किन हिदायतों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने इंतज़ार बिना तलाक़ की दी अनुमति

सुप्रीम कोर्ट

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    • Author, इक़बाल अहमद और सुचित्र मोहंती
    • पदनाम, बीबीसी नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने तलाक़ के मामले में सोमवार को एक महत्वपूर्ण फ़ैसला सुनाया. पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को दी गई शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सर्वोच्च अदालत विवाह को तुरंत भंग कर सकती है.

लेकिन यह तभी संभव है जब अदालत इस बात से पूरी तरह आश्वस्त हो जाए कि शादी अपरिवर्तनीय रूप से टूट चुकी है यानी पति-पत्नी के बीच सुलह की सारी संभावनाएं ख़त्म हो चुकी हैं और उनके बीच रिश्तों को दोबारा शुरू करने की कोई गुंजाइश नहीं है.

अदालत ने कहा कि तलाक़ मांग रहे जोड़े को छह महीने तक इंतज़ार भी नहीं करना होगा.

तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फ़ैसला

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क्या है संविधान का अनुच्छेद 142?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को विवेकाधीन शक्ति प्रदान करता है. इसके अनुसार, सर्वोच्च अदालत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए ऐसी डिक्री पारित कर सकती है या ऐसा आदेश दे सकती है जो उसके समक्ष लंबित किसी भी मामले या मामलों में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक हो.

जिस मामले में क़ानून नहीं बना हो, सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत उन पर अपना फ़ैसला दे सकता है.

जानी मानी वकील कामिनी जायसवाल कहती हैं कि सिर्फ़ इसी मामले में नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट 90 के दशक से ही लोगों के साथ न्याय करने के लिए अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल किसी-किसी ख़ास मामले में करता रहा है.

वो कहती हैं कि जिस मामले में अभी तक कोई क़ानून नहीं बना है, उन मामलों में सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करता है. लेकिन इस फ़ैसले से किसी और को कोई नुक़सान नहीं होना चाहिए.

तलाक़

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क्या है पूरा मामला?

शिल्पा शैलेश और वरुण श्रीनिवासन ने 2014 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था और सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी कि वो संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उन्हें तलाक़ दे दे.

हिंदू मैरेज एक्ट 1955 की धारा 13-B के तहत पति-पत्नी आपसी सहमति से तलाक़ लेने के लिए फ़ैमिली कोर्ट में अर्ज़ी दे सकते हैं.

पति-पत्नी को अदालत में कहना पड़ता है कि वो एक वर्ष या उससे अधिक समय से अलग-अलग रह रहे हैं और आगे भी उनके साथ रहने की कोई गुंजाइश नहीं है.

इसी आधार पर वो आपसी सहमति से तलाक़ की अर्ज़ी देते हैं. लेकिन फ़ैमिली कोर्ट में इतने ज़्यादा मुक़दमें होते हैं कि पहली तारीख़ मिलने में ही सालों लग जाते हैं और फिर पहली तारीख़ मिलने के बाद दूसरी तारीख़ या तलाक़ मिलने के लिए कम से कम छह महीने का इंतज़ार करना पड़ता है.

छह महीने का वक़्त इसलिए दिया जाता है कि दोनों पक्षों में सुलह-सफ़ाई की कोई भी गुंजाइश हो तो वो अपना मुक़दमा वापस ले सकते हैं.

शिल्पा शैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन केस में यही मांग की गई थी कि सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए तलाक़ की अर्ज़ी फ़ौरन स्वीकार कर ले क्योंकि उनकी शादी में अब सुलह-सफ़ाई की कोई गुंजाइश नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने याचिकाकर्ता की दलील में दम पाया और इस पर विचार करने के लिए 2016 में इसे पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेज दिया गया.

सितंबर 2022 में जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस ए एस ओका, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जे के माहेश्वरी ने इस मामले को सुना और फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.

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संविधान पीठ ने अपनै फ़ैसले में क्या कहा?

जस्टिस किशन कौल की अध्यक्षता वाली इस बेंच का फ़ैसला जस्टिस संजीव खन्ना ने सोमवार को सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 142 की व्यवस्था संविधान में इसीलिए की गई है ताकि सुप्रीम कोर्ट लोगों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए आदेश दे सके.

अदालत ने कहा कि जब शादी को जारी रखना असंभव हो, तब सुप्रीम कोर्ट सीधे भी तलाक़ का आदेश दे सकती है. आपसी सहमति से तलाक़ के मामले में ज़रूरी छह महीने के इंतज़ार का क़ानूनी प्रावधान भी इस तरह के मामलों में लागू नहीं होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने विस्तृत फ़ैसले में उन स्थितियों का भी ज़िक्र किया है, जब वह तलाक़ के मामलों में दख़ल दे सकता है.

तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फ़ैसला

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शादी के अपरिवर्तनीय रूप से टूटने का फ़ैसला कैसे हो?

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपने फ़ैसले में निश्चित तौर पर यह नहीं बताया कि यह कैसे माना जाए कि शादी अब पूरी तरह टूट चुकी है और शादी के बचे रहने की कोई गुंजाइश नहीं है.

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लेकिन अदालत ने अपने फ़ैसले में मोटे तौर पर उन चीज़ों का ज़िक्र किया जिसका उन्हें ध्यान रखना चाहिए, जैसे:

  • शादी के कितने समय बाद तक पति-पत्नी सामान्य वैवाहिक जीवन गुज़ार रहे थे.
  • आख़िरी बार पति-पत्नी ने कब सहवास किया था.
  • पति-पत्नी और उनके परिवार वालों ने एक-दूसरे पर जो आरोप लगाए हैं वो कितने गंभीर हैं.
  • तलाक़ की क़ानूनी प्रक्रिया के दौरान क्या-क्या आदेश दिए गए और उनका पति-पत्नी के आपसी रिश्ते पर क्या असर पड़ा.
  • अदालत के हस्तक्षेप से कितनी बार सुलह-सफ़ाई की कोशिश की गई और आख़िरी बार इस तरह की कोशिश कब की गई थी.
  • पति-पत्नी के अलग-अलग रहने की अवधि पर्याप्त रूप से लंबी होनी चाहिए और छह साल या उससे अधिक समय की अवधि एक अहम फ़ैक्टर होना चाहिए.
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अदालत ने यह भी कहा कि ऊपर जिन चीज़ों का ज़िक्र किया गया है उन पर कोई भी फ़ैसला करने से पहले यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि दोनों पक्षों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति कैसी है, वो कितने पढ़े-लिखे हैं, उनकी उम्र क्या है, उनके बच्चे हैं या नहीं और बच्चों की उम्र क्या है और वो क्या पढ़ाई कर रहे हैं.

अगर एक पक्ष आर्थिक रूप से दूसरे पर निर्भर है तो जो तलाक़ मांग रहा है वो दूसरे पक्ष और बच्चों के गुज़ारे के लिए किस तरह की मदद करने को तैयार है.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में यह भी साफ़ कर दिया कि 'शादी के अपरिवर्तनीय रूप से टूटने' (Irretrievably Broken Down) के आधार पर तलाक़ की मांग करना कोई अधिकार नहीं है बल्कि यह पूरी तरह अदालत का विवेकाधिकार है जिसका इस्तेमाल बहुत ही संभलकर और सावधानी के साथ किया जाना चाहिए और दोनों पक्षों के पूर्ण न्याय को ध्यान में रखते हुए फ़ैसला किया जाना चाहिए.

तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फ़ैसला

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क्या कहते हैं क़ानूनी विशेषज्ञ?

पटना हाईकोर्ट की पूर्व जज और सुप्रीम कोर्ट की वकील जस्टिस अंजना प्रकाश (रिटायर्ड) ने इसे एक अहम फ़ैसला क़रार दिया है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि लॉ कमीशन और महिला अधिकार के लिए काम करने वालों ने भी कई बार सिफ़ारिश की है कि शादी अगर उस मुक़ाम पर पहुंच गई है जिसमें सुलह-सफ़ाई की कोई गुंजाइश नहीं है तो उस आधार पर तलाक़ की अर्ज़ी स्वीकार कर लेनी चाहिए. लेकिन अभी तक यह क़ानून का हिस्सा नहीं बन पाया है.

वकील कामिनी जायसवाल भी कहती हैं कि लॉ कमीशन ने यह सिफ़ारिश की थी कि 'शादी के अपरिवर्तनीय रूप से टूटने' को तलाक़ का एक आधार बना दिया जाए, लेकिन ऐसा क़ानून नहीं बनाया गया क्योंकि इसके दुरुपयोग की बहुत आशंका थी.

तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फ़ैसला

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लेकिन क्या इससे तलाक़ मिलने में आसानी होगी?

जस्टिस अंजना प्रकाश कहती हैं कि इससे उन पति-पत्नी को तलाक़ लेने में आसानी होगी जो इस नतीजे पर पहुंच चुके हैं कि उनकी शादी के बचे रहने की अब कोई गुंजाइश नहीं है और दोनों की भलाई इसी में है कि वो जितनी जल्द हो सकें क़ानूनी तौर पर तलाक़ लेकर अलग हो जाएं.

लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस गोविंद माथुर (रिटायर्ड) का मानना है कि इससे कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा.

बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "फ़ैमिली कोर्ट में तलाक़ का मामला चलता रहेगा. तलाक़ की प्रक्रिया में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. तलाक़ का केस जितना आसान और मुश्किल पहले था, अब भी उतना ही रहेगा."

वकील कामिनी जायसवाल भी कहती हैं कि फ़ैमिली कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं और ना ही हाईकोर्ट, यह अधिकार तो सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट के पास है.

वो कहती हैं कि अभी भी आम आदमी को इससे कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ़ किया है कि इस फ़ैसले को आधार बनाकर तलाक़ का मुक़दमा सीधे सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल नहीं किया जा सकता.

कोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति संविधान के आर्टिकल 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट या आर्टिकल 226 के तहत सीधे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस आधार पर तलाक़ की मांग नहीं कर सकता है कि उसकी शादी पूरी तरह टूट चुकी है और उनके संबंधों के दोबारा बहाल होने की अब कोई गुंजाइश नहीं है.

कोर्ट ने कहा है कि तलाक़ के लिए निचली अदालत की जो प्रक्रिया है, उसका पालन करना पड़ेगा. अगर निचली अदालत के किसी आदेश के चलते समस्या आ रही हो, तो पूरी क़ानूनी प्रक्रिया का पालन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाख़िल की जा सकती है. अगर सुप्रीम कोर्ट को लगेगा कि मामले को लंबा खींचने की बजाए तलाक़ का आदेश दे देना सही है, तभी वह ऐसा आदेश देगा.

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