‘कमंडल प्रयोग’ फ़ेल, मंडल-मंडली का पुनर्जन्म?

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- Author, प्रमोद जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
विधानसभा की जिन 33 सीटों पर उप चुनाव हुए थे, उनका लोकसभा चुनाव परिणामों के आधार पर फैसला होता तो इनमें से 25 सीटें भाजपा को मिलनी चाहिए थीं.
परिणामों से ज़ाहिर है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जो ‘लहर’ बनी थी, वह लुप्त हो चुकी है. और दूसरे उत्तर प्रदेश को ‘प्रयोगशाला’ बनाने की भगवा कोशिश फेल हुई है.
फिर भी इसे मोदी सरकार के प्रति जनता की प्रतिक्रिया मानना जल्दबाज़ी होगी. लोकसभा चुनाव के मुद्दे-मसले और मुहावरे इन चुनावों में नहीं थे.
फीका मतदान भी इसका प्रमाण है. दूसरी ओर भाजपा को पश्चिम बंगाल और असम में सफलता मिलना नई परिघटना है. उसके क्षेत्र का विस्तार हो रहा है.
पढ़िए उप चुनाव के नतीजों पर प्रमोद जोशी का विश्लेषण विस्तार से
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सफलता चुनावी गणित का परिणाम है. पार्टी इस चुनाव में भाजपा-विरोधी वोटों को बिखरने से रोकने में कामयाब हुई. यह नहीं कि उत्तर प्रदेश का वोटर अखिलेश सरकार के प्रदर्शन और प्रदेश में बिजली की किल्लत और कानून-व्यवस्था की स्थिति से संतुष्ट है.

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माना जा सकता है कि मोदी के पक्ष में वोट डालने वाले इस बार बाहर नहीं निकले. उन्हें इन चुनाव में जीत हासिल करने की कोई बड़ी चुनौती दिखाई नहीं दी. उत्तर प्रदेश का सामाजिक गणित पिछले महीने के बिहार-प्रयोग की तरह सफल साबित हुआ.
गैर-भाजपा मोर्चे की उम्मीदें
इसका मतलब है कि यदि सांप्रदायिकता विरोध के आधार पर राजनीतिक एकता कायम हो तो उसे सफलता मिल सकती है. गुजरात और राजस्थान से कांग्रेस के लिए संदेश है कि हमने आपका साथ पूरी तरह छोड़ा नहीं है. वसुंधरा राजे की सरकार के लिए तीन सीटें हारना अशुभ संकेत है.
उत्तर प्रदेश की जिन 11 सीटों पर चुनाव हुए वे भाजपा की सीटें थीं. इनमें हार का असर पार्टी के प्रदेश संगठन और स्थानीय नेतृत्व पर पड़ेगा.
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी की ‘जान में जान’ आई है. लोकसभा चुनाव में भारी हार से पार्टी ने सबक लिया और मुलायम सिंह यादव ख़ुद आम चुनाव की तरह सक्रिय रहे. एक-एक सीट की रणनीति उन्होंने खुद बनाई. आमतौर पर मुख्यमंत्री उपचुनाव के लिए प्रचार नहीं करते लेकिन अखिलेश यादव ने पूरा समय इन चुनाव को दिया.

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बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में भाजपा-विरोधी कोई मोर्चा तो नहीं बना, पर बहुजन समाज पार्टी ने मैदान से हटकर समाजवादी पार्टी को इसका फायदा उठाने का मौका दिया. संभावना यह भी थी कि दलित वोटों को भाजपा अपने पक्ष में खींच लेगी.
लोकसभा चुनाव में काफी दलितों ने भाजपा को वोट दिया था, जिसके कारण बसपा कोई सीट नहीं जीत पाई थी. लगता है कि इस बार भाजपा दलित वोट हासिल नहीं कर पाई.
फुस्स हुआ ‘लव जेहाद’ का पटाखा
भारतीय जनता पार्टी को दिल्ली की गद्दी पर बैठाने में सबसे बड़ी भूमिका उत्तर प्रदेश की थी. भाजपा ने उत्तर प्रदेश को प्रयोगशाला बनाया था. पर लोकसभा चुनाव में विकास की बात करने वाली पार्टी ने उपचुनाव में हिन्दुत्व की राह पकड़ी. यह प्रयोग विफल हुआ है.
भड़काऊ भाषण देने वाले योगी आदित्यनाथ को चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी सौंपी गई. पार्टी ने 'लव जेहाद' जैसे निराधार मसले को उठाया. उपचुनाव के ठीक पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में झड़पों को सांप्रदायिक रंग दिया गया.

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उपचुनाव से यह बात भी साबित हुई कि लोकसभा चुनाव के पहले से चली आ रही भाजपा नेतृत्व की विसंगतियाँ अपनी जगह कायम हैं. कुछ ऐसी सीटें भी थीं जहाँ पार्टी कार्यकर्ताओं ने अपने प्रत्याशी का विरोध किया.
लोकसभा चुनाव में अमित शाह यूपी के प्रभारी थे. उनके नेतृत्व में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया था. नरेंद्र मोदी ने उन्हें लोकसभा चुनाव का ‘मैन ऑफ द मैच’ भी बताया था.
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उपचुनाव में पराजय का दायित्व भी उनका बनता है, पर पार्टी के भीतर से उनके खिलाफ दबाव बनने की स्थिति अभी नहीं है. केंद्र में पार्टी की स्थिति मजबूत है. उनकी असली परीक्षा हरियाणा और महाराष्ट्र में होगी.
इन परिणामों से यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड चुनाव पर भी इनका असर होगा. यह कहना भी जल्दबाज़ी होगी कि इन परिणामों से केंद्र की मोदी सरकार की अलोकप्रियता झलकती है.
कांग्रेस के लिए संजीवनी

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लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस देशभर में अपनी ताकत जुटाने में जुटी है. उत्तराखंड में हुए उपचुनाव में सभी तीन सीटें जीतना कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित हुआ था.
आज के चुनाव परिणामों से राजस्थान में चार में से तीन सीटें मिलना सफलता माना जाएगा. इससे सचिन पायलट के नेतृत्व को वैधता मिलेगी. पहले विधानसभा और फिर लोकसभा चुनाव में सूपड़ा साफ होने के बाद यह सफलता उनकी उपलब्धि है.
गुजरात में लंबे अरसे बाद नरेंद्र मोदी की अनुपस्थिति में चुनाव हुए थे. कांग्रेस को जो सफलता मिली है उससे यह नहीं कहा जा सकता कि भाजपा का प्रभाव यहाँ कम हुआ है या कांग्रेस की वहाँ वापसी हुई है. अलबत्ता कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने के लिए यह काफी है.
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