जब भड़का था 'हिंदी विरोधी आंदोलन'

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
पचास साल पहले इन्हीं दिनों तमिलनाडु को एक हिंसक विरोध प्रदर्शन ने हिलाकर रख दिया था.
इस घटना ने भारत की सोच बदली और दुनिया ने उसे देखने की अपनी नज़र भी बदली.
यह विरोध प्रदर्शन हिंदी को थोपे जाने के ख़िलाफ़ था और इसके बाद भारत ने अपनी भाषा नीति बदलकर अंग्रेज़ी को सहायक भाषा का दर्जा दिया.
जानकारों का कहना है कि इस घटना ने भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास पर असर डाला.
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एरा सेज़ियान तमिल भाषा के जाने-माने लेखक हैं और विरोध प्रदर्शन के दिनों में सांसद थे.
सेज़ियान ने बीबीसी से कहा, "आज भी जब कभी संस्कृत या हिंदी को लाने की हल्की सी कोशिश की जाती है तमिलनाडु में विरोध भड़क जाता है. लेकिन हिंदी को थोपे जाने पर अब पहले जैसा डर का माहौल नहीं है."
तमिल इतिहासकार एआर वेंकटचलापति का कहना है कि आज भी वहां उपेक्षित होने का एहसास बना हुआ है.
वे कहते हैं, "सभी भाषाओं को बराबरी का दर्जा देकर ही सांस्कृतिक एकता को मजबूत किया जा सकता है. तमिलनाडु के दूरदराज के इलाके में अगर किसी को बैंक के एटीएम पर कुछ काम होता है तो उसे अंग्रेज़ी या फिर हिंदी का सहारा लेना होता, लेकिन उसके पास तमिल का विकल्प नहीं होता."
हिंदी विरोध

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तमिलनाडु में हिंदी को लेकर विरोध 1937 से ही है, जब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सरकार ने मद्रास प्रांत में हिंदी को लाने का समर्थन किया था पर द्रविड़ कषगम (डीके) ने इसका विरोध किया था.
तब विरोध ने हिंसक झड़पों का स्वरूप ले लिया था और इसमें दो लोगों की मौत भी हुई थी. लेकिन साल 1965 में दूसरी बार जब हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने की कोशिश की गई तो एक बार फिर से ग़ैर हिंदी भाषी राज्यों में पारा चढ़ गया था.
डीएमके नेता डोराई मुरुगन उन पहले लोगों में से थे, जिन्हें तब के मद्रास शहर के पचाइअप्पन कॉलेज से गिरफ़्तार किया गया था.
मुरुगन बताते हैं, "हमारे नेता सीएन अन्नादुराई 26 जनवरी को सभी घरों की छत पर काला झंडा देखना चाहते थे. चूंकि इसी दिन गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम भी थे, इसलिए उन्होंने तारीख बदलकर 25 जनवरी कर दी थी."
राज्यों का विरोध

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मुरुगन ने बताया, "राज्य भर में हज़ारों लोग गिरफ़्तार किए गए थे लेकिन मदुरई में विरोध प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया. स्थानीय कांग्रेस दफ्तर के बाहर एक हिंसक झड़प में आठ लोगों को ज़िंदा जला दिया गया. 25 जनवरी की उस तारीख को 'बलिदान दिवस' का नाम दिया गया."
ये विरोध प्रदर्शन और हिंसक झड़पें तकरीबन दो हफ्ते तक चलीं और आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 70 लोगों की जानें गईं.
सेज़ियान कहते हैं, "यहां तक कि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी रॉय भी हिंदी थोपे जाने के ख़िलाफ़ थे. दक्षिण के सभी राज्य भी इसके विरोध में थे. विरोध करने वालों में दक्षिण के कांग्रेस शासित राज्य भी थे."
विरोध प्रदर्शनों के नतीजतन उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री को आश्वासन देना पड़ा.
तरक्की की सीढ़ी

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उन आश्वासनों को तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी ने राजभाषा अधिनियम में संशोधन के जरिए अंग्रेज़ी को सहायक राज भाषा का दर्जा देकर अमल में लाया.
वेंकटचलापति कहते हैं, "तमिलनाडु ने अंग्रेज़ी पर बहुत निवेश किया है. उन्होंने इसका सामाजिक विकास और आर्थिक समृद्धि की सीढ़ी की तरक्की के तौर पर इस्तेमाल किया है और तमिल ने इसे ख़ास पहचान दी है."
उनका कहना है, "सॉफ़्टवेयर क्षेत्र में भारत के नेतृत्व वाली हैसियत मुख्यतः दक्षिण में है. और यह अंग्रेज़ी के बिना कभी नहीं हो पाता. दूसरी तरफ देखें तो हिंदी बोलने वाले लोग दक्षिण के राज्यों में मजदूरों की तरह काम करने आते हैं. इसलिए ये तर्क पूरी तरह ग़लत निकला कि हिंदी सीखने से काम मिलेगा."
हिंदी का मुद्दा

वेंकटचलापति कहते हैं, "हिंदी को पूरी तरह से केंद्र की ओर से थोपी गई भाषा के तौर पर देखा जाता है. इसमें पैसा फूंककर और इसके प्रसार को संरक्षण देकर केंद्र सरकार ने हिंदी को कमज़ोर ही किया है. लोगों में इस बात को लेकर बहुत अंसतोष है कि भारत अन्य कई भाषाओं की कीमत पर भाषा विशेष को गैरज़रूरी तवज्जो देता है."

मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंटल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक वीके नटराज कहते हैं, "विरोध प्रदर्शनों के बिना हिंदी को संरक्षण देने वाले लोग मज़बूत हो जाते. तमिल अपनी भाषाई पहचान को अन्य लोगों की तुलना में अधिक गंभीरता से लेते हैं."
एरा सेज़ियान कहते हैं, "यहां तक कि अब उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य भी अंग्रेज़ी सीखने को प्रोत्साहन दे रहे हैं. अब हालात पूरी तरह से बदल गए हैं. राज्य पहले से अधिक मजबूत हुए हैं और केंद्र अब पहले की तरह ताकतवर नहीं रहा."
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