बिना पैसे, जिए कैसे चाय बाग़ान श्रमिक

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- Author, संजॉय मजूमदार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, जलपाईगुड़ी से
भारत में दार्जिलिंग चाय की कई मशहूर क़िस्में होती हैं.
लेकिन हिमालय के दक्षिण में जहां घरेलू बाज़ार के लिए चाय उगाई जाती है, वहां अक़्सर चाय बाग़ान श्रमिक बेहद विकट स्थितियों में रहते हैं.
चाय बाग़ान के मज़दूरों की विकट स्थितियां ही हैं जिसकी वजह से कभी-कभी प्रबंधन और मज़दूरों के बीच हिंसा भी होती है.
कहीं-कहीं तो इन मज़दूरों को महीनों-महीनों वेतन नहीं मिलता और न ही राशन दिया जाता है.
पढ़ें संजॉय मजूमदार की पूरी रिपोर्ट
हिमालय की तहलटी पर उत्तरी बंगाल के जलपाईगुड़ी ज़िले में बसे विशाल सोनाली चाय बाग़ान में डरावना सन्नाटा है.
इसके मालिक का बंगला खाली है और कहीं भी कोई मज़दूर नज़र नहीं आ रहा.
पिछले हफ़्ते ही चाय बाग़ान के मालिक राजेश झुनझुनवाला को उनकी दो मंज़िला पुती हुई इमारत से निकालकर ग़ुस्साए कर्मचारियों ने चाय की झाड़ियों के बीच पीट-पीटकर मार डाला था.
सदमे की लहर

इस हत्या से चाय बागान मालिकों में सदमे की लहर दौड़ गई है.
तराई प्लांटर्स एसोसिएशन के सचिव यूबी दास कहते हैं, "यह हमला बिल्कुल अप्रत्याशित था. हम सभी हताश हैं और हर कोई अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है."
फाटक के बाहर बने मजदूरों के घर भी सूने पड़े हैं. कुछ महिलाएं बाहर एकत्र हो गई हैं. माहौल में तनाव है.
एक महिला कहती है, "रात को पुलिस आई और कई आदमियों को पकड़कर ले गई. हम लोग जंगल में भाग गए और बच्चों के साथ रात वहीं बिताई."
अन्य ने शिकायत की कि उन्हें कई महीनों से वेतन नहीं मिला है, "हमें कुछ नहीं मिलता है, न राशन और न ही स्वास्थ्य सहायता. हम ज़िंदा कैसे रहेंगे?"
सस्ती चाय
इस संघर्ष की जड़ आर्थिक है.

पहाड़ों में उगाई जाने वाली दुनियाभर में मशहूर दार्जिलिंग चाय के विपरीत यहां घरेलू बाज़ार के लिए सस्ती चाय उगाई जाती है.
दास कहते हैं, "चाय उगाने वाले दूसरे देश भी उभर आए हैं, इसलिए हमारा निर्यात घट रहा है. फ़ायदा बहुत कम है क्योंकि उत्पादन लागत बढ़ गई है. कुछ बाग़ान बंद हो गए हैं और कई मालिक क़र्ज़ नहीं चुका पा रहे हैं."
बांदापानी चाय बाग़ान के भारी लोहे के दरवाज़े जुड़े हुए हैं. यह बागान 2012 में बंद हो गया था. यह इलाक़े के उन पांच बाग़ानों में से है जिन्होंने काम करना बंद कर दिया है.
कारखाने की इमारत खाली है और कंपनी में कुछ आवारा पशुओं के साथ मशीनों को ज़ंग खाते देखा जा सकता है.
कभी इस बाग़ान में हज़ार से ज़्यादा लोग काम करते थे. अब वे सभी बेरोज़गार हैं.
चाय बाग़ान कर्मियों की कॉलोनी के छोटे मकान थोड़े ही दूर पर हैं. अंग्रेज़ों ने चाय बाग़ान के साथ नई पक्की लाइन क़रीब 150 साल पहले बनाई थी.
निराशा

अब वहां की हवा में निराशा है. कुछ घरों की टीन की छत टूट गई है और बाक़ियों में खिड़कियां या दरवाज़े नहीं हैं. वहां बमुश्किल ही कोई आदमी दिखता है.
राधिका थापा कहती हैं, "सब काम की तलाश में गए हैं. सिर्फ़ जो बीमार हैं वही यहां रह गए हैं."
सुमारी ओरांव अपने घर के बाहर बैठकर अनाज फटकार रही हैं. आज खाने में यही बनेगा.
साठ के दशक की सुमारी कहीं ज़्यादा बूढ़ी लगती हैं. उनके बाल पूरी तरह सफ़ेद हो गए हैं और चेहरा झुर्रियों से भरा हुआ है.
वह कहती हैं, "जबसे चाय बाग़ान बंद हुआ तबसे बहुत मुश्किल से समय बीत रहा है. हमारे पास पर्याप्त खाना नहीं है. क्या हम कभी भरपेट खा पाएंगे?"
कुपोषण

पिछले कई सालों में कई चाय श्रमिकों की मौत हो गई है. यह बहस जारी है कि वे कुपोषण से मरे हैं या किसी और कारण से.
एक स्थानीय समाजसेवी विक्टर दास कहते हैं कि श्रमिकों के मरने की कई वजहें हैं.
"अगर उन्हें वेतन नहीं मिलेगा तो उनके पास खाना ख़रीदने के लिए पैसा नहीं होगा, जिसकी वजह से वे कुपोषित हैं. इस कारण वे बीमार पड़ जाते हैं और अक़्सर मर जाते हैं."
19वीं सदी में अंग्रज़ों के बसाये इन बाग़ानों ने चाय उत्पादकों की पूरी पीढ़ी को पाला-पोसा है.
लेकिन अब सब बदल गया है. उनमें से कई बेहद ग़रीबी में जी रहे हैं.
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