एक आदमी जो कुश्ती बोलकर 'दिखाता' है

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- Author, रूपा झा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
महाराष्ट्र में एक आदमी ने कुश्ती को देखने से ज़्यादा सुनने की चीज़ बना दी है. ये हैं 65 वर्षीय शंकर राव पुजारी.
अपनी गरजती आवाज़ में जब वह कुश्ती की कमेंट्री करते हैं तो हज़ारों की भीड़ के लिए न सिर्फ़ कुश्ती और मज़ेदार हो जाती है, बल्कि लोग दम साधे देखते रहते हैं.
<link type="page"><caption> (देखेंः कुश्ती की 'रनिंग कमेंट्री')</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2015/04/150414_wrestling_commentator_video_vr.shtml" platform="highweb"/></link>
पढ़िए पूरी रिपोर्ट

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महाराष्ट्र के सांगली ज़िले का एक गांव. हज़ारों लोग कुश्ती के एक बड़े मुकाबले को देखने के लिए जमा हुए हैं.
लाल मिट्टी का बना दंगल, गाजे बाजे का पूरा इंतजाम, रंगीन झंडों से सजा मैदान...वहीं ऊंचे मचान पर ठेठ मराठी वेश भूषा में, हाथ में माइक लिए शंकर राव पुजारी खामोशी से टूर्नामेंट देख रही हज़ारों की भीड़ को मराठी भाषा में न केवल खेल के दांवपेच, बल्कि जीवन के दर्शन भी समझा रहे हैं.
हमारे जैसे कुछ हिंदी बोलने वालो की सहूलियत के लिए वो हिंदी में भी बोलते हैं, "कफ़न की जेब नहीं होती भाईयों और बहनों... इसीलिए पैसे जमा कर करोगे क्या... नाम कमाओ..."
'रनिंग कमेंट्री'

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इस मोहक अंदाज़ की कमेंट्री कौन नहीं सुनना चाहता होगा. उन्होंने 'रनिंग कमेंट्री' जुमले को नए मायने दे दिए हैं.
मुझे बताया गया कि कई बार महाराष्ट्र के कुश्ती संचालक आयोजन की तारीख़ पुजारी की सुविधानुसार बदल देते हैं. आख़िर ये पेशा क्यों चुना शंकर राव ने.
वे कहते हैं, "मैं जब छोटा था, कानों में ट्रांजिस्टर लगाए क्रिकेट कमेंट्री सुनता था. मेरे अनपढ़ पिता और दादा भी, जिन्हें क्रिकेट के बारे में कुछ पता नहीं था, वो भी कमेंट्री के ज़रिए क्रिकेट को समझने लगे थे."
कुश्ती के अखाड़े

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शंकर राव ने आगे बताया, "तो मैंने सोचा कि कुश्ती तो भारत का इतना पुराना खेल है. वैदिक काल से चला आ रहा है. अगर क्रिकेट कमेंट्री के बूते ही इतना बड़ा खेल बन गया तो कुश्ती क्यों नहीं. मैंने तय किया जिंदगी भर इस खेल का प्रचार प्रसार अपनी कमेंट्री के जरिए करूंगा और बस अपनी गाड़ी चल निकली."
शंकर राव कहते हैं, "मैं इस खेल के ज़ुबानी इतिहासकार की तरह हूँ."
कुश्ती ग्रामीण भारत का पसंदीदा खेल है, ख़ासकर महाराष्ट्र में. यहां हर नुक्कड़ पर आपको कुश्ती के अखाड़े या स्थानीय भाषा में तालीम, मिल जाएंगे. पहलवान हीरो होते हैं और हर बच्चा उनके जैसा बनना चाहता है.
लोकप्रियता

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शंकर पुजारी इस पेशे से अच्छा कमा लेते हैं.
वे बताते हैं, "इस खेल पर बहुत ज़्यादा लिखा हुआ मिलता नहीं है, लेकिन जो भी मिलता है मैं उसे याद कर लेता हूं. मैं खुद भी एक पहलवान हूं, लेकिन मैं कुश्ती जारी नहीं रख सका क्योंकि मैं बहुत ग़रीब परिवार से था और मेरे मां-बाप इसका खर्च वहन नहीं कर सकते थे."
वे कहते हैं, "मैंने कमेंट्री 1980 में शुरू की थी, लेकिन मुझे लोकप्रियता सन् 2000 से मिली. मुझे याद है कि एक बार 2007 में मुझे लगातार 13 घंटे तक बोलना पड़ा था, क्योंकि अलग अलग देशों से आने वाले पहलवान अखाड़े में किसी वजह से पहुंचे ही नहीं थे."
बड़ा पुरस्कार

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शंकर बताते हैं, "मेरा सबसे बड़ा पुरस्कार तो यही होता है, जब लोग कहते हैं कि वो मैच देखने से ज़्यादा मुझे सुनने आते हैं. मुझे अपनी आवाज़ का ख़्याल रखना पड़ता है. मैं सिर्फ़ बोतलबंद पानी ही पीता हूं और तेल वाले खाने से परहेज़ करता हूं."
शंकर राव पुजारी कुश्ती के ताज़ा हाल से बहुत खुश नहीं हैं. उन्हें लगता है कि पहले इसे राजाओं का संरक्षण था लेकिन अभी सरकार इस पर उतना ध्यान नहीं देती है.
शंकर राव के एक बेटे हैं, पर वे इस पेशे में नहीं है. उनके प्रशंसकों की बड़ी संख्या को देखते हुए यह यक़ीन किया जा सकता है कि कुश्ती और उनकी कुश्ती कमेंट्री की परंपरा जल्द ख़त्म नहीं होगी.
गर्वीली आवाज़

पुजारी कहते हैं, "मुझे अपने काम से प्यार है. बहुत सारे लोग कहते हैं कि मैं अपनी तरह का अकेला ही हूं. मैं ख़ास हूं और इस बात से मैं जवान महसूस करता हूं."
ऐसा बोल कर शंकर राव जोर से हंसते हैं और मैं उनकी हंसी और उसके बीच झक झक करते सफेद दांत, गंभीर गर्वीली आवाज़ को सुनते हुए सोचती हूं कि बिना स्क्रिप्ट के लगातार बिना अटके घंटों बोलना और ऐसा बोलना - ये शख्स तो हम सब रेडियो पत्रकारों की छुट्टी कर देगा.
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