में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी इस सिद्धांत को मार्क्सवाद के बुनियादी सिद्धांत और सबक के साथ की जानी वाली ग़लत छेडछाड़ मानती थी.
वह ‘शांतिपूर्ण संक्रमण‘ में विश्वास रखने वाली किसी भी पार्टी को 'संशोधनवादी' कहती थी जो मार्क्सवाद के हिमायती क्रांतिकारियों के लिए गाली की तरह थी.
सीपीआई सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के निर्देशों पर पूरी तरह अमल करती थी. सीपीआईएम ने इस मामले में हुई अंतरराष्ट्रीय बहस के दौरान बीच का रास्ता अपनाने की कोशिश की.
उसने कम से कम कथनी में सीपीआई से अलग, जुझारू और हमलावर तौर-तरीके अपनाए.
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने इस रवैये को 'नव संशोधनवादी' करार दिया था.
चीन से लड़ाई

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साल 1962 में भारत और चीन के बीच हुई लड़ाई में भारत को मुंह की खानी पड़ी थी. जवाहरलाल नेहरू ने भारत की जो छवि बनाई थी, वह मटियामेट होकर रह गयी.
वह पराजय, हताशा और बिखराव के एक नए दौर की शुरूआत थी, जिसे आम तौर पर नेहरू युग से मोहभंग का समय कहा जाता है.
सीपीआईएम भारत के राजनीतिक परिदृश्य में ऐसे समय दाख़िल हुई. इस नई कम्युनिस्ट पार्टी के साथ पिछले दशकों के संघर्षों से निकले तपे-तपाये नाम थे.
बीटी रणदिवे, ईएमएस नंबूदरीपाद, एके गोपालन और पी सुंदरैया आदि ऐसे नाम थे जिनके साथ जन संघर्षों की यादें जुड़ीं थीं.
क्रांतिकारी लक्ष्य?
नए उत्साह और आवेग से सीपीआईएम ने कुछ ही सालों में पुरानी अविभाजित पार्टी के उन तत्वों को समेट कर अपनी शक्ति लगातार बढ़ाई, जिनमें क्रांतिकारी लक्ष्य की तरफ़ बढ़ने की कसमसाहट थी.
लेकिन 1967 आते-आते सीपीआईएम के अंदर के वे लोग निराश होने लगे, जिन्हे इस पार्टी से किसानों और मज़दूरों को क्रांतिकारी ढंग से गोलबंद करते हुए क्रांति की ओर बढ़ने की उम्मीद थी.
पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी ज़िले में फूटे हथियारबंद संघर्ष के साथ ही सीपीआईएम के भीतर भी विभाजनकारी दरारें दिखने लगीं.

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हथियारबंद संघर्ष
पंजाब से लेकर बंगाल, बिहार, आंध्र और सुदूर केरल तक चारू मजुमदार की अगुआई वाली वह धारा फूट पड़ी जिसे आज भी नक्सलवादी ‘वसंत गर्जना‘ का नाम देते हैं.
इन स्थितियों और अंतरविरोधों के बीच से सीपीआईएम ने अपनी सांगठनिक ताक़त को मज़बूत करते हुए और चुनावों में दिलचस्पी न रखने वाले नक्सलवादियों को छोड़कर तमाम वाम संगठनों के साथ हाथ मिलाते हुए त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल कर ली.
केरल में तो अविभाजित सीपीआई ने ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में पहले ही सरकार बना ली थी.
34 साल की सत्ता

पश्चिम बंगाल में विस्मयकारी ढंग से चौंतीस साल तक सीपीआईएम ने अपने दम पर वाम मोर्चे की हुक़ूमत को बनाये रखा.
त्रिपुरा में मुख्यमंत्री माणिक सरकार के नेतृत्व में आज भी सीपीआईएम सत्ता में है.
लेकिन जिस तरह ममता बनर्जी की अगुवाई में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने सीपीआईएम नेतृत्व के वाममोर्चे की सरकार को सत्ता से बेदख़ल किया, वह सीपीआईएम के लिए एक बड़ा झटका था.
गढ़ में लगा झटका

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उससे पहले कांग्रेस को बाहर से यूपीए 2 के लिए समर्थन देकर सीपीआईएम ने बार-बार यह महसूस किया था कि वह कांग्रेस के दक्षिणपंथी विचलन और अमरीकी साम्राज्यवादी नीतियों के प्रति झुकाव को प्रभावी ढंग से रोक पाने में नाकाम हो रही है.
यूपीए-2 को समर्थन

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अमरीका के साथ होनेवाले परमाणु करार तक आते-आते यह साफ़ हो गया था कि सोनिया-मनमोहन की अगुआई में बनी यूपीए 2 की मनमानी के ख़िलाफ़ सीपीआईएम की किसी भी आलोचना या विरोध का कोई मतलब नहीं रह गया था.
इस तरह, बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हरकिशन सिंह सुरजीत ने धर्मनिरपेक्षता को आधार बनाकर जिस कार्यनीति और गठबंधन के सिद्धांत की नींव डाली थी उसके परखचे उड़ गए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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