सैन्य हथियार का आयात कम करने से मुश्किल?

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- Author, एश्ले नग्हेम
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, पुणे
दुनिया के दूसरे देशों से हथियार ख़रीदने के लिहाज़ से भारत दुनिया का सबसे बड़ा देश है.
हालांकि भारत सरकार ने ये कहा है कि हथियारों का 70 फ़ीसदी हिस्सा विदेशों से ख़रीदना काफ़ी महंगा पड़ता है, इसलिए घरेलू रक्षा उद्योग को विकसित करने का वक़्त आ गया है.
इसके साथ ही सरकार भारतीय सेना को अत्याधुनिक बनाने पर भी ध्यान दे रही है. इस दिशा में केंद्र सरकार ने अगले आठ सालों में क़रीब 130 अरब डॉलर ख़र्च करने का बजट रखा है.
माना जा रहा है कि इस प्रस्ताव के चलते भारतीय सेना के लिए हथियार ख़रीदने के मामले में भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी.
ऐसे में सैन्य हथियार बनाने वाली कंपनियों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं. नए नियमों के मुताबिक़ विदेशी कंपनियों को भारत की समारिक कंपनियों में 49 फ़ीसदी हिस्सेदारी रखने की भी छूट मिल गई है.
विदेशी साझेदारों की तलाश

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ऐसे में सैन्य हथियारों के निर्माण से जुड़ी भारतीय कंपनियां विदेशी निवेशक कंपनियों की तलाश में भी जुट गई हैं.
नौसेना से जुड़े उपकरणों को बनाने वाली निर्माता कंपनी वालचैंडनागर इंडस्ट्रीज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जीके पिल्लई कहते हैं, "दुनिया के दूसरे निर्माता भारत आने को निश्चित तौर पर उत्साहित होंगे क्योंकि दुनिया के दूसरे हिस्सों में सैन्य हथियारों का कारोबार काफ़ी कम है."
यह ठीक है कि भारत में हथियार निर्माण का काम बढ़ेगा, लेकिन यह तय है कि इसमें वक़्त लगेगा.
सैन्य विश्लेषकों की राय में भारतीय सेना को तत्काल सैन्य हथियारों की ज़रूरत है.
क्या होगी मुश्किल?

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भारतीय सेना के सेवानिवृत ब्रिगेडियर राहुल भोंसले कहते हैं, "अगर भारतीय सेना को हथियार की आपूर्ति में देरी हुई, चाहे वो स्वचालित बंदूक़ें हों, या पनडुब्बियां हो या लाइट वेट हेलिकॉप्टर हों या फिर लड़ाकू विमान हों, इन सबक मांग बढ़ती जाएगी."
ये मसला महज़ ज़्यादा मांग और कम आपूर्ति भर का नहीं रहेगा, बल्कि सैन्य हथियारों के कमी का असर भारतीय सेना पर भी पड़ेगा.
ऐसा नहीं हो, इसके लिए सरकार को अरबों डॉलर का निवेश अधारभूत ढांचे के निर्माण के लिए करना होगा.
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