आख़िर त्रिभाषा फार्मूला है क्या?

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केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन और संस्कृत भाषाएं पढ़ाने को लेकर चल रहे विवाद में तीन भाषाओं के फॉर्मूले पर भी बात हो रही है. हमने बात की जाने माने शिक्षाविद अनिल सदगोपाल से और इस मामले से जुड़े सवाल रखे.
आखिर क्या है ये फॉर्मूला?
इसके तहत स्कूलों में छात्रों को तीन भाषाओं की शिक्षा दी जानी थी. हिंदी भाषी राज्यों में छात्रों को जो तीन भाषाएं पढ़ाई जानी थीं वो थीं - हिंदी, अंग्रेज़ी और एक आधुनिक भारतीय भाषा.
आधुनिक भारतीय भाषाओं में बांगला, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, असमिय़ा, मराठी और पंजाबी और कुछ अन्य ज़बानों को शामिल किया गया.
ग़ैर हिंदी भाषी राज्यों में मातृभाषा के अलावा, हिंदी और अंग्रेज़ी पढ़ाई जानी थी.

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इस नीति को क्यों लागू किया गया?
आज़ादी के बाद प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं या सिविल सेवा के इम्तिहानों में हिंदी को अहमियत देने का गैर-हिंदी भाषा वाले राज्यों में विरोध हो रहा था.
इसके मद्देनज़र तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने मुख्यमंत्रियों की एक बैठक बुलाई जिसमें इस फार्मूले पर सबकी रज़ामंदी ली गई.
इसे तैयार करने की शुरूआत 1960 के दशक में हुई और ये राष्ट्रीय शिक्षा नीति का हिस्सा है. इसका ज़िक्र कोठारी कमीशन की रिपोर्ट में भी है जो 1966 में बनकर तैयार हुई थी.
केंद्रीय विद्यालयों में जमर्न कैसे पढ़ाई जा रही थी?
दुनिया भर में बाज़ार विभिन्न क्षेत्रों को प्रभावित कर रहा है. भारतीय शिक्षा नीति भी इससे अछूती नहीं है.

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केंद्रीय विद्यालयों में आधुनिक भारतीय भाषाओं की जगह जर्मन का पढ़ाया जाना यहीं संकेत देता है.
इसका पढ़ाया जाना एक तरह से भारतीय संसद के लिए गए फ़ैसले का उल्लंघन है.
जिन लोगों ने ये फ़ैसला लिया था उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी ही चाहिए.
इसे संस्कृत से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है?
देखिये मैं कहना चाहता हूं कि तीन भाषा वाले फार्मूले को तमिलनाडु छोड़कर दूसरे सूबों में तो बेहतर तरीक़े से लागू किया गया.
लेकिन हिंदी भाषी क्षेत्रों में इसे लागू करने में बेईमानी हुई.
छात्रों को आधुनिक भारतीय भाषा की जगह संस्कृत पढ़ाई गई. संस्कृत किसी भी तरह आधुनिक भारतीय भाषा नहीं है.
विरोध संस्कृत का नहीं है लेकिन नीति ये नहीं है. नीति थी आधुनिक भाषा पढ़ाने की...
तो सरकार को क्या करना चाहिए?
सबसे पहले इस सरकार को हिंदी भाषी क्षेत्रों में तीन भाषा फार्मूले के तहत आधुनिक भारतीय भाषा की पढ़ाई लागू करनी चाहिए.
(बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली से बातचीत पर आधारित)
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