नौकरशाहों की एक ब्रिगेड जो होती है हर सरकार की खास

- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पिछले दिनों जब नौकरशाही पर सीरीज़ कर रहा था तो एक ट्रेंड साफ़ दिखाई दिया कि हर सरकार के कुछ प्रिय अफ़सर होते हैं.
जब वो सत्ता में होती है तो उनके पौ बारह रहते हैं और जब वो विपक्ष में होते हैं तो इन अफ़सरों की भी वर्दी-पेटी उतरी रहती है.
मगर ऐसे भी कुछ अफ़सर होते हैं कि सत्ता में कोई भी हो, उनकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता और वो हर शासन में फलते-फूलते हैं.
जब मैंने इसका रहस्य जानने की कोशिश की, तो लगभग सभी ने या तो गोलमोल जवाब देने की कोशिश की या फिर मॉरल हाईग्राउंड लेते हुए कहा कि वो तो हर सही चीज़ को सही और हर ग़लत चीज़ को ग़लत कहते हैं और ख़ुद को राजनीतिज्ञों से आइडेंटिफ़ाई नहीं करवाते.
एक साहब ने नाम न छापने की शर्त पर ज़रूर कहा कि एक ख़ास किस्म की ब्रीड को ही हर हाल में ऊपर जाने में महारत होती है.

उसके लिए सिविल लिस्ट पर नज़र रखना, वरिष्ठ अफ़सरों की रिटायरमेंट की तारीख़ों का हिसाब-किताब रखना, रसूख वाला ससुर और दंद-फंद में माहिर पत्नी ढूंढ निकालना और सही वक़्त पर शादी रचाना बाएं हाथ का खेल है.
राज्य में वह सिर्फ उद्योग निदेशक, औद्योगिक विकास निगम के प्रबंध निदेशक, वित्त सचिव, उद्योग सचिव या सचिव मुख्यमंत्री बनने के लिए तैयार रहता है.
केंद्र में वह आर्थिक मामलों, वाणिज्य या औद्योगिक विकास को छोड़कर अन्य किसी विभाग को घास नहीं डालता. वह मौक़े की नज़ाकत देखकर ही कदम उठाता है.
कब उसे दिल्ली में रहना है और कब राज्य की राजधानी में, यह उसे अच्छी तरह पता होता है और कब केंद्र में कोई महत्वपूर्ण पद झटकने के लिए अर्ज़ी लगाई जाए या कब दिल्ली में राज्य के रेज़िडेंट कमिश्नर जैसे ओहदे के बिल में दुबक लिया जाए और प्रतिकूल परिस्थितियां आने पर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के नौमाही कोर्स का पल्लू थामकर अपने कवच में सिकुड़ लिया जाए.
केंद्र में एक या दो साल गुज़ार लेने के बाद उसके हाथ करियर के रहस्यदारों की सांकलों तक पहुँच जाते हैं.
उसको यह पता होता है कि ब्रसेल्स में आर्थिक मंत्री का एक पद खाली होने वाला है. भारतीय निवेश केंद्र के टोक्यो दफ़्तर में एक संयुक्त सचिव स्तर का पद ख़ाली हुआ है या विश्व बैंक के मुख्यालय में एक भारतीय की सेवाएं चाहिए.

संयुक्त राष्ट्र की नौकरी में पाँच साल गुज़ारने के बाद वह अपने लिए यूएन पेंशन जुटा लेता है. वापस भारत आने पर वह दरबार में हाज़िरी लगाता है, चुनिंदा पार्टियों में दिखाई देने लगता है.
वह अफ़सरशाही में उभरते दिग्गजों के साथ ब्रिज और कारोबारी दुनिया के हमप्याला दोस्तों के साथ गोल्फ़ खेलता है.
उसे मालूम है कि उसे प्रतिभाशाली लगना है मगर इस तरह कि आँखें चौंधियाएं नहीं. उसे समर्थ लगना है लेकिन अड़ियल नहीं.
इनमें से हर एक के एक या एक से ज़्यादा गॉडफ़ादर होते हैं. कुछ गॉडफ़ादर ऐसे भी होते हैं, जिनके कवच में ज़ाहिरी तौर पर कोई सुराख़ नहीं होता. वे सागपात खाते हैं, सिगरेट छूते तक नहीं और शराब को तो हाथ नहीं लगाते.
लेकिन अक्लमंद नौकरशाह इस सबसे घबराता नहीं. वह चुपचाप अपनी खोजबीन जारी रखता है.
अचानक एक दिन उसे पता चलता है कि पुराने सिक्के जमा करना बॉस का पसंदीदा शौक है, वो रजनीश के भक्त हैं, पुराने फ़िल्मी पोस्टरों के शौकीन हैं और बेगम अख़्तर की ग़ज़लों के दीवाने.
एक बार रहस्य खुला नहीं कि सुराख़ करने में उसे देर नहीं लगती.

गॉडफ़ादर को लुभाने का एक सीधा नुस्ख़ा है- चापलूसी.
अगर उनके बाल काले हैं जो जवान और हैंडसम कहकर उनकी तारीफ़ की जाती है. ऐसे में यह कहने से भी नहीं चूका जाता कि 'हू इज़ हू' में दर्ज उम्र से वह कहीं तरोताज़ा और कम उम्र के लगते हैं.
अगर उनके बाल सफ़ेद हो चले हैं, तो रवींद्रनाथ टैगोर के साथ उनकी यह कहकर पटरी बैठाई जाती है कि परिपक्वता उनके चेहरे पर कितनी फबती है.
क्या एक गॉडफ़ादर से अच्छा नहीं कि दो गॉडफ़ादर हों?
इस मुद्दे पर अफ़सरशाहों की राय अलग-अलग है. कुछ कहते हैं कि एक ही गॉडफ़ादर के साथ जोंक की तरह चिपके रहने में ही भलाई है.
दूसरे गुट का कहना है कि बचाव की दृष्टि से दो गॉडफ़ादरों का रहना ज़रूरी है.
यदि गॉडफ़ादर नंबर-1 कहीं मात खा जाए, तो गॉडफ़ादर नंबर-2 आपकी मदद के लिए आगे आ जाए.
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