बेमौत मारे जा रहे हैं गीर के शेर

- Author, अंकुर जैन
- पदनाम, दीव से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच साल में गुजरात में करीब 250 शेर मारे गए हैं. इनमें से कई की मौत कुओं में गिरने से, ट्रक से कुचल जाने से, करंट लगने से या ट्रेन से कटने से हुई है.
पिछले एक साल में 13 शेर अलग-अलग हादसों में मारे गए हैं.
यह मामला गंभीर चिंता का विषय इसलिए है कि एशियाई शेरों की ये प्रजाति सिर्फ़ गुजरात में है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इन शेरों की 2010 में संख्या करीब 411 थी.
हालांकि गुजरात वन विभाग इसे चिंताजनक नहीं मानता. विभाग ने पिछले कुछ वर्षों में शेर संरक्षण के लिए कई कदम उठाए हैं.
सासन गीर वन के उप संरक्षक संदीप कुमार कहते हैं, "अंतरराष्ट्रीय यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर ने साल 2000 में एशियाई शेरों को लुप्तप्राय प्राणियों की सूची में डाल दिया था. लेकिन शेर को उस सूची से निकाल दिया गया है, क्योंकि इस प्रजाति को बचाने के लिए उठाए गए कदम सफल हुए हैं और आज गुजरात में शेरों की आबादी में इज़ाफ़ा हुआ है."
"शेरों में मृत्यु दर 50 फ़ीसदी के क़रीब है. मतलब यह कि अगर शेर ने दो बच्चे दिए हैं, तो उनमें से एक मर जाता है."
कुचले जा रहे हैं शेर

विशेषज्ञ कहते हैं कि एक नर शेर को करीब 50 वर्ग किलोमीटर का इलाक़ा चाहिए होता है और मादा को करीब 28 वर्ग किलोमीटर का. इसके मुताबिक गीर के जंगल में केवल 300 शेर रह सकते हैं.
संदीप मानते हैं कि गीर का वन अब शेरों के लिए छोटा पड़ गया है इसलिए वे जंगल से बाहर निकलकर अब खेतों और अन्य जगहों पर जाने लगे हैं.
सौराष्ट्र में स्थित गीर उपवन करीब 1400 वर्ग किलोमीटर में फैला है. लेकिन अब शेर करीब 20,000 वर्ग किलोमीटर के इलाके में देखे जाते हैं. गीर के जंगलों से मीलों दूर समुद्र से सटे कई इलाकों में शेर अकसर दिखाई देते हैं.

सौराष्ट्र में खामबा तालुका के निवासी और गीर नेचर क्लब के प्रमुख भीखू भाई जेठवा कहते हैं, "सौराष्ट्र के कई गांवों में रास्तों पर और आम के बगीचों में शेर रोज़ दिखते हैं."
"अब शेरों के ट्रक और ट्रेन के नीचे कुचले जाने की ख़बर आम है. मेरे इलाक़े में पिछले पांच साल में 30 से ज़्यादा शेरों की लाशें बरामद हुई हैं."
शेरनी का स्मारक
पिपावाव बन्दरगाह के नज़दीक भेहराई गांव के देवसीभाई भानाभाई कहते हैं, "हमारे गांव में लोगों ने अपने घरों की दीवारें बड़ी करवा दी हैं और रात को अपनी भेड़-बकरियां कमरे में बंद कर सोते हैं, क्योंकि कई शेर अब आस-पास के खेतों में रहते हैं."
"कुछ महीने पहले पिपावाव पोर्ट जा रही मालगाड़ी के नीचे आकर दो शेरनियां मर गई थीं, जिसमें से एक के पेट में तीन बच्चे थे."
गांववालों ने भीखू भाई की मदद से दो शेरनियों और उनके बच्चों की याद में पटरी के नज़दीक एक स्मारक भी बनाया है.

भारत सरकार ने गुजरात के शेरों को मध्य प्रदेश के कुनो पालपुर वन में स्थानान्तरण के समिति बनाई है जिसके सदस्य डॉ रवि चेल्लम कई साल से वन्यजीव संरक्षण पर काम कर रहे हैं.
वह कहते हैं, "जगह की तलाश में गीर से जो शेर बाहर निकले हैं उनकी ज़िन्दगी को बड़ा ख़तरा है. गुजरात में पिछले कुछ साल में शेरों की रक्षा के लिए कई पुख़्ता कदम उठाए गए हैं. लेकिन अब जबकि शेर जंगल से बाहर निकल चुका है, तो नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं और यह बड़ी चिंता की बात है."
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